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अरूज़े कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा- राम प्रसाद बिस्मिल शायरी

अरूज़े कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा- राम प्रसाद बिस्मिल शायरी

अरूज़े कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा ।
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियां होगा ।

चखायेंगे मजा बरबादी-ए-गुलशन का गुलचीं को ।
बहार आयेगी उस दिन जब कि अपना बागवां होगा ।

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वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है ।
सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा ।

जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे-वतन हरगिज।
न जाने बाद मुर्दन मैं कहां और तू कहां होगा ।

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यह आये दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे-कातिल !
बता कब फैसला उनके हमारे दरमियां होगा ।

शहीदों की चितायों पर जुड़ेगें हर बरस मेले ।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।

इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज्य देखेंगे ।
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा ।

बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से- राम प्रसाद बिस्मिल शायरी

बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से।
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।

लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।

खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।

कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।

यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी से।

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