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आँखों में चुभ रहे हैं दरो-बाम के चराग़ – अहमद फ़राज़ शायरी

आँखों में चुभ रहे हैं दरो-बाम के चराग़

आँखों में चुभ रहे हैं दरो-बाम के चराग़
जब दिल ही बुझ गया हो तो किस काम के चराग़

क्या शाम थी कि जब तेरे आने की आस थी
अब तक जला रहे हैं तेरे नाम के चराग़

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शायद कभी ये अर्स-ए-यक-शब न कट सके
तू सुब्ह की हवा है तो हम शाम के चराग़

इस तीरगी में लग्ज़िशे-पा भी है ख़ुदकुशी
ऐ रहरवाने-शौक़ ज़रा थाम के चराग़

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हम क्या बुझे कि जाती रही यादे रफ़्तगाँ
शायद हमीं थे गर्दिशे-अय्याम के चराग़

हम दरख़ुरे-हवा-ए-सितम भी नहीं ‘फ़राज़’
जैसे मज़ार पर किसी गुमनाम के चिराग़

(दरो-बाम=द्वार व छत, अर्स-ए-यक-शब=एक
रात का समय, तीरगी=अँधेरे, लग्ज़िशे-पा=
पाँव की डगमगाहट, रहरवाने-शौक़=अभिलाषी,
रफ़्तगाँ=पूर्वजों की याद, गर्दिशे-अय्याम=समय-
चक्र, दरख़ुरे-हवा-ए-सितम=हवाओं के अत्याचार
से डरने वाले, मज़ार=समाधि)

नज़र की धूप में साये घुले हैं शब की तरह

नज़र की धूप में साये घुले हैं शब की तरह
मैं कब उदास नहीं था मगर न अब की तरह

फिर आज शह्रे-तमन्ना की रहगुज़ारों से
गुज़र रहे हैं कई लोग रोज़ो-शब की तरह

तुझे तो मैंने बड़ी आरज़ू से चाहा था
ये क्या कि छोड़ चला तू भी और सब की तरह

फ़सुर्दगी है मगर वज्हे-ग़म नहीं मालूम
कि दिल पे बोझ-सा है रंजे-बेसबब की तरह

खिले तो अबके भी गुलशन में फूल हैं लेकिन
न मेरे ज़ख़्म की सूरत न तेरे लब की तरह

(शह्रे-तमन्ना=इच्छाओं का नगर, फ़सुर्दगी=
उदासी, वज्हे-ग़म=दु:ख का कारण,
रंजे-बेसबब=अकारण दु:ख)

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