देवताओं को पूजन में क्यों नहीं चढ़ाया जाता कुंकुम?

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Devtaon ko pujan mein Kumkum kyon nahin chadhate hain?

मान्यताओं के अनुसार, खाली मस्तक को शुभ नहीं माना जाता है। पूजन के समय माथे पर अधिकतर कुंकुम का तिलक लगाया जाता है। सुहागन स्त्री कुंकुम के श्रृंगार के बिना अधूरी मानी जाती है। पूजा में अधिकतर कुंकुम का तिलक ही लगाया जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि कुंकुम हल्दी का चूर्ण होता है, जिसमें नींबू का रस मिलाने से लाल रंग का हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार कुंकुम त्वचा के शोधन के लिये सबसे बढिया औषधि है। इसका तिलक लगाने से मस्तिष्क तन्तुओं में क्षीणता नहीं आती है। इसीलिए पूजा में कुंकुम का तिलक लगाया जाता है।
शास्त्रों में बताया गया है कि पुरूष देवताओं की पूजा में कुंकुम नही चढ़ाया जाता है। जबकि देवियों की पूजा कुंकुम के बिना अधूरी मानी जाती है। लेकिन ऐसा विधान सिर्फ इसलिए नहीं बनाया गया है, क्योंकि यह पुरूष देवताओं को अप्रिय माना जाता है, बल्कि इसका कारण कुंकुम का एक तरह की सौभाग्य सामग्री होना है। जिस तरह महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन केवल महिलाओं के ही उपयोग के लिए होते हैं।
इसी कारण कुंकुम जो कि सुहागनों का श्रृंगार माना गया है। मान्यता है कि देवी को कुंकुम चढ़ाने से उनका विशेष आर्शीवाद प्राप्त होता है। अगर अविवाहित कन्याएं कुंकुम से देवी की पूजा करती हैं तो उनको अच्छा पति मिलता है। विवाहित स्त्रियां तीज, त्यौहार या व्रत में कुंकुम से पूजा करती हैं तो उनको पति की लंबी उम्र का आर्शीवाद प्राप्त होता है। इसीलिए कुंकुम का उपयोग सिर्फ देवी पूजा में ही किया जाता है। देवताओं के तिलक व पूजन के लिए चंदन का उपयोग किया जाना चाहिए।

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