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परवीन अर्शी
दिल्ली. उर्दू के दो बड़े शायर हुए हैं मिर्ज़ा असदउल्लाह खां ‘ग़ालिब’ और मीर तक़ी मीर. ग़ालिब पर तो दिल्ली में कई अकादमियां हैं और आये दिन सेमिनारों में ज़िक्र होता रहता है. और दिल्ली के निजामुद्दीन बस्ती में ग़ालिब की आलीशान क़ब्र भी है.

लखनऊ में अपनी आखिरी सांस लेने वाले मीर की कब्र कभी नवाबों के शहर में सिटी स्टेशन इलाके में थी. लेकिन अब उस पर बिछी पटरियों पर से हर लम्हा रेलगाड़ियां गुज़रती हैं. मीर की कब्र आज भले ही अपने निशान खो चुकी हो, लेकिन अपनी रचनाओं के रूप में वह हमेशा उर्दू अदब का सरमाया बनकर रहेंगे.

कभी मीर ने लिखा था ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, जाने ना जाने गुल ही ना जाने, बाग तो सारा जाने है’.

शुरूआती जिन्दगी का काफी वक्त दिल्ली में गुजारने वाले मीर सन 1782 में नवाब आसफउद्दौला के बुलावे पर लखनऊ चले गए और वहीं आखिरी सांस ली. उनकी जिंदगी के आखिरी दिन निहायत तन्हाई में गुजरे और 21 सितम्बर 1810 को वह दुनिया को अलविदा कह गए.

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शायर मुनव्वर राना का मानना हैकि मीर के साथ हमारे मुल्क ने इंसाफ नहीं किया. मीर अगर किसी दूसरे मुल्क में होते तो उनके नाम से शहर बसा दिया गया होता, लेकिन हिन्दुस्तान में तो उनकी कब्र का ही अब पता नहीं है.

उर्दू शायरी को अपने रूहानी और रूमानी जज्बात से सींचने वाले मीर तकी मीर उर्दू अदब का ऐसा चिराग थे, जिसकी रोशनी आज भी शायरी को रवानी दे रही है और किसी भी विधा का शायर खुद को मीर के असर से आजाद नहीं कर सका है.

मीर के बारे में शायर अनवर जलालपुरी मानना है कि मीर उर्दू के सबसे बड़े शायर हैं. उर्दू गजल विधा को जिस तरह उन्होंने अपने जिगर का लहू दिया है, उसकी वजह से वह उतनी शानदार और गहरी हो गई है कि आज तक चाहे तरक्की पसंद शायर हो या जदीद शायर, कोई भी मीर के असर से खुद को आजाद नहीं कर सकता.

उन्हें खुद पर यह भरोसा था कि जिस लहजे में वह गुफ्तगू कर रहे हैं और जिन मौजूआत (विषयों) को वह गजल में पिरो रहे हैं, उनकी उम्र कभी खत्म नहीं होगी.

मीर को इस बात का एहसास था कि उन्हें दुनिया जानती है, यह अलग बात है कि उनके करीब रहने वाले लोग उनकी अहमियत को नहीं तस्लीम करते. इसी को देखते हुए उन्होंने बहुत अच्छी बात कही कि पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, जाने ना जाने गुल ही ना जाने, बाग तो सारा जाने है.

जलालपुरी ने कहा कि मीर के बारे में कहा जाता है कि वह गम की शगुफ्तगी (खूबसूरती) के शायर हैं. मीर का गम उन्हें मायूस करने के बजाय उन्हें एक खास किस्म की ताकत देता है. उनकी तहरीरों में गम की एक खास किस्म की खुशबू है और उस खुशबू से वह शायरी के जहान को सुगन्धित करना चाहते थे.

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