यश चोपड़ा: जिसने परदे पर रोमांस और प्यार को दिए नए अर्थ

जन्म दिवस पर विशेष

हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक एवं फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा को हिन्दी सिनेमा का “किंग ऑफ रोमांस” कहा जाता है. ‘दीवार’, ‘कभी कभी’, ‘डर’, ‘चांदनी’, ‘सिलसिला’, ‘दिल तो पागल है’, ‘वीर जारा’ जैसी अनेकों बेहतरीन और रोमांटिक फ़िल्में बनाने वाले यश चोपड़ा ने पर्दे पर रोमांस और प्यार को नए अर्थ दिए हैं.

उनकी फिल्मों को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी कवि ने कागज़ छोड़कर पर्दे पर कविता लिख दी हो.उनकी फिल्मों के रोमांस को देखकर एक पीढ़ी जवान हुई,एक पीढ़ी बूढ़ी हुई और फिर एक पीढ़ी जवान हो गई.यश चोपड़ा ने अपने छह दशक के सफ़र में कई पीढ़ियों को मुहब्बत की ‘क ख ग’ सिखाई.

बॉलीवुड में रोमांस के अलग-अलग स्‍वरूप को परदे पर ढालने वाले यश चोपड़ा ने रोमांस को जितने रंगों में दिखाया उतना बॉलीवुड का कोई निर्देशक नहीं दिखा सका, इसीलिए यश चोपड़ा को बॉलीवुड का रोमांस किंग यानी ‘किंग ऑफ़ रोमांस’ कहा जाता है.

यश चोपड़ा ने रोमांस को जुनूनी तौर पर, पागलपन के तौर पर, कुर्बानी के तौर पर, दु:ख-दर्द बांटने के तौर पर, कॉमेडी और थ्रिलर के साथ यानी हर तरह से प्‍यार को दिखाने की कोशिश की.यश चोपड़ा वहीं शख्‍सियत हैं जिन्‍होंने सिल्‍वर स्‍क्रीन पर प्‍यार और रोमांस की नई परिभाषा गढ़ी.

उनके बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा बॉलीवुड के जाने-माने निर्माता निर्देशक थे. बड़े भाई की प्रेरणा पर ही उन्होंने भी फ़िल्मों में हाथ आजमाया और आज यश चोपड़ा का परिवार बॉलीवुड के प्रतिष्ठित बैनरों में से एक है.

उनके बेटे आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा भी फ़िल्मों से ही जुड़े हुए हैं. यश चोपड़ा ने अपने भाई के साथ सह निर्देशक के तौर पर काम करना शुरू किया. इन फ़िल्मों में ‘एक ही रास्ता’, ‘साधना’ और ‘नया दौर’ शामिल हैं.

यश चोपड़ा ने 1959 में पहली बार अपने भाई के बैनर तले ही बनी फ़िल्म ‘धूल का फूल’ का निर्देशन किया. इसके बाद उन्होंने भाई के ही बैनर तले ‘धर्म पुत्र’ को भी निर्देशित किया. दोनों ही फ़िल्में औसत कामयाब रहीं पर इसमें यश चोपड़ा की मेहनत सबको नजर आई.

1965 में आई फ़िल्म ‘वक्त’ यश चोपड़ा की पहली हिट फ़िल्म साबित हुई. इस फ़िल्म का गीत “ऐ मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं” दर्शकों को आज भी याद है. फ़िल्म ‘इत्तेफाक’ उनकी उन चुनिंदा फ़िल्मों में से है जिसमें उन्होंने कॉमेडी और रोमांस के अलावा थ्रिलर पर भी काम किया था.

1973 में उन्होंने फ़िल्म निर्माण में कदम रखा और यश राज बैनर की स्थापना की। इसकी शुरूआत राजेश खन्ना अभिनीत ‘दाग’ जैसी सुपरहिट फ़िल्म से की. इस फ़िल्म की कामयाबी ने उन्हें बॉलीवुड में नया नाम दिया. इसके बाद आई 1975 की फ़िल्म ‘दीवार’ जिसमें अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था.

इसके बाद तो यश चोपड़ा ने ‘सिलसिला’, ‘कभी-कभी’ जैसी फ़िल्मों में अमिताभ के साथ ही काम किया। हालांकि 80 के दशक की शुरूआत में यश चोपड़ा को असफलता का कड़वा स्वाद भी चखना पड़ा पर 1989 में आई ‘चांदनी’ ने उन्हें दुबारा एक सफल और हिट निर्देशक बना डाला.

1991 में आई ‘लम्हे’ भी इसी दौर की एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई. इसके बाद उन्होंने 1995 में बतौर निर्माता फ़िल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में दांव लगाया. शाहरुख खान और काजोल के अभिनय से सजी यह फ़िल्म बॉलीवुड में नया इतिहास रच गई.

1997 में उन्होंने फ़िल्म ‘दिल तो पागल है’ का निर्देशन किया. कुछ सालों तक वह निर्देशन से दूर रहे और फिर लौटे 2004 की सुपरहिट फ़िल्म ‘वीर जारा’ को लेकर.