Samvad Lekhan दो महिलाओं में शहर में बढ़ती गन्दगी के विषय पर संवाद- संवाद लेखन

Do mahilaon mein shehar mein badhti gandgi ke vishey par samvad – Samvad Lekhan

उमा : कविता आजकल शहर में जिस सड़क या गली में चले जाओ गन्दगी का ढेर ही दिखाई देता है ।

कविता : हाँ, हमारे ही मोहल्ले के हाल देख लो, बाहर निकलते ही गन्दगी दिखाई देती है ।

उमा : लोगों को अपना घर साफ़ करना आता है बस और फिर सारा कूड़ा घर के बाहर । फिर, इतनी जगह गंदगी तो होगी ही ।

कविता : सही कह रही हो उमा । कूड़ा वाला आता है कूड़ा इकठ्ठा करने लेकिन लोग उसे भी पैसे ना देने पड़ें, इस चक्कर में कूड़ा भी नहीं देते ।

उमा : अरे तो नगर निगम ने तो कूड़ा डालने की भी जगह बना रखी है ऐसे लोगों के लिए । पर लोगों को तो उसमे भी कष्ट है ।

कविता : दुकानदारों को ही देख लो दुकान का सारा कूड़ा बाहर सड़क पर आ जाता है या फिर नालियों में गिरता है।

उमा : दुकानदार ही क्या मोहल्ले को लोगों ने भी नालियों को कूड़ादान बना रखा है। कूड़े से नालियाँ बंद होने के कारण सारा गन्दा पानी सड़कों पर ही तो आता है ।

कविता : पिछली बरसात में देखा था तुमने, कूड़े से बंद नालियों का सारा गन्दा पानी और कूड़ा सड़कों पर तैर रहे थे ।

उमा : लोगों को जरा भी ख्याल नहीं की इस गन्दगी की वजह से ही वे बीमार पड़ते हैं और कितने ही लोग तो अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं । सरकार तो अपनी ओर से लोगों को इस विषय में बता ही रही है ।

कविता : आखिर सरकार और कितनी सुविधा देगी ? स्वयं लोगों को अपने आसपास की गंदगी और उसके परिणामों के प्रति जागरूक निभाना होगा ।

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