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अच्छा था अगर ज़ख़्म न भरते कोई दिन और – अहमद फ़राज़ शायरी

अच्छा था अगर ज़ख़्म न भरते कोई दिन और

अच्छा था अगर ज़ख़्म न भरते कोई दिन और
इस कू-ए- मलामत में गुज़रते कोई दिन और

रातों को तेरी याद के ख़ुर्शीद उभरते
आँखों में सितारे-से उतरते कोई दिन और

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हमने तुझे देखा तो किसी को भी न देखा
ऐ काश! तिरे बाद गुज़रते कोई दिन और

राहत थी बहुत रंज में हम ग़म-तलबों को
तुम और बिगड़ते तो सँवरते कोई दिन और

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गो तर्के-तआल्लुक़ था मगर जाँ प’ बनी थी
मरते जो तुझे याद न करते कोई दिन और

उस शहरे-तमन्ना से ‘फ़राज़’ आए ही क्यों थे
ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और

(कू-ए- मलामत=निंदा के नगर, ख़ुर्शीद=सूर्य,
राहत=आराम, ग़म-तलबों=दु:ख चाहने वालों,
गो=यद्यपि, तर्के-तआल्लुक़=संबंध विच्छेद,
शहरे-तमन्ना=इच्छाओं का नगर)

तरस रहा हूँ मगर तू नज़र न आ मुझको

तरस रहा हूँ मगर तू नज़र न आ मुझ को
कि ख़ुद जुदा है तो मुझसे न कर जुदा मुझको

वो कँपकपाते हुए होंठ मेरे शाने पर
वो ख़्वाब साँप की मानिंद डस गया मुझको

चटक उठा हूँ सुलगती चटान की सूरत
पुकार अब तो मिरे देर-आश्ना मुझको

तुझे तराश के मैं सख़्त मुनफ़इल हूँ कि लोग
तुझे सनम तो समझने लगे ख़ुदा मुझको

ये और बात कि अक्सर दमक उठा चेहरा
कभी-कभी यही शोला बुझा गया मुझको

ये क़ुर्बतें ही तो वज्हे-फ़िराक़ ठहरी हैं
बहुत अज़ीज़ है याराने-बेवफ़ा मुझको

सितम तो ये है कि ज़ालिम सुख़न-शनास नहीं
वो एक शख़्स कि शाइर बना गया मुझको

उसे ‘फ़राज़’ अगर दुख न था बिछड़ने का
तो क्यों वो दूर तलक देखता रहा मुझको

(शाने=काँधे, मानिंद=भाँति, देर-आश्ना=
चिर-परिचित, मुनफ़इल=लज्जित, सनम=
प्रतिमा, क़ुर्बतें=नज़दीकियाँ, वज्हे-फ़िराक़=
विरह का कारण, सुख़न-शनास=बात समझने
वाला, शख़्स=व्यक्ति)

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