दुष्यंत कुमार Shayari in Hindi मुक्तक

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Dushyant Kumar shayari – Muktak

सँभल सँभल के बहुत पाँव धर रहा हूँ मैं
पहाड़ी ढाल से जैसे उतर रहा हूँ मैं
क़दम क़दम पे मुझे टोकता है दिल ऐसे
गुनाह कोई बड़ा जैसे कर रहा हूँ मैं।

तरस रहा है मन फूलों की नई गंध पाने को
खिली धूप में, खुली हवा में, गाने मुसकाने को
तुम अपने जिस तिमिरपाश में मुझको क़ैद किए हो
वह बंधन ही उकसाता है बाहर आ जाने को।

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गीत गाकर चेतना को वर दिया मैंने
आँसुओं से दर्द को आदर दिया मैंने
प्रीत मेरी आत्मा की भूख थी, सहकर
ज़िंदगी का चित्र पूरा कर दिया मैंने

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जो कुछ भी दिया अनश्वर दिया मुझे
नीचे से ऊपर तक भर दिया मुझे
ये स्वर सकुचाते हैं लेकिन तुमने
अपने तक ही सीमित कर दिया मुझे।

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Dushyant Kumar Poetry – Muktak

sanbhal sanbhal ke’ bahut paanv dhar rahaa hoon main
pahaadii dhaal se jaise utar rahaa hoon main
kdam kdam pe mujhe tokataa hai dil aise
gunaah koii badaa jaise kar rahaa hoon main.

taras rahaa hai man foolon kii naii gandh paane ko
khilii dhoop men, khulii havaa men, gaane musakaane ko
tum apane jis timirapaash men mujhako kaid kie ho
vah bandhan hii ukasaataa hai baahar aa jaane ko.

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giit gaakar chetanaa ko var diyaa mainne
aansuon se dard ko aadar diyaa mainne
priit merii aatmaa kii bhookh thii, sahakar
jindagii kaa chitr pooraa kar diyaa mainne

jo kuchh bhii diyaa anashvar diyaa mujhe
niiche se oopar tak bhar diyaa mujhe
ye svar sakuchaate hain lekin tumane
apane tak hii siimit kar diyaa mujhe.

Dushyant Kumar– Muktak (in Urdu)

سَںبھَلَ سَںبھَلَ کے’ بَہُتَ پاںوَ دھَرَ رَہا ہُوں مَیں
پَہاڑِی ڈھالَ سے جَیسے اُتَرَ رَہا ہُوں مَیں
قَدَمَ قَدَمَ پے مُجھے ٹوکَتا ہَے دِلَ اَیسے
گُناہَ کوئی بَڑا جَیسے کَرَ رَہا ہُوں مَیں۔

تَرَسَ رَہا ہَے مَنَ پھُولوں کِی ناِی گَںدھَ پانے کو
کھِلِی دھُوپَ میں، کھُلِی ہَوا میں، گانے مُسَکانے کو
تُمَ اَپَنے جِسَ تِمِرَپاشَ میں مُجھَکو قَیدَ کِئے ہو
وَہَ بَںدھَنَ ہِی اُکَساتا ہَے باہَرَ آ جانے کو۔

گِیتَ گاکَرَ چیتَنا کو وَرَ دِیا مَیںنے
آںسُءاوں سے دَرْدَ کو آدَرَ دِیا مَیںنے
پْرِیتَ میرِی آتْما کِی بھُوکھَ تھِی، سَہَکَرَ
زِںدَگِی کا چِتْرَ پُورا کَرَ دِیا مَیںنے

جو کُچھَ بھِی دِیا اَنَشْوَرَ دِیا مُجھے
نِیچے سے اُوپَرَ تَکَ بھَرَ دِیا مُجھے
یے سْوَرَ سَکُچاتے ہَیں لیکِنَ تُمَنے
اَپَنے تَکَ ہِی سِیمِتَ کَرَ دِیا مُجھے۔

Dushyant Kumar– Muktak (in Punjabi)

ਸਭਲ ਸਭਲ ਕੇ’ ਬਹੁਤ ਪਾਵ ਧਰ ਰਹਾ ਹੂ ਮੈੰ
ਪਹਾਡੀ ਢਾਲ ਸੇ ਜੈਸੇ ਉਤਰ ਰਹਾ ਹੂ ਮੈੰ
ਕਦਮ ਕਦਮ ਪੇ ਮੁਝੇ ਟੋਕਤਾ ਹੈ ਦਿਲ ਐਸੇ
ਗੁਨਾਹ ਕੋਈ ਬਡਾ ਜੈਸੇ ਕਰ ਰਹਾ ਹੂ ਮੈੰ।

ਤਰਸ ਰਹਾ ਹੈ ਮਨ ਫੂਲੋੰ ਕੀ ਨਈ ਗੰਧ ਪਾਨੇ ਕੋ
ਖਿਲੀ ਧੂਪ ਮੇੰ, ਖੁਲੀ ਹਵਾ ਮੇੰ, ਗਾਨੇ ਮੁਸਕਾਨੇ ਕੋ
ਤੁਮ ਅਪਨੇ ਜਿਸ ਤਿਮਿਰਪਾਸ਼ ਮੇੰ ਮੁਝਕੋ ਕੈਦ ਕਿਏ ਹੋ
ਵਹ ਬੰਧਨ ਹੀ ਉਕਸਾਤਾ ਹੈ ਬਾਹਰ ਆ ਜਾਨੇ ਕੋ।

ਗੀਤ ਗਾਕਰ ਚੇਤਨਾ ਕੋ ਵਰ ਦਿਯਾ ਮੈੰਨੇ
ਆਸੁਓੰ ਸੇ ਦਰ੍ਦ ਕੋ ਆਦਰ ਦਿਯਾ ਮੈੰਨੇ
ਪ੍ਰੀਤ ਮੇਰੀ ਆਤ੍ਮਾ ਕੀ ਭੂਖ ਥੀ, ਸਹਕਰ
ਜਿੰਦਗੀ ਕਾ ਚਿਤ੍ਰ ਪੂਰਾ ਕਰ ਦਿਯਾ ਮੈੰਨੇ

ਜੋ ਕੁਛ ਭੀ ਦਿਯਾ ਅਨਸ਼੍ਵਰ ਦਿਯਾ ਮੁਝੇ
ਨੀਚੇ ਸੇ ਊਪਰ ਤਕ ਭਰ ਦਿਯਾ ਮੁਝੇ
ਯੇ ਸ੍ਵਰ ਸਕੁਚਾਤੇ ਹੈੰ ਲੇਕਿਨ ਤੁਮਨੇ
ਅਪਨੇ ਤਕ ਹੀ ਸੀਮਿਤ ਕਰ ਦਿਯਾ ਮੁਝੇ।

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