10 सॉलिड कारण जो बता रहे हैं कि भाजपा गुजरात चुनाव हार सकती है

22 साल से गुजरात में भाजपा की सरकार रही है जिसमें से करीब 15 साल तक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में भाजपा के मुख्यमंत्री रहे हैं. अभी हाल तक गुजरात को भाजपा का अभेद्य गढ़ माना जाता था और कांग्रेस की राज्य में सत्ता में वापसी एक दिवास्वप्न के बराबर ही थी.

लेकिन पिछले कुछ महीनों में हालात तेजी से बदले हैं और अचानक ऐसा लगने लगा है कि भाजपा के लिए गुजरात में सरकार में वापसी आसान नहीं होगी. आइये आपको बताते हैं वो कौन से संकेत हैं जो बता रहे हैं कि गुजरात में भाजपा की हार हो सकती है!

1. नरेंद्र मोदी का बार-बार गुजरात दौरा

नरेंद्र मोदी अपने सभी कार्यक्रमों को ताक पर रख कर बार-बार गुजरात के दौरे कर रहे हैं. जापानी प्रधानमंत्री के साथ गुजरात दौरे के बाद से वह अब तक तीन बार गुजरात आ चुके हैं और अगले सप्ताह उनका फिर से गुजरात में चुनाव प्रचार का कार्यक्रम है.

उनकी यह बेचैनी साफ़ बता रही है कि इस बार मोदी अपने ही राज्य में भाजपा की जीत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं.

2. गुजरात में चुनाव की तिथियों की घोषणा में देरी

इस वर्ष के अंत में दिसंबर महीने में दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, हिमाचल प्रदेश और गुजरात. जहां हिमाचल में चुनावों की तिथियों की घोषणा हो चुकी है वहीँ गुजरात में चुनाव आयोग ने अभी चुनाव की तिथियों का एलान नहीं किया है.

चुनावी पंडितों का मानना है कि ऐसा प्रधानमंत्री के ताबड़तोड़ गुजरात दौरों की वजह से हो रहा है ताकि चुनाव आचार संहिता लागू होने से उनकी चुनावी रैलियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.

3. मोदी के अलावा किसी अन्य भाजपा नेता की सभा में भीड़ न जुटना

अभी तक मोदी के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी और राजनाथ सिंह गुजरात में चुनाव प्रचार के सिलसिले में जा चुके हैं. उत्तर भारतीयों की सूरत-वलसाड आदि क्षेत्र में काफी आबादी को देखते हुए इनका गुजरात जाना भाजपा के लिए सहायक माना जा रहा था.

किन्तु योगी और राजनाथ सिंह की रैलियों में भीड़ जुटना तो दूर आदमी जुटाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है. योगी के रोड शो को तो जनता ने लगभग नकार दिया है. यह आगामी चुनाव में भाजपा के लिए खतरे के घंटी की तरह है.

4. राज्य के भाजपा नेताओं का शून्य आकर्षण

मुख्यमन्त्री विजय रूपानी सहित राज्य के सभी भाजपा नेताओं की हैसियत मोदी के प्यादों से ज्यादा नहीं है और उनका खुद का जनाधार सीमित है. ऐसे में चुनाव जिताने का सारा दारोमदार मोदी और अमित शाह पर टिक गया है.

5. पटेल समुदाय की नाराजगी

हार्दिक पटेल गुजरात में पटेल समुदाय का नया और ऊर्जावान चेहरा बन कर उभरे हैं. पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग के लिए किये गए आंदोलन और भाजपा सरकार द्वारा उनके हिलाफ की गयी कार्यवाहियों ने उन्हें राज्य में भाजपा के खिलाफ बड़ा चेहरा बना दिया है.

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विशेषकर कांग्रेस से हाथ मिलाने के बाद हार्दिक पटेल भाजपा की लुटिया डुबोने के लिए तैयार बैठे हैं.

6. दलित समुदाय पर हुए हमले

दलितों पर भाजपा राज में हमले बढे हैं. चाहे वो ऊना में गौ रक्षकों द्वारा दलितों की पिटाई का मुद्दा हो या फिर मूछ रखने पर दलित युवकों के साथ मारपीट. दलित वर्ग के लोग इसे अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं.

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और गुजरात में जिग्नेश मेवानी ने इनलोगों को लामबंद किया है. मेवानी का झुकाव भाजपा की तरफ तो बिलकुल नहीं है.

7. अमित शाह के बेटे जय शाह पर संपत्ति बढ़ाने के आरोप

जय शाह की संपत्ति 16000 गुना बढ़ने के आरोप “द वायर” नामक मैगज़ीन में लगने के बाद से कांग्रेस को भाजपा पर हमलावर होने का मौक़ा मिल गया है. दरअसल यह मुद्दा कुछ उसी तरह से उछाला जा रहा है जैसे 2014 आम चुनाव से पहले राबर्ट वाड्रा की संपत्ति का मामला स्कैंडल की तरह उछाला गया था.

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हालांकि जय शाह ने वेबसाइट के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया है लेकिन जनता की नजर में जो नुक्सान होना था, वह हो चुका है. ऊपर से सरकारी मंत्रियों और सरकारी वकील द्वारा जय शाह के बचाव में उतरने से पब्लिक को यह सन्देश गया है कि दाल में कुछ काला जरूर है.

8. जीएसटी को लेकर व्यापारी समुदाय में नाराजगी

पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी को लेकर गुजरात का व्यापारी समुदाय भाजपा से बेहद नाराज चल रहा है. दरअसल जीएसटी लगने गुजरात का कपड़ा व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ है. यहां तक कि हाल की सभा में प्रधानमंत्री मोदी को यह सफाई देनी पडी की जीएसटी के फैसले में कांग्रेस भी शामिल थी.

चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि जीएसटी के मुद्दे से पैदा हुई नाराजगी से पार पाना भाजपा के लिए गजरात चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी.

9. नरेंद्र मोदी की बदली हुई भाषणशैली

पिछले चार सालों में प्रधान मंत्री पहली बार सफाई देते हुए नजर आये हैं. अभी तक वे हमेशा ही आक्रामक अंदाज में भाषण देते रहे हैं और अपने विपक्षियों को लेकर चुटकियां कसते रहे हैं.

लेकिन गुजरात चुनाव में जहां पिछले 22 साल से भाजपा की ही सरकार रही है और उसमें से भी 15 साल तक मोदी जी ही राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और जहां के “विकास का गुजरात मॉडल” को सामने रख उन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव जीता था, वहां पर आज राज्य के पिछड़ेपन और विकास की धीमी गति के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराना जनता को आसानी से पच नहीं रहा है.

10. विकास पगला गया है कैंपेन की लोकप्रियता

गुजरात में भाजपा के खिलाफ “विकास पगला गया है” नाम से चल रहा कैंपेन खासा लोकप्रिय हुआ है और बार बार चुनावी नारे बदलने के बावजूद अभी तक भाजपा इसकी काट नहीं ढूंढ पायी है.

इन सभी मुद्दों को देखते हुए इस बार भाजपा के लिए गुजरात चुनाव एक टेढ़ी खीर साबित होगा. अगर इस बार चुनाव में भाजपा की हार होती है तो यह सिर्फ पार्टी की नहीं बल्कि “विकास के गुजरात मॉडल” और नरेंद्र मोदी के अजेय “ब्रांड” की भी हार होगी.