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गूगल ने बनाया डूडल: बेगम अख़्तर को हम यूँही याद करते रहेंगे…

बेगम अख्तर गजल, दादरा और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ठुमरी शैलियों के लिए हमेशा याद रहेंगीं. उन्हें मलिका ए ग़ज़ल भी कहा जाता है.गूगल ने आज उनके सम्मान में डूडल भी बनाया है.

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उन्होंने ‘वो जो हममें तुममें क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो’, ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’, ‘मेरे हमनफस, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’, जैसी कई दिल को छू लेने वाली गजलें गायी हैं.

बेगम अख्तर ने बतौर अभिनेत्री भी कुछ फिल्मों में काम किया था. उन्होंने ‘एक दिन का बादशाह’ से फिल्मों में अपने अभिनय करियर की शुरूआत की लेकिन तब अभिनेत्री के रुप में कुछ खास पहचान नहीं बना पाई.

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बाद में उन्होंने महबूब खान और सत्यजीत रे जैसे फिल्कारों की फिल्म में भी अभिनय किया लेकिन गायन का सिलसिला भी साथ-साथ चलता रहा. 1940 और 50 के दशक में गायन में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी. तभी उन्होंने इश्तिआक अहमद अब्बासी जे पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया.

इसके बाद वह करीब 5 साल तक संगीत की दुनिया से दूर रही. इसके बाद वह बीमार रहने लगी तो डाक्टरों ने बताया कि उनकी बीमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी कि गायकी से दूर हैं.

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उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फिर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं.

वर्ष 1958 में सत्यजीत राय द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘जलसा घर’ बेगम अख़्तर के सिने कैरियर की अंतिम फ़िल्म साबित हुई. इस फ़िल्म में उन्होंने एक गायिका की भूमिका निभाकर उसे जीवंत कर दिया था. इस दौरान वह रंगमंच से भी जुड़ी रही और अभिनय करती रही.

अपनी जादुई आवाज से श्रोताओं को मदमग्न करने वाली यह महान् गायिका का देहांत 50 वर्ष की उम्र में 30 अक्तूबर 1974 को हुआ था. बेगम अख़्तर की तमन्ना आखिरी समय तक गाते रहने की थी जो पूरी भी हुई. मृत्यु से आठ दिन पहले उन्होंने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की ग़ज़ल रिकार्ड की थी.

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बेग़म अख्तर की 5 दिल को छू जाने वाली ग़जल

1-
वो जो हम में तुम में क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का, तुम्हें याद हो के न याद हो…

2- (दादरा)
हमरी अटरिया पे आओ सवारियां, देखा देखी बलम होई जाए
हमरी अटरिया…
तस्सवुर में चले आते हो कुछ बातें भी होती हैं
शबे फुरकत भी होती हैं मुलाकातें भी होती हैं

3-
ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया

4-
मेरे हमनफ़स, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दवा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब, मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे

5-
ये ना थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता

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