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दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी – अहमद फ़राज़ शायरी

दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी

दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी
अब तो हम लोग गए दीद-ए-बेख़्वाब से भी

रो पड़ा हूँ तो कोई बात ही ऐसी होगी
मैं कि वाक़िफ़ था तिरे हिज्र के आदाब से भी

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कुछ तो इस आँख का शेवा है ख़फ़ा हो जाना
और कुछ भूल हुई है दिले-बेताब से भी

ऐ समन्दर की हवा तेरा करम भी मालूम
प्यास साहिल की तो बुझती नहीं सैलाब से भी

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कुछ तो उस हुस्न को जाने है ज़माना सारा
और कुछ बात चली है मिरे अहबाब से भी

दिल कभी ग़म के समुंदर का शनावर था ‘फ़राज़’
अब तो ख़ौफ़ आता है इक मौज-ए-पायाब से भी

(अंजुमो-महताब=सितारों-चाँद, दीद-ए-बेख़्वाब=जागती आँखे,
आदाब=ढंग,तरीक़े, शेवा=परिपाटी, साहिल=तट, सैलाब=
बाढ़, अहबाब=मित्र, शनावर=तैराक, मौज-ए-पायाब=उथले
पानी की लहर)

वफ़ा के बाब में इल्ज़ामे-आशिक़ी न लिया

वफ़ा के बाब में इल्ज़ामे-आशिक़ी न लिया
कि तेरी बात की और तेरा नाम भी न लिया

ख़ुशा वो लोग कि महरूमे-इल्तिफ़ात रहे
तिरे करम को ब-अंदाज़े-सादगी न लिया

तुम्हारे बाद कई हाथ दिल की सम्त बढ़े
हज़ार शुक्र गिरेबाँ को हमने सी न लिया

तमाम मस्ती-ओ-तिश्नालबी के हंगामे
किसी ने संग उठाया किसी ने मीना लिया

‘फ़राज़’ ज़ुल्म है इतनी ख़ुद एतमादी भी
कि रात भी थी अँधेरी चराग़ भी न लिया

(बाब=परिच्छेद, ख़ुशा=भाग्यशाली, महरूमे-इल्तिफ़ात=
दया से वंचित, सम्त=ओर, तिश्नालबी=तृष्णा, संग=
पत्थर, मीना=मद्य-पात्र, ख़ुद एतमादी=आत्म-विश्वास)

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