प्रेरक कथा – भलाई का रास्ता

किसी गांव में तीन भाई रहते थे। वे बचपन में ही अनाथ हो गए थे। उनके पास जमीन जायदाद कुछ भी नहीं, सिर्फ सिर छुपाने के लिए एक छोटी सी झोंपड़ी भर थी। तीनों भाई दर दर भीख मांगकर अपना जीवन यापन करने लगे। बचपन बीता, जवानी आई, तो एक दिन तीनों भाइयों ने यह सोचा कि कहीं दूसरे स्थान में चलकर मेहनत मजूरी की जाए। शायद, कोई भला आदमी अपने यहां पर रख ले। वे गांव छोड़कर चल दिए। रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा राहगीर दिखाई दिया। उसकी दाढ़ी खूब लंबी और सफेद थी। बूढ़े ने भाइयों के पास आकर पूछा, ”बच्चो, कहां जा रहे हो?“

”मजदूरी की तलाश में।“

”क्या तुम्हारे पास अपनी खेती बाड़ी नहीं है?“

”नहीं“ भाइयों ने मायूसरी से जवाब दिया, ” काश, हमें कोई भला आदमी मिल जाता, तो उसके यहां हम लोग मेहनत से काम करते और अपने पिता की ही तरह उसका आदर करते।“Prerak katha - bhalayi ka rasta

 

बूढ़ा सोच में पड़ गया। क्षणिक खामोशी के बाद बोला, ”आज से तुम लोग मेरे बेटे हुए और मैं तुम्हारा धर्म पिता। मैं तुम लोगों की सहायता करूंगा। ईमानदारी, परोपकार और सच्चाई का रास्ता दिखाऊंगा। तुम लोग अपना फर्ज निभाते चलना, मेरी सीख जीवन में याद रखना।“ तीनों खुश हुए और भलाई का जीवन बिताने के लिए तत्काल सहमत हो गए। बूढ़े ने उन्हें अपने साथ लिया और आगे बढ़ चला।

बियाबान जंगलों और लंबे रास्तों को पार करते हुए वे तीनों बूढ़े के पीछे पीछे चलते रहे। अचानक रास्ते में थोड़ी दूर पर उन्हें एक शानदार हवेली दिखाई दी। हवेली के बगल में चेरी की बगिया थी, जहां एक युवती खड़ी हुई थी। वह हू ब हू रूप की रानी लग रही थी। उसे देखते ही बड़ा भाई उस पर मोहित हो गया, बोला, ”काश, यह लड़की मेरी पत्नी होती। अमीर है, इसलिए दहेज में जमीन जायदाद, गाय, बैल, घोड़े भी मिलते।“

यह सुनकर बूढ़े ने कहा, ”तो आओ, तुम्हारा रिश्ता तय कराए देते हैं। तुम्हारी शादी हो जाएगी और दहेज भी खूब मिलेगा। खुशी खुशी जिंदगी गुजारना। बस, सच्चाई का रास्ता कभी मत भूलना।“

बूढ़ा उन्हें लड़की वालों के यहां ले गया। चट मंगनी, पट शादी। सभी बड़े खुश हुए। इस तरह बड़ा भाई हवेली का मालिक बन गया और सुखपूर्वक रहने लगा।

शेष दो अपने मुंहबोले बेटों को साथ लेकर बूढ़ा आगे चल पड़ा। वे पूर्ववत बियाबान जंगलों और लंबे रास्तों को पार करते हुए चलते रहे। चलते चलते उन्हें रास्तें में खूबसूरत सा, चमकता हुआ घर दिखाई दिया। घर के बगल में एक तालाब था और तालाब के किनारे पनचक्की लगी थी। घर के पास एक युवती अपनी धुन में मगन किसी काम में व्यस्त थी। मंझले भाई ने कहा, ”काश, ऐसी ही युवती मेरी पत्नी होती। दहेज में तालाब और पनचक्की मिल जाती तो मैं मजे से चक्की चलाता, गेहूं पीसता और चैन से जिंदगी गुजारता।“

”तो आओ, तुम्हारी मरजी ही सही।“ बूढ़े ने लड़के से कहा।

बूढ़ा और उनके साथ दोनों लड़के लड़की वालों के यहां पहुंचे। बूढ़े ने शादी तय करा दी। मंझला भाई भी घर का मालिक बन गया और पत्नी के साथ आनंद से रहने लगा। उससे विदा लेते समय बूढ़े ने कहा, ”बेटे अब हम चलते हैं, तुम खुश रहो। लेकिन याद रखना कि सच्चाई का रास्ता कभी न भूलना।“

अब बूढ़ा और सबसे छोटा लड़का फिर आगे बढ़ चले। अचानक उन्हें एक साधारण सी झोंपड़ी दिखाई दी। उषा की लालिमा जैसी सुंदर एक युवती अपनी झोंपड़ी से बाहर आ रही थी। वह बहुत गरीब थी। उसके पुराने कपड़ों पर कई कई पैबंद थे।

छोटे भाई ने कहा, ” काश, यह युवती मेरी पत्नी होती। हम दोनों कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करते और हमारे यहां बस, खाने भर का अनाज होता। तब हम दीन दुखियों की भरसक मदद करते, खुद खाते और दूसरों को भी खिलाते।“

यह सुनकर बूढ़े ने कहा, ”शाबाश, ऐसा ही होगा। पर देखो, सच्चाई का रास्ता कभी मत भूलना।“ अब इस छोटे की शादी भी बूढ़े ने करा दी और बूढ़ा अपनी राह चल पड़ा।

इधर तीनों भाई अपनी अपनी जिंदगी जीने लगे। बड़ा भाई इतना अमीर हो गया कि उसने अपने लिए अच्छे से अच्छे घर बनाए। फिर भी उसे दिन रात यही धुन सवार रहती कि वह और अधिक से अधिक अमीर कैसे बने? गरीबों की मदद या उन्हें सहारा देने की बात तो उसके मन में कभी आती ही नहीं। वह अत्यंत कंजूस भी हो गया।

मंझला भाई भी अमीर हो गया। उसके यहां भी नौकर चाकर काम करने लगे और वह ऐशोआराम की जिंदगी बिताने लगा। वह बस, धनवानों की तरह खाता पीता और नौकरों पर हुक्म चलाता रहता।

सबसे छोटा भाई मेहनत मजदूरी कर शांति से अपनी गुजर बसर कर रहा था। घर गृहस्थी में जब कोई उत्सव होता, तो वह दूसरों के साथ मिल बांटकर खाता। जब कुछ न होता, तो संतोष करता, पर वह कभी भी अपनी परेशानियों का रोना न रोता।

इस बीच बूढ़ा दूर दूर का सफर करता रहा। एक दिन उसे अपने बेटों का ख्याल आया। कहीं वे सच्चाई के रास्ते से भटक तो नहीं गए? बूढ़े ने भिखारी का भेष बनाया। सबसे पहले वह बड़े लड़के के घर पहुंचा और बड़े दीन भाव से झुकते हुए गिड़गिड़ाकर बोला, ”जुग जुग जियो मेरे लाल, इस गरीब लाचार बूढ़े को खाना करा दो।“

बड़े लड़के ने बूढ़े को अपमानित करते हुए कहा, ”अरे खूसट, तू अभी हटृा कटृा तो दिख रहा है। भूख लगी है तो जा कहीं मेहनत मजदूरी कर। अभी तो खुद अपने पैरों पर किसी तरह खड़ा हो पाया हूं। जा, चलता बन।“

बूढ़ा वापस चल दिया। लेकिन थोड़ी दूर जाकर वह ठहर गया उसने पलटकर बड़े लड़के के घर की ओर देखा, तो वह धुआं उगलता हुआ भस्म हो गया।

बूढ़ा अब मंझले लड़के के पास पहुंचा। वह खुद पनचक्की पर बैठा हुआ नौकरों पर हुक्म चला रहा था। बूढ़े ने झुककर दैन्य भाव से कहा, ”बेटा, भगवान तुम्हारा भला करे। थोड़़ा सा आटा दे दो। मैं भिखारी हूं, दाने दाने को तरस रहा हूं।“

”वाह बाबा वाह!“ दूसरे बेटे ने कहा, ”यहां तो मैं खुद गरीबी से जूझ रहा हूं। मेरे पास तो खुद अपने लिए आटा नहीं है। तुझ जैसे भिखारी तो रोज मारे मारे फिरते हैं। आखिर किस किसका पेट भरूं?“

बूढ़ा दूसरे लड़के के यहां से भी मायूस होकर चल पड़ा और थोड़ी दूर जाकर एक टीले पर ठहर गया। बूढ़े ने पलटकर देखा तो मंझले लड़के को घर और पनचक्की धू धूकर जल उठे।

अब बूढ़ तीसरे छोटे लड़के के यहां पहुंचा। वह सचमुच गरीब था। उसकी झोंपड़ी वैसी ही छोटी सी ही थी, लेकिन साफ सुथरी दिख रही थी। ”बेटा, भगवान तुम्हारा भला करे। मैं बहुत भूखा हूं। कुछ खाने को दे दो?“

”बाबा, अंदर चलो, खाना मेरे घर में है। खाना खा लेना और थोड़ा रास्ते के लिए साथ भी लेते जाना।“

बूढ़ा झोंपड़ी के अंदर पहुंचा। उसने घर की मालकिन को देखा। वह साधारण कपड़े पहने हुए थी। पर उसे बूढ़े के फटे पुराने कपड़े देख बहुत अफसोस हुआ। वह बूढ़े के लिए कपड़े ले आई, बोली, ”बाबा, ये कपड़े पहन लो।“

बूढ़ा खुशी खुशी कपड़े पहनने लगा तो मालकिन ने देखा कि बूढ़े के सीने पर एक बड़ा सा घाव है। बूढ़े को बिठाकर उसने भरपेट खाना खिलाया। अचानक छोटे लड़के के पूछा, ”बाबा, तुम्हारे सीने में इतना बड़ा जख्म कैस है?“

”बेटा, यह बड़ा अजीब जख्म है। अब तो बस मैं चंद रोज का मेहमान हूं। इस जख्म की वजह से मेरी मौत कभी हो सकती है।“

”तौबा! तो क्या इसकी कोई दवा नहीं है?“ घर की मालकिन ने दुख प्रकट करते हुए कहा।

”दवा तो है। बस एक ही दवा है, लेकिन उसे कोई देगा नहीं, जबकि हर कोई दे सकता है।“

तब छोटे लड़के ने कहा, ”आखिर क्यों नहीं देगा? ऐसी कौन सी दवा है?“

”दवा बड़ी अजीबो गरीब है, बेटा! जानना चाहते हो तो सुनो, यदि किसी घर का मालिक अपने घर समेत अपनी सारी दौलत आग लगाकर फूंक दे और उसकी राख मेरे जख्म पर छिड़क दे, तो जख्म अपने आप सूख सकता है।“

छोटा बेटा थोड़ी देर असमंजस में पड़ गया। फिर अपनी पत्नी से बोला, ”कहो, तुम्हारा क्या ख्याल है?“

”ख्याल? मैं तो समझती हूं मेरी झोंपड़ी फिर बन जाएगी, बाबा बेचारे की जिंदगी खतरे में है, क्यों न, इन्हें मरने से बचा लिया जाए।“

”फिर देर क्या है? आओ, बच्चों को झोंपड़ी से बाहर निकाल लें।“ दोनो झोंपड़ी से बाहर आ गए। छोटे लड़के ने झोंपड़ी पर एक नजर डाली, उसे अपनी जो कुछ भी जमा पूंजी थी, उसके लिए अफसोस तो था, लेकिन बूढ़े के प्रति उसके हदय में कहीं ज्यादा तकलीफ थी। अतः उसने झोंपड़ी में आग लगा दी। झोंपड़ी थोड़ी देर में राख का ढ़ेर बन गई। लेकिन यह क्या? अचानक झोंपड़ी के स्थान पर खूबसूरत हवेली आ खड़ी हुई।

उधर बूढ़ा अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेरता हुआ मुस्करा रहा था।

”बेटा, तीनों भाइयों में से तुम ही अकेले सच्चाई के रास्ते पर चल रहे हो। खुश रहो और युग युग जियो।“

अब छोटे लड़के की समझ में आया कि यह वही बूढ़े बाबा हैं, जिन्होंने एक दिन तीनों भाइयों को अपना मुंह बोला बेटा बनाया था।

वह बूढ़े की ओर लपका, ”लेकिन तब तक वह गायब हो चुका थे।“