चाणक्य के इस सूत्र को अपना कर आप अपने किसी भी शत्रु को पराजित कर सकते हैं !

Chanakya Neeti – Shatru (Shatruta) par Chanakya ke anmol vichar

चाणक्य नीति न कोई किसी का मित्र है और न ही शत्रु, कार्यवश ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं

बहूनां चैव सत्तवानां रिपुञ्जयः । वर्षान्धाराधरो मेधस्तृणैरपि निवार्यते॥
शत्रु चाहे कितना बलवान हो

शत्रु चाहे कितना बलवान हो; यदि अनेक छोटे-छोटे व्यक्ति भी मिलकर उसका सामना करे तो उसे हरा देते हैं । छोटे-छोटे तिनकें से बना हुआ छपर मूसलाधार बरसती हुई वर्षा को भी रोक देता है। वास्तव में एकता में बड़ी भारी शक्ति है।

नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः। नास्ति कोप समो वह्नि र्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम्॥
मोह के समान कोई शत्रु नहीं है !काम के समान व्याधि नहीं है, मोह के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के समान कोई आग नहीं है तथा ज्ञान के समान कोई सुख नहीं है ।
माता शत्रुः पिता वैरी येनवालो न पाठितः। न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा ॥
बच्चे को न पढ़ाने वाले माता-पिता शत्रु के समान होते हैं ।बच्चे को न पढ़ाने वाले माता-पिता शत्रु के समान होते हैं । बिना पढ़ा व्यक्ति पढ़े लोगों के बीच में कौए के समान शोभा नहीं पता ।
सकुले योजयेत्कन्या पुत्रं पुत्रं विद्यासु योजयेत्। व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत् ॥
शत्रु को बुराइयों में लगा देना चाहिए, यही व्यवहारिकता है!कन्या का विवाह किसी अच्छे घर में करनी चाहिए, पुत्र को पढ़ाई-लिखाई में लगा देना चाहिए, मित्र को अच्छे कार्यो में तथा शत्रु को बुराइयों में लगा देना चाहिए । यही व्यवहारिकता है और समय की मांग भी
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसण्कटे। राजद्वारे श्मशाने च यात्तिष्ठति स बान्धवः ॥
बीमार होने पर साथ देने वाला, असमय शत्रु से घिर जाने पर साथ आने वाला, राजकार्य में सहायक रूप में तथा मृत्यु पर श्मशान भूमि में ले जाने वाला व्यक्ति सच्चा मित्र और बन्धु है ।
ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी। भार्या रुपवती शत्रुः पुत्र शत्रु र्न पण्डितः॥
ऋण करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी मां, रूपवती पत्नी तथा मूर्ख पुत्र शत्रु के समान होते हैं।ऋण करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी मां, रूपवती पत्नी तथा मूर्ख पुत्र शत्रु के समान होते हैं।
कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा ॥
न कोई किसी का मित्र है और न ही शत्रु, कार्यवश ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं ।