शिक्षाप्रद कहानी – सच्चाई की जीत

Shikshaprad Kahani – Sachchai ki jeet

चिंचिनी नामक एक नगरी थी। उसमें भोजिक नाम का एक ब्राह्मण रहता था। भोजिक के तीन पुत्रियां थी। उसी समय चिंचनी में विद्याध्ययन के लिए किसी दूर देश से तीन ब्राह्मण पुत्र आए। वे भोजिक के यहां रहकर अध्ययन करने लगे।

Shikshaprad Kahani - Sachchai ki jeetभोजिक अपनी पुत्रियों के विवाह के लिए वर ढूंढ़ने में लगा हुआ था। उसे वह तीनों ब्राह्मण पुत्र अपनी पुत्रियों के लिए सर्वथा योग्य वर लगे। अतः वह उनके साथ अपनी पुत्रियों का विवाह कर तपस्या के लिए निकल पड़ा।

उन दिनों चिंचनी में भयंकर अकाल पड़ा। भुखमरी से घबराकर तीनों ब्राह्मण पुत्र अपनी पत्नियों को छोड़कर भाग गए। उस समय मंझली बहन गर्भवती थी। कुछ दिन बाद उसने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम पुत्रक रखा गया। तीनों बहनें उसे बहुत प्यार करती थीं।

तभी एक चमत्कार हुआ। तीनों बहनों को एक रात एक जैसा सपना दिखाई दिया। उन्होंने देखा कि हर रोज पुत्र के सिरहाने एक लाख स्वर्ण मुद्राएं मिलतीं और आगे चलकर वह एक दिन राजा बन गया।

तीनों बहनें हड़बड़ाकर उठीं और एक दूसरे को अपने सपने के बारे में बताया। उन्हें सपने पर विश्वास न हुआ, लेकिन सुबह को सचमुच ही ढ़ेरों स्वर्ण मुद्राएं पुत्रक के सिरहाने थाल में रखी चमचमा रही थीं।

तीनों बहनें खुश हो गईं। उनके घर की गरीबी जाती रही। समय खुशहाली से गुजरने लगा। पुत्रक बड़ा हो गया और सचमुच एक दिन चिंचनी का राजा बन गया।

यह समाचार भागे हुए ब्राह्मण पुत्रों ने सुना तो तीनों पुनः अपनी पत्नियों के पास लौट आए और पुत्रक की संपत्ति पर मौज करने लगे। पुत्रक के पास अथाह धन हो गया था। लिहाजा ब्राह्मण पुत्रों के मन में पाप आ गया, उन्होंने सोचा कि यदि पुत्रक की हत्या कर दी जाए तो वह आराम से उसकी संपत्ति के मालिक बन सकते हैं। तब तीनों भाइयों ने मिलकर एक योजना बनाई।

योजना के अनुसार तीनों भाई पुत्रक को दर्शन कराने के लिए विंध्यवासिनी देवी के मंदिर ले गए। मंदिर में पुत्रक का वध करने के लिए पहले से ही वधिक नियुक्त कर दिए गए थे। पुत्रक जैसे ही मंदिर में पहुंचा, वधिकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। उसने वधिकों को घेरने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ”हमें तुम्हारा वध करने के लिए स्वर्ण मुद्राएं दी गई हैं।“

पुत्रक ने कहा, ”मैं तुम्हें उससे कहीं ज्यादा कीमती आभूषण और स्वर्ण मुद्राएं दूंगा। तुम मुझे छोड़ दो। मैं इस बात का किसी से जिक्र नहीं करूंगा।“

वधिकों ने पुत्रक की बात मान ली और आभूषण और मुद्राएं ले उसे मंदिर के पिछले रास्ते से निकाल दिया, जबकि तीनों ब्राह्मण पुत्रों से यह कह दिया कि पुत्रक को मार दिया गया है।

इधर पुत्रक घूमता फिरता एक जंगल में पहुंचा। वहां उसे दो राक्षस मिले, जो आपस में लड़ रहे थे। पुत्रक ने उनसे लड़ने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ”हमारे पास संपत्ति के रूप में मात्र दो चीजें हैं। एक बरतन और एक जोड़ी खड़ाऊं। जो लड़ाई में जीतेगा वह इन दोनों चीजों का स्वामी होगा।“

”मगर इन मामूली चीजों के लिए लड़ना ठीक नहीं, इसका फैसला तो आराम से भी हो सकता है।“ पुत्रक ने कहा।

”ये मामूली चीजें नहीं हैं, ये दोनों चीजें बड़ी गुणवान है। बरतन में जो भी खाना चाहोगे वह आ जाएगा। जबकि खड़ाऊं पहनकर आकाश में उड़ा जा सकता है।“

तभी पुत्रक के दिमाग में एक युक्ति आई। वह राक्षसों से बोला, ”फिर भी इसके लिए खून खराबा ठीक नहीं। तुम दोनों दौड़ो, जो जीते वह दोनों चीजें ले जाए।“

दोनों राक्षस पुत्रक की बात से सहमत हो दौड़ पड़े। उधर दोनों राक्षसों का दौड़ना था कि इधर पुत्रक खड़ाऊं पहन, बरतन ले आकाश में उड़ गया। दोनों राक्षस देखते रह गए।

पुत्रक घने जंगल में उतरा। वहां एक कुटिया थी, जिसमें एक बुढ़िया रहती थी। पुत्रक उसी के पास रहने लगा। वह बुढ़िया की खूब सेवा करता और रोज बरतन से तरह तरह का स्वादिष्ट भोजन करता।

बुढ़िया भी पुत्रक से बहुत प्यार करती थी। एक दिन उसने पुत्रक से कहा, ”यहां की राजकुमारी पाटली बहुत सुंदर है। वह सचमुच तेरी पत्नी बनने योग्य है। वह महल से कभी नहीं निकलती। उसका पिता बहुत क्रूर है और सख्त पहरे में उसे रखता है।“

बुढ़िया की बात सुनकर पुत्रक पाटली से मिलने को उतावला हो उठा। वह रात्रि के समय खड़ाऊं पहन आकाश मार्ग से महल में पहुंच गया। पाटली से उसकी मुलाकात हुई। पाटली पुत्रक से मिलकर बहुत खुश हुई। पुत्रक ने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा, जिसे पाटली ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

इसके बाद दोनों आकाश मार्ग से होते हुए कुटिया में आ गए। कुछ दिन बाद पुत्रक पाटली और बुढ़िया के साथ चिंचनी नगरी लौट आया। पुत्रक को देख सारी नगरी में खुशी की लहर दौड़ गई। पुत्रक की मां और मौसी दोनों को देखकर भाव विभोर हो उठीं।

चिंचनी के लोगों को जब पुत्रक के साथ घटी घटना का पता चला तो उन्होंने तीनों ब्राह्मण पुत्रों को पीट पीटकर मार डाला। पुत्रक पुनः सिंहासन का स्वामी बन गया।