औरंगजेब जिसने टोपियों की सिलाई करके चार रूपये दो आने जमा किये थे,अपने कफ़न के लिए…

औरंगजेब को लेकर जितने कठोर शब्दों मे उनका विरोध होता हैं वही दूसरी ओर लोग उनके शख्सियत और अंतिम समय मे आए बदलाव को देखकर उन्हे एक दरवेश के रूप मे भी देखते हैं.क्या वजह थी इन बदलावों की जानते इतिहास के पन्नो से.

औरंगजेब का जन्म 4 नवंबर, 1618 ई. में गुजरात के दोहद में हुआ था. वैसे तो औरंगजेब शाहजहां और मुमताज का बेटा था, लेकिन औरंगजेब का अधिकांश के बचपन का समय नूरजहां के साथ ही बीता था.अबुल मुज़फ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब, ये है पूरा नाम उस मुगल शासक का जिसे आप औरंगजेब के नाम से जानते हैं.

औरंगजेब, शाहजहां और मुमताज का पुत्र था.उसने जल्दबाजी में आगरा पर कब्जा कर लिया और अपना राज्याभिषेक कराया.उसने 15 मई, 1659 में ‘देवराई’ का जीत लिया और इसी के बाद ही वो दिल्ली में प्रवेश कर गया. उसने इस्लाम धर्म के महत्व को स्वीकारते हुए ‘कुरान’ को ही अपने शासन का आधार बना दिया.18 मई, 1637 ई. को फारस के राजघराने की ‘दिलरास बानो बेगम’ के साथ निकाह किया.

औरंगजेब ने हिंदुओं पर जजिया कर लगाया था. (जजिया कर उन लोगों पर लगाया जाता था जो गैर-मुस्लिम होते थे ) सबसे पहले जजिया कर मारवाड़ पर लागू किया गया. साल 1679 ई. में लाहौर की बादशाही मस्जिद का निर्माण कराया था. इसकी के साथ ही उसने साल 1678 में औरंगाबाद में अपनी पत्नी रबिया दुर्रानी की याद में बीबी का मकबरा बनवाया था

शाही चोगा पहने हुआ एक दरवेश औरंगजेब ….

इसी के उलट लोग उसे उसे शाही चोगा पहना हुआ दरवेश भी कहते थे ।औरंगज़ेब अपनी लेखनी और तलवार दोनों में दक्ष था ।लोग समझ नहीं पाते थे उनके व्यवहार को. अपने  राजकाल के शुरुआती दौर में उसने अपने भाइयों को तो ठिकाने लगा दिया था.  किन्तु अपने अपने बेटो पर भी भरोसा नहीं करता था.

औरंगज़ेब ने हमेशा अपने बेटो को खुद से दूर  ही रखाऔर उनकी हरेक गतिविधि को शक की नज़रो से देखा । कहा जाता है अलमगीर यानि खुदा के बन्दे के नाम से औरंगज़ेब को मशहूर कर दिया गया था.इसकी वजह उसका अत्याधिक् धार्मिक होना

औरंगज़ेब का अपने बेटो के नाम खत भी लिखा था …अब मैं बूढ़ा और दुर्बल हो  रहा हूँ ।मेरी पैदाइश के वक़्त मेरे पास  बहुत से व्यक्ति थे लेकिन अब मैं अकेला जा रहा हूँ । मैं नहीं जानता  की मेरा जन्म किसलिए हुआ था, मैं क्या हूँ और इस संसार में क्यों आया हूँ । मुझे आज उस वक़्त  का दुःख है जब  मैं अल्लाह की इबादत को भुला रहा था .

मेरा जीवन ऐसे ही  बीत गया । अल्लाह तो मेरे अंदर ही था लेकिन में उसे पहचान नहीं पाया । हमारी ज़िन्दगी मे बिता हुआ वक़्त कभी वापस नहीं आता हैं.मेरा शरीर अब सिर्फ हड्डियों का ढांचा  के समान रह गया हैं .

इस संसार में मैं कुछ भी लेकर नहीं आया लेकिन अपने गुनाहो का बोझ लेकर जा रहा हूँ । मैं नहीं जानता मेरे लिए अल्लाह ने  क्या सजा तय कर  रखी हैं।ये खत मे औरंगज़ेब अपने को खुदा के करीब जाता हुए एक ऐसा  शख्स लग रहा हैं जिसे शायद कुछ ग़म हो अपनी करनी का. अंतिम समय मे औरंगज़ेब बिलकुल बदल चूका था .

औरंगज़ेब के चरित्र और कार्यों का कठोर अलोचक भी  इस वृद्ध पुरुष के साथ सहानुभूति किये बिना नहीं रह सकता है ।मरने से पहले  सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर की  वसीयत  पर गौर किया जाये तो ,वसीयत की धाराओं को देखकर यह पता चलता है कि औरंगज़ेब को अपने अंतिम दिनों में अपने पिता को क़ैद करने,अपने भाइयों को क़त्ल करने और प्रजा का शोषण करने का दुख और पश्याताप था.

औरंगज़ेब का वसीयतनामा इस प्रकार था .वह वली हज़रत हसन की दरगाह पर एक चादर चढ़ाना चाहता था ,इस पाक काम के लिए उसने अपनी कमाई का रुपया अपने बेटे मुहम्मद आज़म के पास रख दिया था,उससे लेकर ये चादर चढ़ाने के लिए कहा था।

टोपियों की सिलाई करके चार रूपये दो आने जमा किये थे औरंगज़ेब ने ,यह रक़म महालदार लाइलाही बेग के पास जमा थे. इस से रक़म  खुद का कफ़न खरीदने की वसीयत की थी .

कुरान शरीफ़ की नकल करके  तीन सौ पाँच रूपये इकट्ठा किये थे .वसीयत के मुताबिक उसके मरने के बाद यह रक़म फ़क़ीरों में बाँट दी जाय। चुकी ये पैसा  पवित्र  क़ुरान का पैसा था.  इसलिये इसे उनके कफ़न या किसी भी दूसरी चीज़ पर न ख़र्च किया जाय।

नेक राह को छोड़कर गुमराह हो जाने वाले लोगों को बताने के लिए लिये, खुली जगह पर दफ़नाना और सर खुला रहने देना, क्यूंकि परवरदिगार  के दरबार में जब कोई गुनहगार नंगे सिर जाता है, तो उसे ज़रूर दया आ जाती होगी।

वसीयत के मुताबिक  लाश को ऊपर से सफ़ेद खद्दर  के कपड़े से ढक देना। चादर या छतरी नहीं लगाना, न गाजे बाजे के साथ जुलुस निकालना और न मौलूद करना।

अपने परिवार वालो की मदद करना और उनकी इज्ज़त करना। कुरान शरीफ़ की आयत को पढ़ो.  मेरे बेटे! यह तुम्हें मेरी हिदायत है। यही पैग़म्बर का हुक्म है। इसका इनाम तुम्हें ज़िन्दगी में ज़रूर मिलेगा।

बादशाह की हुकूमत में चारों ओर दौरा करते रहना चाहिये। बादशाहों को कभी एक मुक़ाम पर नहीं रहना चाहिये। एक जगह में आराम तो ज़रूर मिलता है, लेकिन कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।

अपने बेटों पर कभी भूल कर भी एतबार न करना, न उनके साथ कभी नज़दीकी ताल्लुक रखना।

हुकूमत के होने वाली तमाम बातों की तुम्हें इत्तला रखनी चाहिये – यही हुकूमत की चाबी  है।

बादशाह को हुकूमत के काम में ज़रा भी सुस्ती नहीं करनी चाहिये। एक लम्हे की सुस्ती सारी ज़िन्दगी की मुसीबत की बाइस बन जाती है।

औरंगज़ेब आपने सम्राज्य को अपने बेटो के बिच बाँट देना चाहता था. इसका मक़सद उत्तराधिकार के युद्ध की पुनरावृति को रोकना था. लेकिन यह विडम्बना ही थी की उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. सिंहासन के लिए यद्ध की परम्परा का निर्वाह उसकी संतानों ने भी किया.

उसके तीन पुत्र मुहम्मद मुअज्जल,मुहम्मद आजम और कामबख़्श के मध्य उत्तराधिकार का युद्ध हुआ .युद्ध में उनका बड़ा पुत्र शाहजादा मुअज्जल विजयी हुआ.उसने अपने भाई मुहम्मद आजम को 18 जून 1707  ई o  को जजाऊ नामक  स्थान पर तथा कामबख़्श को हैदराबाद में जनवरी  1709 ई o  में मार डाला.

मार्च साल 1707 में उसकी मौत हो गई. इसके बाद उसे दौलताबाद में स्थित फकीर बुरुहानुद्दीन की कब्र के अहाते में दफना दिया गया.औरंगाबाद के पास खुल्दाबाद नामक छोटे से गाँव हैं. जहाँ औरंगज़ेब आलमगीर का मक़बरा बनाया गया,उसमें उसे सीधे सादे तरीक़े से दफनाया गया। उसकी क़ब्र कच्ची मिटटी की बनाई गई.

जिस पर आसमान के सिवाय कोई दूसरी छत नहीं रखी गई. क़ब्र के मुजाविर उसकी क़ब्र पर जब तब हरी दूब लगा देते हैं। इसी कच्चे मज़ार में पड़ा हुआ भारत का यह सम्राट आज भी अल्लाह से रूबरू होने का इंतज़ार कर रहा है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भारत के आखिरी मुगल बादशाह मिर्जा अबू जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह जफर यानी बहादुर शाह जफर का आज ही के दिन 1862 का इंतकाल हुआ था. कहा जाता है कि बहादुर शाह जफर को नाममाज्ञ बादशाह की उपाधि दी गई थी. 1837 के सितंबर में पिता अकबर शाह द्वितीय की मौत के बाद वह गद्दीनशीं हुए. अकबर शाह द्वितीय कवि हृदय जफर को सदियों से चला आ रहा मुगलों का शासन नहीं सौंपना चाहते थे. सौंदर्यानुरागी बहादुर शाह जफर का शासनकाल आते-आते वैसे भी दिल्ली सल्तनत के पास राज करने के लिए सिर्फ दिल्ली यानी शाहजहांबाद ही बचा रह गया था.

1857 के विद्रोह ने जफर को बनाया आजादी का सिपाही

1857 में ब्रिटिशों ने तकरीबन पूरे भारत पर कब्जा जमा लिया था. ब्रिटिशों के आक्रमण से तिलमिलाए विद्रोही सैनिक और राजा-महाराजाओं को एक केंद्रीय नेतृत्व की जरूरत थी, जो उन्हें बहादुर शाह जफर में दिखा. बहादुर शाह जफर ने भी ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व स्वीकार कर लिया. लेकिन 82 वर्ष के बूढ़े शाह जफर अंततः जंग हार गए और अपने जीवन के आखिरी वर्ष उन्हें अंग्रेजों की कैद में गुजारने पड़े.

ब्रिटिशों ने बिना ताम-झाम के चुपचाप जफर को दफन किया

बर्मा में अंग्रेजों की कैद में ही 7 नवंबर, 1862 को सुबह बहादुर शाह जफर की मौत हो गई. उन्हें उसी दिन जेल के पास ही श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफना दिया गया. इतना ही नहीं उनकी कब्र के चारों ओर बांस की बाड़ लगा दी गई और कब्र को पत्तों से ढंक दिया गया. ब्रिटिश चार दशक से हिंदुस्तान पर राज करने वाले मुगलों के आखिरी बादशाह के अंतिम संस्कार को ज्यादा ताम-झाम नहीं देना चाहते थे. वैसे भी बर्मा के मुस्लिमों के लिए यह किसी बादशाह की मौत नहीं बल्कि एक आम मौत भर थी.

आला दर्जे के शायर थे बहादुर शाह जफर

तबीयत से कवि हृदय बहादुर शाह जफर शेरो-शायरी के मुरीद थे और उनके दरबार के दो शीर्ष शायर मोहम्मद गालिब और जौक आज भी शायरों के लिए आदर्श हैं. जफर खुद बेहतरीन शायर थे. दर्द में डूबे उनके शेरों में मानव जीवन की गहरी सच्चाइयां और भावनाओं की दुनिया बसती थी. रंगून में अंग्रेजों की कैद में रहते हुए भी उन्होंने ढेरों गजलें लिखीं. बतौर कैदी उन्हें कलम तक नहीं दी गई थी, लेकिन सूफी संत की उपाधि वाले बादशाह जफर ने जली हुई तीलियों से दीवार पर गजलें लिखीं.

उस समय जफर के अंतिम संस्कार की देखरेख कर रहे ब्रिटिश अधिकारी डेविस ने भी लिखा है कि जफर को दफनाते वक्त कोई 100 लोग वहां मौजूद थे और यह वैसी ही भीड़ थी, जैसे घुड़दौड़ देखने वाली या सदर बाजार घूमने वाली. जफर की मौत के 132 साल बाद साल 1991 में एक स्मारक कक्ष की आधारशिला रखने के लिए की गई खुदाई के दौरान एक भूमिगत कब्र का पता चला. 3.5 फुट की गहराई में बादशाह जफर की निशानी और अवशेष मिले, जिसकी जांच के बाद यह पुष्टि हुई की वह जफर की ही हैं.

झोपड़ियों में रह रहे हैं वंशज

60 साल की सुल्‍ताना बेगम भारत के आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर की पौत्रवधू हैं. अपनी शाही विरासत के बावजूद वो मामूली पेंशन पर रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगी रहती हैं. उनके पति राजकुमार मिर्जा बेदर बख्‍त की साल 1980 में मौत हो गई थी और तब से वो गरीबों की जिंदगी जी रही हैं. वो हावड़ा की एक झुग्‍गी-छोपड़ी में रह रही हैं. यही नहीं उन्‍हें अपने पड़ोसियों के साथ किचन साझा करनी पड़ती है और बाहर के नल से पानी भरना पड़ता है.

क्यों खास है जफर की दरगाह?

आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मौत 1862 में बर्मा (अब म्यांमार) की तत्कालीन राजधानी रंगून (अब यांगून) की एक जेल में हुई थी, लेकिन उनकी दरगाह 132 साल बाद 1994 में बनी. इस दरगाह की एक-एक ईंट में आखिरी बादशाह की जिंदगी के इतिहास की महक आती है. इस दरगाह में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रार्थना करने की जगह बनी है. ब्रिटिश शासन में दिल्ली की गद्दी पर बैठे बहादुर शाह जफर नाममात्र के बादशाह थे.