मुलायम सिंह यादव – अखिलेश यादव के पारिवारिक झगडे के बाद के पिछले दिनों के घटनाक्रम में तीन ऐसे नए मुद्दे उभर कर सामने आये हैं जिन्होंने यूपी इलेक्शन का सारा नजारा ही बदल कर रख दिया है. खास बात यह है कि इन तीन मुद्दों की वजह से तीन मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं जिन पर अभी तक यूपी इलेक्शन को सबसे ज्यादा प्रभावित करने का कयास लगाया जा रहा था. इससे पहले कि हम आपको बताएं कि कौन से वे नए मुद्दे हैं, हम आपको पहले उन तीन मुद्दों के बारे में बताते हैं जो अब उत्तर प्रदेश चुनाव में गौण हो गए हैं:

akhilesh yadav changes uttar pradesh election 1. नोटबंदी – नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार द्वारा नोटबंदी का फैसला लेने के बाद एक बार ऐसा लग रहा था कि जनमत काले धन के खात्मे के सवाल पर तेजी से भाजपा की और झुक जाएगा. कुछ दिनों के लिए ऐसा लगा भी कि गरीब और मध्य वर्ग नोटबंदी के फैसले से खुश है. किन्तु जल्दी ही कैश की कमी से रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली परेशानियों, अमीरों द्वारा बिना किसी खास परेशानी के अपने पुराने 1000 और 500 के नोट बदलवा लेने में कामयाब हो जाने और सरकार की नोटबंदी के फैसले को जल्दबाजी में लागू करने से पैदा हुई दिक्कतों के कारण भाजपा नोटबंदी का लाभ ले पाने में नाकाम होती नजर आ रही है. हालांकि यह बात भी सच है इस मुद्दे पर ज्यादातर लोग सरकार से खिन्न तो हैं लेकिन नोटबंदी का फैसला भाजपा के लिए चुनाव में बड़ी समस्या बनेगा, ऐसा भी नहीं लगता. कुल मिला कर चुनाव आते आते नोटबंदी का प्रभाव न्यूनतम रह जाएगा.

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2. मुज़फ्फरनगर हिन्दू मुस्लिम दंगे – नोटबंदी के फैसले का एक प्रभाव यह जरूर हुआ कि पिछले दो महीने, जो कि अन्यथा उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के लिए बड़े महत्वपूर्ण थे, बिना किसी खास चुनावी सुगबुगाहट के बीत गए. ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि मुज़फ्फरनगर के हिन्दू मुस्लिम दंगे और अख़लाक़ हत्याकांड आदि फिर से चुनाव का मुद्दा बनेंगे किन्तु ऐसा होता अब नजर नहीं आता. बल्कि हाल ही में 23 दिसंबर को चौधरी चरण सिंह की जयंती मनाये जाने के अवसर पर हुए आयोजनों में पहली बार जाट-मुसलमान फिर से एक बार फिर अनेकों रैलियों में एक साथ नजर आये. इस तरह से लगता है कि मुज़फ्फरनगर के दंगों पर इस बार ज्यादा चुनावी फसल नहीं काटी जा सकेगी.

3. जाति आधारित वोटिंग – जैसे जैसे चुनाव समीप आते जा रहे हैं यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस बार जिस भी पार्टी की सरकार बनेगी उसे सभी सामाजिक वर्गों के वोटों की जरुरत पड़ेगी. भाजपा ने मौर्य को भाजपा अध्यक्ष बना कर मायावती के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश जरूर की लेकिन लग रहा है कि ऐसा करने से उसे कुछ खास फायदा नहीं होगा. उत्तर प्रदेश चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के अलावा किसी भी पार्टी को जाति विशेष की राजनीती करने का का कोई खास फायदा नहीं नजर आ रहा.

अब हम आपको बताते हैं कौन से वे मुद्दे हैं जो अचानक ही उत्तर प्रदेश विधानसभा 2017 के चुनाव में महत्वपूर्ण हो गए हैं –

1. अखिलेश यादव का बढ़ता कद – समाजवादी पार्टी के कुनबे में मची घमासान और उसमें अखिलेश यादव के निर्विवाद रूप से समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में उभर कर आने से अचानक ही उत्तर प्रदेश चुनाव के समीकरण बदल गए हैं. अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ बगावत करने के बाद जिस तरह से अखिलेश ने सपा की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथों में संभाल ली है, उसका स्पष्ट फायदा अखिलेश को मिलेगा. इस बगावत से अखिलेश समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री काम और समाजवादी पार्टी के शिखर पर ज्यादा उभर कर आये हैं. अखिलेश इस तरह समाजवादी पार्टी की बाहुबलियों की पार्टी होने के दाग से बरी होकर एक विकास की सोच रखने वाले युवा नेता के रूप में राजनीति करने के लिए आज़ाद हो गए हैं.

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2. उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भाजपा के खिलाफ गठबंधन की बढ़ती संभावनाएं – जिस तरह से अखिलेश पिछले दो-तीन दिनों में मजबूत हो कर उभरे हैं उससे उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले न केवल भाजपा के खिलाफ एक सशक्त गठबंधन की संभावनाएं बढ़ गयी हैं बल्कि ऐसे किसी भी संभावित गठबंधन में अखिलेश यादव की सीटों के लेनदेन में स्थिति भी मजबूत हो गयी है. माना जा रहा है कि कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, जनता दल (यू) आदि के साथ मिल कर अखिलेश यादव भाजपा को न केवल मजबूत टक्कर दे सकते हैं बल्कि पटखनी भी दे सकते हैं.

3. अपने नए शक्तिशाली अवतार में अखिलेश मुसलमानों को बसपा के खेमे में जाने से रोकने में हो सकते हैं कामयाब – पश्चिम उत्तर प्रदेश में लोकदल से गठबंधन की स्थिति में जाट-मुसलमान-अहीर गठजोड़ लगभग 70-80 विधानसभा सीटों पर न केवल अजेय साबित हो सकता है बल्कि मायावती को गहरी चोट भी पहुंच सकता है. मुसलमान भी अखिलेश के साथ उसी स्थिति में आएंगे जब उन्हें यह विश्वास होगा कि अखिलेश भाजपा को रोकने में मायावती से बेहतर स्थिति में हैं. राष्ट्रीय लोकदल का जनाधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में सिमट होने के कारण अजित सिंह (जयंत चौधरी) के लोकदल से गठबंधन बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है वहीँ कांग्रेस और जनता दल के साथ गठबंधन पूर्वी उत्तर प्रदेश में लाभ पहुंच सकता है.

वैसे तो अभी उत्तर प्रदेश चुनाव की घोषणा नहीं हुई है और चुनाव के आने तक उत्तर प्रदेश की जमीनी हक़ीक़त बदल सकती है फिर तभी ऐसा लग रहा है अभी तक तीसरे स्थान पर दिखाई दे रही समाजवादी पार्टी अखिलेश के नए अवतार में अचानक ही फिर से चुनावी मुकाबले में शामिल नजर आ रही है.

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