तेजस्वी बोले- व्यापम से भी व्यापक है सृजन


घोटाले के एक आरोपी की इलाज के दौरान मौत

पटना. लालू के बेटे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी सृजन घोटाले को ‘व्यापमं’ से भी व्यापक बताया है। तेजस्वी ने ट्वीट कर लिखा ‘सृजन घोटाले’ में गिरफ़्तार जदयू नेता के पिता और आरोपी नाज़िर महेश मंडल की जेल में विषम परिस्थितियों में मौत हो गई। सृजन घोटाले के आरोपी का नाम नाजिर महेश मंडल था जिसे 13 अगस्त को ही गिफ्तार किया गया था। बताया जा रहा था कि नाजिर इस केस की वो कड़ी था जो इस घोटाले के कई राज़ खोल सकता था। नाजिर की मौत पर लालू प्रसाद यादव ने ट्वीट कर नीतीश कुमार पर निशाना साधा है।
लालू ने ट्वीट कर लिखा ‘सृजन महाघोटाले में पहली मौत। मरने वाला भागलपुर में नीतीश की पार्टी के एक बहुत अमीर नेता का पिता था। लालू ने रविवार को ट्वीट किया कि 2006 से चल रहे सृजन घोटाले में नीतीश ने 11 साल तक कार्रवाई क्यों नहीं की? सीएम नीतीश और वित्त मंत्री सुशील मोदी इस मामले के दोषी हैं। लालू ने सीधे नीतीश पर निशाना साधते हुए सवाल किए कि 2013 में सृजन घोटाले में जांच का आदेश देने वाले जिलाधिकारी का मुख्यमंत्री नीतीश ने तबादला क्यों किया? किस बात का डर था? नीतीश बताएं,डीएम के आदेश के बाद भी जांच रिपोर्ट को क्यों उजागर नहीं किया.
जानिए क्या है 700 करोड़ का सृजन घोटाला
भागलपुर के एक एनजीओ ने पिछले दस सालों में बिहार सरकार की नाक के नीचे से करोड़ों रुपए का घोटाला कर दिया। इन दस सालों में एनजीओ ने बिहार की बीजेपी-जेडीयू और आरजेडी-जेडीयू सरकार को तकरीबन 700 करोड़ का चूना लगाया लेकिन दोनों ही सरकारों को इसकी कानों-कान खबर तक नहीं लगी। एनजीओ के इस घोटाले का खुलासा पुलिस रिकॉर्ड, बैंक स्टेटमेंट और अधिकारियों से बातचीत के बाद हुआ। भागलपुर के इस एनजीओ का नाम सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड है जो महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देने और अचार बेचने का काम करती है।
कैसे हुआ खुलासा ?
इस चोरी का खुलासा तब पता चला जब पैसे ट्रांसफर करने की एक के बाद एक तीन घटनाएं उजागर हुईं। इनमें पहला मामला 27 सितंबर 2014 का है। जब भागलपुर की ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स ने 12.20 करोड़ रुपए का एक चेक जारी किया। इस चेक को मुख्यमंत्री नगर विकास योजना के तहत पटेल बाबू रोड पर स्थित इंडियन बैंक में जमा किया जाना था लेकिन बैंक ने इस चेक को सृजन एनजीओ के एकाउंट में जमा किया। साल 2008 में इस एमाउंट को थर्ड पार्टी डिपॉजिट के रूप में पेश किया गया लेकिन बाद में मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इसे अवैध घोषित कर दिया गया।