गुजरात में क्या मोदी-शाह की प्रतिष्ठा बच पाएगी ?

परवीन अर्शी

दिल्ली.2014 के लोकसभा के आम चुनाव में प्रचंड जीत के बाद भाजपा ओवर कॉन्फिडेंस में चल रही थी.शायद इसीलिए उसके दो साल हनीमून में गुज़र गए और जब उत्तर प्रदेश में 300 से ज़्यादा सीटें पाकर तो उसके पांव ज़मीन पर नहीं थे. इसीलिए नरेंद्र मोदी अपनी हर सभा में ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दोहरा रहे थे.

लेकिन अमेरिका रिटर्न पप्पू ने जब गुजरात दौरे शुरू किये तो मोदी-शाह का फौलादी अतिआत्मविश्वास भी हिलने लगा.अमित शाह का मुख्य केंद्र तो अहमदाबाद बन गया और पीएम मोदी को एक महीने में चार बार दौरे करने पड़े.

राजनीतिक पंडितों का मानना हैकि गुजरात में चुनाव हार जीत का फैसला तो मतदान-मतगणना के बाद ही होगा लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के दौरों और जुमलों ने भाजपा की जमी जमायी बिसात को बिखेर दिया है. कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा की बुनियाद ( गुजरात ) हिलती दिखाई दे रही है.

कांग्रेस मुक्त भारत की बात तो दूर अब ‘कांग्रेस मुक्त गुजरात’ भी हो जाए तो ये भाजपा की सबसे बड़ी जीत होगी.लेकिन आंकड़े अलग दिशा में दौड़ते दिखाई दे रहे हैं.इस सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि गुजरात में भाजपा की सीटें कम हो सकती हैं.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2012 के चुनाव में भाजपा को विधानसभा की 182 सीटों में से 116 सीटें मिली थीं और कांग्रेस की 60 . लेकिन राहुल के दौरों और बागी पटेल-पीड़ित दलितों ने भाजपा का पूरा गणित बिगाड़ दिया है.

गुजरात में भाजपा अगर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने में कामयाब हो भी जाएगी तो कांग्रेस को 60 से 70-80 के आंकड़े को छूने से नहीं रोक पाएगी.यही मोदी शाह की बड़ी शिकस्त और कांग्रेस की बड़ी जीत होगी.ज़ाहिर है इसका सबसे ज़्यादा असर 2019 के लोकसभा के आम चुनाव में देखने को मिलेगा.

वैसे भी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले 11 राज्यों में विधान सभा चुनाव होना हैं जिसमें गुजरात,राजस्थान,छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश बड़े राज्य हैं,जहाँ भाजपा की सरकारें हैं.

कर्नाटक और हिमाचल कांग्रेस की सरकार हैं. इसके अलावा नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम और सिक्किम में चुनाव होना हैं.11 में से सिर्फ एक राज्य गुजरात ऐसा है जहाँ मोदी-शाह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.