दुष्यंत कुमार Shayari in Hindi अनुभव-दान

Dushyant Kumar shayari – Anubhav Daan

“खँडहरों सी भावशून्य आँखें
नभ से किसी नियंता की बाट जोहती हैं।
बीमार बच्चों से सपने उचाट हैं;
टूटी हुई जिंदगी
आँगन में दीवार से पीठ लगाए खड़ी है;
कटी हुई पतंगों से हम सब
छत की मुँडेरों पर पड़े हैं।

बस! बस!! बहुत सुन लिया है।
नया नहीं है ये सब मैंने भी किया है।
अब वे दिन चले गए,
बालबुद्धि के वे कच्चे दिन भले गए।
आज हँसी आती है!

व्यक्ति को आँखों में
क़ैद कर लेने की आदत पर,
रूप को बाहों में भर लेने की कल्पना पर,
हँसने-रोने की बातों पर,
पिछली बातों पर,
आज हँसी आती है!

तुम सबकी ऐसी बातें सुनने पर
रुई के तकियों में सिर धुनने पर,
अपने हृदयों को भग्न घोषित कर देने की आदत पर,
गीतों से कापियाँ भर देने की आदत पर,
आज हँसी आती है!

इस सबसे दर्द अगर मिटता
तो रुई का भाव तेज हो जाता।
तकियों के गिलाफ़ों को कपड़े नहीं मिलते।
भग्न हृदयों की दवा दर्जी सिलते।
गीतों से गलियाँ ठस जातीं।

लेकिन,
कहाँ वह उदासी अभी मिट पाई!
गलियों में सूनापन अब भी पहरा देता है,
पर अभी वह घड़ी कहाँ आई!

चाँद को देखकर काँपो
तारों से घबराओ
भला कहीं यूँ भी दर्द घटता है!
मन की कमज़ोरी में बहकर
खड़े खड़े गिर जाओ
खुली हवा में न आओ
भला कहीं यूँ भी पथ कटता है!

झुकी हुई पीठ,
टूटी हुई बाहों वाले बालक-बालिकाओं सुनो!
खुली हवा में खेलो।
चाँद को चमकने दो, हँसने दो
देखो तो
ज्योति के धब्बों को मिलाती हुई
रेखा आ रही है,
कलियों में नए नए रंग खिल रहे हैं,
भौरों ने नए गीत छेड़े हैं,
आग बाग-बागीचे, गलियाँ खूबसूरत हैं।
उठो तुम भी
हँसी की क़ीमत पहचानो
हवाएँ निराश न लौटें।

उदास बालक बालिकाओं सुनो!
समय के सामने सीना तानो,
झुकी हुई पीठ
टूटी हुई बाहों वाले बालकों आओ
मेरी बात मानो।

दुष्यंत कुमार के 25 मशहूर शेर जो आपको सोचने पर कर देंगे मजबूर

Dushyant Kumar Poetry – Anubhav Daan

“khandaharon sii bhaavashoony aankhen
nabh se kisii niyantaa kii baat johatii hain.
biimaar bachchon se sapane uchaat hain;
tootii huii jindagii
aangan men diivaar se piith lagaae khadii hai;
katii huii patangon se ham sab
chhat kii munderon par pade hain.”

bas! bas!! bahut sun liyaa hai.
nayaa nahiin hai ye sab mainne bhii kiyaa hai.
ab ve din chale gae,
baalabuddhi ke ve kachche din bhale gae.
aaj hansii aatii hai!

vyakti ko aankhon men
kaid kar lene kii aadat par,
roop ko baahon men bhar lene kii kalpanaa par,
hansane-rone kii baaton par,
pichhalii baaton par,
aaj hansii aatii hai!

tum sabakii aisii baaten sunane par
ruii ke takiyon men sir dhunane par,
apane hridayon ko bhagn ghosit kar dene kii aadat par,
giiton se kaapiyaan bhar dene kii aadat par,
aaj hansii aatii hai!

is sabase dard agar mitataa
to ruii kaa bhaav tej ho jaataa.
takiyon ke gilaafon ko kapade nahiin milate.
bhagn hridayon kii davaa darjii silate.
giiton se galiyaan thas jaatiin.

lekin,
kahaan vah udaasii abhii mit paaii!
galiyon men soonaapan ab bhii paharaa detaa hai,
par abhii vah ghadii kahaan aaii!

chaand ko dekhakar kaanpo
taaron se ghabaraao
bhalaa kahiin yoon bhii dard ghatataa hai!
man kii kamajorii men bahakar
khade khade gir jaao
khulii havaa men n aao
bhalaa kahiin yoon bhii path katataa hai!

jhukii huii piith,
tootii huii baahon vaale baalak-baalikaaon suno!
khulii havaa men khelo.
chaand ko chamakane do, hansane do
dekho to
jyoti ke dhabbon ko milaatii huii
rekhaa aa rahii hai,
kaliyon men nae nae rang khil rahe hain,
bhauron ne nae giit chhede hain,
aag baag-baagiiche, galiyaan khoobasoorat hain.
utho tum bhii
hansii kii kiimat pahachaano
havaaen niraash n lauten.

udaas baalak baalikaaon suno!
samay ke saamane siinaa taano,
jhukii huii piith
tootii huii baahon vaale baalakon aao
merii baat maano.

Dushyant Kumar– Anubhav Daan (in Urdu)

“کھَںڈَہَروں سِی بھاوَشُونْیَ آںکھیں
نَبھَ سے کِسِی نِیَںتا کِی باٹَ جوہَتِی ہَیں۔
بِیمارَ بَچّوں سے سَپَنے اُچاٹَ ہَیں؛
ٹُوٹِی ہُئی جِںدَگِی
آںگَنَ میں دِیوارَ سے پِیٹھَ لَگائے کھَڑِی ہَے؛
کَٹِی ہُئی پَتَںگوں سے ہَمَ سَبَ
چھَتَ کِی مُںڈیروں پَرَ پَڑے ہَیں۔”

بَسَ! بَسَ!! بَہُتَ سُنَ لِیا ہَے۔
نَیا نَہِیں ہَے یے سَبَ مَیںنے بھِی کِیا ہَے۔
اَبَ وے دِنَ چَلے گاے،
بالَبُدّھِ کے وے کَچّے دِنَ بھَلے گاے۔
آجَ ہَںسِی آتِی ہَے!

وْیَکْتِ کو آںکھوں میں
قَیدَ کَرَ لینے کِی آدَتَ پَرَ،
رُوپَ کو باہوں میں بھَرَ لینے کِی کَلْپَنا پَرَ،
ہَںسَنے-رونے کِی باتوں پَرَ،
پِچھَلِی باتوں پَرَ،
آجَ ہَںسِی آتِی ہَے!

تُمَ سَبَکِی اَیسِی باتیں سُنَنے پَرَ
رُئی کے تَکِیوں میں سِرَ دھُنَنے پَرَ،
اَپَنے ہْرِدَیوں کو بھَگْنَ گھوشِتَ کَرَ دینے کِی آدَتَ پَرَ،
گِیتوں سے کاپِیاں بھَرَ دینے کِی آدَتَ پَرَ،
آجَ ہَںسِی آتِی ہَے!

اِسَ سَبَسے دَرْدَ اَگَرَ مِٹَتا
تو رُئی کا بھاوَ تیجَ ہو جاتا۔
تَکِیوں کے گِلافوں کو کَپَڑے نَہِیں مِلَتے۔
بھَگْنَ ہْرِدَیوں کِی دَوا دَرْجِی سِلَتے۔
گِیتوں سے گَلِیاں ٹھَسَ جاتِیں۔

لیکِنَ،
کَہاں وَہَ اُداسِی اَبھِی مِٹَ پائی!
گَلِیوں میں سُوناپَنَ اَبَ بھِی پَہَرا دیتا ہَے،
پَرَ اَبھِی وَہَ گھَڑِی کَہاں آئی!

چاںدَ کو دیکھَکَرَ کاںپو
تاروں سے گھَبَراءاو
بھَلا کَہِیں یُوں بھِی دَرْدَ گھَٹَتا ہَے!
مَنَ کِی کَمَزورِی میں بَہَکَرَ
کھَڑے کھَڑے گِرَ جاءاو
کھُلِی ہَوا میں نَ آءاو
بھَلا کَہِیں یُوں بھِی پَتھَ کَٹَتا ہَے!

جھُکِی ہُئی پِیٹھَ،
ٹُوٹِی ہُئی باہوں والے بالَکَ-بالِکاءاوں سُنو!
کھُلِی ہَوا میں کھیلو۔
چاںدَ کو چَمَکَنے دو، ہَںسَنے دو
دیکھو تو
جْیوتِ کے دھَبّوں کو مِلاتِی ہُئی
ریکھا آ رَہِی ہَے،
کَلِیوں میں ناے ناے رَںگَ کھِلَ رَہے ہَیں،
بھَوروں نے ناے گِیتَ چھیڑے ہَیں،
آگَ باگَ-باگِیچے، گَلِیاں کھُوبَسُورَتَ ہَیں۔
اُٹھو تُمَ بھِی
ہَںسِی کِی قِیمَتَ پَہَچانو
ہَواءایں نِراشَ نَ لَوٹیں۔

اُداسَ بالَکَ بالِکاءاوں سُنو!
سَمَیَ کے سامَنے سِینا تانو،
جھُکِی ہُئی پِیٹھَ
ٹُوٹِی ہُئی باہوں والے بالَکوں آءاو
میرِی باتَ مانو۔

Dushyant Kumar– Anubhav Daan (in Punjabi)

“ਖਡਹਰੋੰ ਸੀ ਭਾਵਸ਼ੂਨ੍ਯ ਆਖੇੰ
ਨਭ ਸੇ ਕਿਸੀ ਨਿਯੰਤਾ ਕੀ ਬਾਟ ਜੋਹਤੀ ਹੈੰ।
ਬੀਮਾਰ ਬਚ੍ਚੋੰ ਸੇ ਸਪਨੇ ਉਚਾਟ ਹੈੰ;
ਟੂਟੀ ਹੁਈ ਜਿੰਦਗੀ
ਆਗਨ ਮੇੰ ਦੀਵਾਰ ਸੇ ਪੀਠ ਲਗਾਏ ਖਡੀ ਹੈ;
ਕਟੀ ਹੁਈ ਪਤੰਗੋੰ ਸੇ ਹਮ ਸਬ
ਛਤ ਕੀ ਮੁਡੇਰੋੰ ਪਰ ਪਡੇ ਹੈੰ।”

ਬਸ! ਬਸ!! ਬਹੁਤ ਸੁਨ ਲਿਯਾ ਹੈ।
ਨਯਾ ਨਹੀੰ ਹੈ ਯੇ ਸਬ ਮੈੰਨੇ ਭੀ ਕਿਯਾ ਹੈ।
ਅਬ ਵੇ ਦਿਨ ਚਲੇ ਗਏ,
ਬਾਲਬੁਦ੍ਧਿ ਕੇ ਵੇ ਕਚ੍ਚੇ ਦਿਨ ਭਲੇ ਗਏ।
ਆਜ ਹਸੀ ਆਤੀ ਹੈ!

ਵ੍ਯਕ੍ਤਿ ਕੋ ਆਖੋੰ ਮੇੰ
ਕੈਦ ਕਰ ਲੇਨੇ ਕੀ ਆਦਤ ਪਰ,
ਰੂਪ ਕੋ ਬਾਹੋੰ ਮੇੰ ਭਰ ਲੇਨੇ ਕੀ ਕਲ੍ਪਨਾ ਪਰ,
ਹਸਨੇ-ਰੋਨੇ ਕੀ ਬਾਤੋੰ ਪਰ,
ਪਿਛਲੀ ਬਾਤੋੰ ਪਰ,
ਆਜ ਹਸੀ ਆਤੀ ਹੈ!

ਤੁਮ ਸਬਕੀ ਐਸੀ ਬਾਤੇੰ ਸੁਨਨੇ ਪਰ
ਰੁਈ ਕੇ ਤਕਿਯੋੰ ਮੇੰ ਸਿਰ ਧੁਨਨੇ ਪਰ,
ਅਪਨੇ ਹਦਯੋੰ ਕੋ ਭਗ੍ਨ ਘੋਸ਼ਿਤ ਕਰ ਦੇਨੇ ਕੀ ਆਦਤ ਪਰ,
ਗੀਤੋੰ ਸੇ ਕਾਪਿਯਾ ਭਰ ਦੇਨੇ ਕੀ ਆਦਤ ਪਰ,
ਆਜ ਹਸੀ ਆਤੀ ਹੈ!

ਇਸ ਸਬਸੇ ਦਰ੍ਦ ਅਗਰ ਮਿਟਤਾ
ਤੋ ਰੁਈ ਕਾ ਭਾਵ ਤੇਜ ਹੋ ਜਾਤਾ।
ਤਕਿਯੋੰ ਕੇ ਗਿਲਾਫੋੰ ਕੋ ਕਪਡੇ ਨਹੀੰ ਮਿਲਤੇ।
ਭਗ੍ਨ ਹਦਯੋੰ ਕੀ ਦਵਾ ਦਰ੍ਜੀ ਸਿਲਤੇ।
ਗੀਤੋੰ ਸੇ ਗਲਿਯਾ ਠਸ ਜਾਤੀੰ।

ਲੇਕਿਨ,
ਕਹਾ ਵਹ ਉਦਾਸੀ ਅਭੀ ਮਿਟ ਪਾਈ!
ਗਲਿਯੋੰ ਮੇੰ ਸੂਨਾਪਨ ਅਬ ਭੀ ਪਹਰਾ ਦੇਤਾ ਹੈ,
ਪਰ ਅਭੀ ਵਹ ਘਡੀ ਕਹਾ ਆਈ!

ਚਾਦ ਕੋ ਦੇਖਕਰ ਕਾਪੋ
ਤਾਰੋੰ ਸੇ ਘਬਰਾਓ
ਭਲਾ ਕਹੀੰ ਯੂ ਭੀ ਦਰ੍ਦ ਘਟਤਾ ਹੈ!
ਮਨ ਕੀ ਕਮਜੋਰੀ ਮੇੰ ਬਹਕਰ
ਖਡੇ ਖਡੇ ਗਿਰ ਜਾਓ
ਖੁਲੀ ਹਵਾ ਮੇੰ ਨ ਆਓ
ਭਲਾ ਕਹੀੰ ਯੂ ਭੀ ਪਥ ਕਟਤਾ ਹੈ!

ਝੁਕੀ ਹੁਈ ਪੀਠ,
ਟੂਟੀ ਹੁਈ ਬਾਹੋੰ ਵਾਲੇ ਬਾਲਕ-ਬਾਲਿਕਾਓੰ ਸੁਨੋ!
ਖੁਲੀ ਹਵਾ ਮੇੰ ਖੇਲੋ।
ਚਾਦ ਕੋ ਚਮਕਨੇ ਦੋ, ਹਸਨੇ ਦੋ
ਦੇਖੋ ਤੋ
ਜ੍ਯੋਤਿ ਕੇ ਧਬ੍ਬੋੰ ਕੋ ਮਿਲਾਤੀ ਹੁਈ
ਰੇਖਾ ਆ ਰਹੀ ਹੈ,
ਕਲਿਯੋੰ ਮੇੰ ਨਏ ਨਏ ਰੰਗ ਖਿਲ ਰਹੇ ਹੈੰ,
ਭੌਰੋੰ ਨੇ ਨਏ ਗੀਤ ਛੇਡੇ ਹੈੰ,
ਆਗ ਬਾਗ-ਬਾਗੀਚੇ, ਗਲਿਯਾ ਖੂਬਸੂਰਤ ਹੈੰ।
ਉਠੋ ਤੁਮ ਭੀ
ਹਸੀ ਕੀ ਕੀਮਤ ਪਹਚਾਨੋ
ਹਵਾਏ ਨਿਰਾਸ਼ ਨ ਲੌਟੇੰ।

ਉਦਾਸ ਬਾਲਕ ਬਾਲਿਕਾਓੰ ਸੁਨੋ!
ਸਮਯ ਕੇ ਸਾਮਨੇ ਸੀਨਾ ਤਾਨੋ,
ਝੁਕੀ ਹੁਈ ਪੀਠ
ਟੂਟੀ ਹੁਈ ਬਾਹੋੰ ਵਾਲੇ ਬਾਲਕੋੰ ਆਓ
ਮੇਰੀ ਬਾਤ ਮਾਨੋ।

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