मां लक्ष्‍मी को समर्पित त्‍योहार है धनतेरस और  एक मात्र पर्व है जो मृत्‍यु के देवता यम के लिए मनाया जाता है

वैसे तो धनतेरस मां लक्ष्‍मी को समर्पित त्‍योहार है. दिवाली से दो दिन पहले के इस पर्व पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान धन्वंतरि और कुबेर की पूजा की जाती है.मान्यता है की इस दिन नया सामान खरीदने से धन 13 गुना बढ़ जाता है.धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है.

इस दिन सोना और चांदी जैसी धातुओं को खरीदना अच्छा माना जाता है.इस दिन झाडू खरीदना भी शुभ मानते हैं.इस दिन देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश जी की फूलों की माला, मिठाई, घी के दिये, धूप, अगरबत्ती, कपूर से समृद्धि, बुद्धिमत्ता और शुभ के लिये पूजा करते है.

कहते हैं इस दिन समुद्र मंथन में अमृत कलश लेकर चिकित्‍या के देव धन्‍वंतरी प्रकट हुए थे.इस लिए इस दिन उनकी पूजा करने पर देवी लक्ष्‍मी भी प्रसन्‍न होती हैं. लक्ष्‍मी और धन्‍वंतरी के साथ मृत्‍यु के देव यमराज के लिए भी ये त्‍योहार मनाया जाता है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान धनवंतरी के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है.धनवंतरी चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है.

शास्त्रों के अनुसार इस दिन जो यमराज को दीपदान करता है उसकी आकाल मृत्यु नहीं होती है.ये एक मात्र पर्व है जो मृत्‍यु के देवता यम के लिए मनाया जाता है.  इस दिन धातु खरीदना भी बेहद शुभ माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से किस्मत चमक जाती है.