रोचक बच्चों की कहानी – राजा और योगी, Rochak Bachchon ki kahani – Raja aur yogi

Rochak Bachchon ki kahani – Raja aur yogi

Rochak Bachchon ki kahani - Raja aur yogiबहुत समय पहले की बात है, अचलगढ़ के राजा श्यामसिंह ने राज्य में घोषणा करवा दी कि उनके राज्य में वही योगी रह सकता है जो उसके सवालों का सही जवाब दे दे, अन्यथा उसे संन्यास छोड़कर विवाह करना पड़ेगा। राजा श्यामसिंह के सवाल थे, ‘योगी और गृहस्थ को कैसा होना चाहिए? तथा योगी बनना ठीक है या गृहस्थ?’

राज्य में अनेक योगी आए, पर संतोषजनक उत्तर न देने पर उन्हें गृहस्थ बनना पड़ा। एक दिन प्रातः काल ही एक योगी राजमहल के द्वार पर पहुंचा। द्वारपाल उसे राजा के पास ले गया। राजा ने उससे भी अपने सवाल दुहराए। योगी ने कहा, ”हे राजन! इन सवालों का जवाब मैं आपको एक महीने बाद दूंगा।“ राजा ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

अवधि पूरी होने पर योगी ने राजा से कहा, ”राजन! आप आपको मेरे साथ चलना होगा।“ राजा और योगी साथ साथ चल दिए। चलते चलते उन्होंने कई दिन बाद राज्य की सीमा पार की। दूसरे राज्य में पहुंचने पर योगी ने कहा, ”राजन! हम लोग जिस राज्य में चल रहे हैं, इस राज्य की राजकुमारी का आज स्वयंबर हो रहा है। चलो, हम उस स्वयंबर को देखकर आगे बढ़ें।“

राजकुमारी मंडप में जयमाला लेकर आई और उसने उसे अकस्मात योगी के गले में डाल दिया। स्वयंबर में उपस्थित अन्य राजकुमारो ने कहा, ”राजकुमारी से गलती हो गई है। वह फिर से जयमाला डालेंगी।“

योगी ने जयमाला निकालकर राजकुमारी को दे दी। चारों तरफ घूमकर राजकुमारी ने जयमाला दूसरी बार भी योगी के गले में डाल दी और ऐसा ही तीसरी बार भी हुआ। आखिर स्वयंबर में उपस्थित राजकुमारों ने कहा कि अब राजकुमारी का विवाह योगी के साथ ही होगा।

स्वयंबर का निर्णय सुनकर योगी वहां से भाग निकला। राजकुमारी ने योगी का पीछा किया। आगे आगे योगी, उसके पीछे राजकुमारी और अंत में राजा श्यामसिंह। भागते भागते योगी और राजा घने जंगल में पहुंचे। कुछ दूर और पीछा करने के बाद राजकुमारी आगे न जा सकी।

शीत ऋतु थी, धीरे धीरे पानी बरस रहा था, रात भी अंधेरी। आगे चलने का उचित समय न रहने के कारण राजा और योगी एक शाल्मली के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस पेड़ पर एक हंस और हंसिनी रहते थे। वे पूर्वजन्म में भी गृहस्थ थे। हंस हंसनिी से बोला, ”द्वार पर दो अतिथि आए हैं। उनका उचित सत्कार होना चाहिए। सबसे पहले इन लोगों को शीत से बचाने का उपक्रम करें क्योंकि आज ठंड बहुत ज्यादा है।“

हंसिनी ने पेड़ से सूखी लकड़ियां गिरानी शुरू कर दीं। हंस किसी प्रकार गांव से आग ले आया। योगी ने आग जला दी। फिर पेड़ से गिराए गए फलों को इकट्ठउ किया।

राजा मांसाहारी था। हंस ने हंसिनी से कहा, ”प्रिये, मेरे न रहने पर तुम बच्चों का पालन पोषण कर लोगी, किंतु मैं तुम्हारे बिना पागल हो जाऊंगा, इसलिए पेड़ के नीचे जलती आग में गिरकर प्राण दे रहा हूं, ताकि राजा की भूख शांत हो सके।“ यह कहकर हंस आग में गिर पड़ा।

योगी फल खाकर कुछ सोचने लगा। दूसरी ओर राजा अब भी भूख से परेशान हो रहा था। तब हंसिनी भी अपने बच्चों के साथ जलती आग में गिरी। सभी को खाकर राजा के पेट की भूख शांत हो गई।

योगी और राजा शाल्मली वृक्ष के नीचे सो गए। प्रातः काल होने पर राजा श्यामसिंह ने कहा, ”अब मेरे सवालों का जवाब मिलना चाहिए।“ तब योगी बोला, ”हे मूर्ख राजा! मेरे बरताव को देख तुम्हें नहीं मालूम हुआ कि योगी कैसा होना चाहिए? गृहस्थ हंस हंसिनी जैसा हो, जो अतिथि के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दे।“

”हे राजा, गृहस्थ और योगी को त्यागी होना चाहिए। रही योगी या गृहस्थ बनने की बात तो यह अपनी अपनी पसंद है, जो जैसा होना चाहे?“