सिंह और चूहा – पंचतंत्र की कहानियाँ

एक बार एक छोटा सा चूहा एक सिंह की मांद में घुस गया। सिंह उसे देखकर बहुत क्रोधित हुआ और गरजकर बोला- ”तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी आज्ञा के बिना मेरी गुफा में घुसने की?“ मैं तुम्हें जान से मार दूंगा।“

सिंह और चूहा

बेचारा चूहा भय से कांपने लगा। उसने सिंह से विनती की- ”महाराज! कृपया मुझे मत मारिए।“

मेरी जिंदगी बख्श दीजिए। वैसे तो मैं बहुत छोटा और दुर्बल हूं, मगर मैं वादा करता हूं कि आपका एहसान जीवन भर न भूलूंगा और यदि कभी आपके किसी काम आ सका तो स्वयं को धन्य समझूंगा।

सिंह ने मुस्कराते हुए उस छोट से चूहे पर नजर डाली और बोला- ”इसमें शक नहीं कि तुम एक अत्यन्त दुर्बल और छोटे से जीव हो। मगर हो बड़े वाचाल। तुम मेरे जैसे शक्तिशाली के भला क्या काम आओगे? फिर भी चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें नहीं मारूंगा, मगर याद रखो, फिर कभी इस गुफा में कदम मत रखना।“ यह कहकर शेर ने उसे छोड़ दिया।

”महाराज! मैं आपका कृतज्ञ हूं।“ कहकर चूहे ने हाथ जोड़ दिए। वह तो अभी भी भय से कांप रहा था।

चूहा गुफा से निकलकर सिर पर पैर रखकर भाग गया। वैसे मन ही मन वह सिंह का बहुत एहसानमंद था।

एक दिन की घटना है कि किसी शिकारी ने जंगल में जाल डाला हुआ था। सिंह शिकार की तलाश में भटक रहा था कि शिकारी के जाल में फंस गया। बेचारा अभी कुछ समझ पाता कि उसका शरीर बुरी तरह जाल में लिपट गया। यह सब इतना अचानक हुआ था कि बेचारे सिंह को संभलने का अवसर ही नहीं मिला। घबराकर वह गरजने लगा। मगर जाल बहुत मजबूत था। बेचारे सिंह की एक न चली। जाल तोड़ना उसके लिए संभव नहीं था।

असहाय सिंह की गर्जना उस चूहे ने सुन ली, जिसे सिंह ने एक बार जीवनदान दिया था। वह समझ गया कि सिंह किसी कष्ट में है। वह अपने बिल से बाहर आया। भागता हुआ सिंह के पास पहुंचा और सिंह के प्रति अपनी संवेदना जताई, बोला- ”महाराज! चिन्ता मत कीजिए, धैर्य रखें। मैं इस जाल को काट देता हूं। आप अगले कुछ क्षणों में ही स्वतंत्र हो जाएंगे।“

और सचमुच देखते ही देखते उस छोटे से चूहे ने उस कठोर जाल को सैकड़ों स्थानों से कुतर दिया। अब क्या था, दूसरे ही क्षण सिंह जाल से आजाद हो गया। जाल से बाहर आते ही सिंह ने चूहे का आभार व्यक्त किया। उसे धन्यवाद दिया।

चूहा भी बहुत प्रसन्न था कि आखिर वह सिंह के लिए कुछ तो कर सका।

शिक्षा –  जरूरी नहीं कि छोटे प्राणी की कोई उपयोगिता न हो।