मुफ्तखोर मेहमान – छोटी सी शिक्षाप्रद कहानी Chhoti shikshaprad kahani

Chhoti shikshaprad kahani

एक राजा के शयन कक्ष में एक जूं रहती थी। वह राजा का स्वादिष्ट खून पी पीकर खूब आनन्द ले रही थी। किसी ने ठीक ही कहा है, सुखी प्राणी को देखकर सभी उसके करीब आना चाहते हैं। खासतौर पर मुफ्तखोर तो रहते ही इसी ताक में हैं कि किसी न किसी तरह उस सुखी से नाता जोड़ें ताकि उनकी भी दाल-रोटी चलती रहे। ऐसे लोग रिश्तेदारी जोड़ने में भी एक पल नहीं लगाते।

मुफ्तखोर मेहमान - छोटी सी शिक्षाप्रद कहानी Chhoti shikshaprad kahani

ऐसा ही कुछ जूं के साथ भी हुआ, एक दिन एक खटमल अचानक ही वहां आया और बड़ी ही मधुर वाणी में जूं से बोला, ”मौसी जी प्रणाम।“

”प्रणाम तो हुआ, मगर…।“ आश्चर्य से उसे देखते हुए जूं ने कहा- ”तुम हो कौन भाई?“

”मैं खटमल हूं मौसी।“

”अरे वह तो मैं भी देख रही हूं। मगर तुम आए कहां से हो? मैं तुम्हारी मौसी किस रिश्ते से लगती हूं? मैं तो तुम्हें पहचान ही नहीं पर रही हूं।“

”मौसी! मैं इस राज्य के दीवान जी के घर से आया हूं। कल मेरी मां मर गई।“ खटमल ने घडि़याली आंसू बहाते हुए कहा- ”मरते समय उसने कहा था कि मैं राजमहल में तुम्हारे पास चला जाऊं और बाकी जीवन आपकी छत्रछाया में गुजारूं। बस, मैं दीवान जी की पगड़ी में छिपकर यहां आ पहुंचा।“

”ठीक है, अब मेरी बात सुन। तू जैसे आया है, वैसे ही वापस चला जा और दीवान जी के घर में ही मौज ले।“

”अरे मौसी, ऐसी भी क्या नाराजगी है। अब जब आ ही गया हूं तो दो-चार दिन तो रहने दो। जरा हम भी तो महाराज के स्वादिष्ट खून का स्वाद चखें।“ कहकर वह ढिठाई से मुस्कराया।

”बेकार की बातें न बना।“ जूं तिक्त स्वर में बोली- ”तेरी जीभ चटखारे तो ले रही है, मगर अभी तुझे यह नहीं मालूम कि इन राजा लोगों का क्रोध बहुत बुरा होता है। यदि मैं राजा के खून का आनन्द लेती हूं तो बहुत ही होशियारी से। अब जब हम दो हो जाएंगे तो राजा हमें छोड़ेगा नहीं, इसलिए हम दोनों की भलाई इसी में है कि तुम यहां से चलते-फिरते नजर आओ।“

”मौसी, कोई घर आए मेहमान से भला ऐसा व्यवहार करता है। घर आए मेहमान के विषय में तो विद्वानों ने कहा है कि वह देवतातुल्य होता है। अतिथि सेवा को देव सेवा कहा गया है।“

”वह अतिथि सेवा भी किस काम की जिसमें अपनी ही जान को खतरा हो।“

”कैसा खतरा…. देखो मौसी, पहले तो तुम दिल भरकर राजा का खून पी लिया करना, जब तुम्हारा पेट भर जाया करेगा तो मैं पी लिया करूंगा, बस बारी-बारी से दोनों अपना काम चलाते रहेंगे, न तुम्हें कोई कष्ट होगा, न ही राजा को।“

”देखो खटमल, मैं तो राजा का खून बहुत ही प्रेम से पीती हूं, मेरे इस तरह खून पीने से राजा को न तो कोई कष्ट होता है, न ही उसे पता चलता है। तुम तो उस ढंग से कभी खून नहीं पी सकते।“

”मौसी, तुम इस बात की चिंता मत करो, मैं तो तुमसे भी कहीं अधिक आराम से खून पिउंगा…. राजा को तो पता भी नहीं लगने दूंगा।“

अभी वे दोनो बातें कर ही रहे थे कि राजा भी अपने सोने के कमरे में आ गया, दोनों ने अपनी-अपनी जुबान बंद कर ली और चुपचाप बैठे राजा की ओर देखते रहे।

जैसे ही राजा बिस्तर पर लेटा तो पहले जूं ने उसका खून पीना शुरू किया। जब जूं का पेट भर गया तो वह बड़े आराम से एक ओर बैठ गई।

खटमल समझ गया कि अब उसका नम्बर है। वह तो पहले से ही राजा के स्वादिष्ट खून को पीने के लिए व्याकुल हो रहा था, जूं के एक ओर हटते ही वह खून पीने के लिए राजा के शरीर पर जा चढ़ा।

थोड़ी देर तक तो वह बड़े मजे से खून पीता रहा। उसने राजा को पता भी नहीं चलने दिया, परन्तु किसी ने ठीक ही कहा है कि चोर चोरी से तो जा सकता है, लेकिन हेराफेरी से नहीं। खटमल को जैसे ही राजा के स्वादिष्ट खून का आनन्द आने लगा तो वह जूं से की गई सब बातों को भूल गया, लालच और लोभ में अंधा होकर वह जल्दी-जल्दी खून पीने लगा, जिससे उसका लम्बा डंक राजा के शरीर में चुभ गया।

राजा तिलमिलाया और उसने फौरन पहरेदारों को तलब किया।

राजा की आवाज सुनते ही पहरेदार भागे-भागे अंदर आए तो राजा ने कहा- ”इस पलंग में कोई जूं या खटमल है, जिसने हमें काटा है।“

राजा की बात सुनकर पहरेदार उस पलंग पर बिछे कपड़ों को एक-एक करके देखने लगे।

खटमल तो बड़ा होशियार और चालाक था, पहरेदारों को देखकर वह पलंग की पतली सी दरार में जा छुपा। जूं बेचारी चादर पर चिपकी बैठी थी, जिस पर पहरेदारों की नजर पड़ गई… फिर क्या था जूं पकड़ी गई जिसे पहरेदारों ने मसलकर मार डाला और खटमल बच गया।