हम तो यूँ ख़ुश थे कि इक तार गिरेबान में है – अहमद फ़राज़ शायरी

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हम तो यूँ ख़ुश थे कि इक तार गिरेबान में है

हम तो यूँ ख़ुश थे कि इक तार गिरेबान में है
क्या ख़बर थी कि बहार उसके भी अरमान में है

एक ज़र्ब और भी ऐ ज़िन्दगी-ए-तेशा-ब-दस्त !
साँस लेने की सकत अब भी मेरी जान में है

मैं तुझे खो के भी ज़िंदा हूँ ये देखा तूने
किस क़दर हौसला हारे हुए इन्सान में है

फ़ासले क़ुर्ब के शोले को हवा देते हैं
मैं तेरे शहर से दूर और तू मेरे ध्यान में है

सरे-दीवार फ़रोज़ाँ है अभी एक चराग़
ऐ नसीमे-सहरी ! कुछ तिरे इम्कान में है

दिल धड़कने की सदा आती है गाहे-गाहे
जैसे अब भी तेरी आवाज़ मिरे कान में है

ख़िल्क़ते-शहर के हर ज़ुल्म के बावस्फ़ ‘फ़राज़’
हाय वो हाथ कि अपने ही गिरेबान में है

(गिरेबान=कुर्ते का गला, ज़र्ब=चोट, तेशा-ब-दस्त=
हाथ में कुदाली लिए, सकत=ताक़त, क़ुर्ब=सामीप्य,
फ़रोज़ाँ=प्रकाशमान, नसीमे-सहरी=प्रात:कालीन हवा,
इम्कान=संभावना, गाहे-गाहे=कभी-कभी, ख़िल्क़त=
जनता, बावस्फ़=बावजूद)

ख़ामोश हो क्यों दादे-ज़फ़ा क्यूँ नहीं देते

ख़ामोश हो क्यों दाद-ए-ज़फ़ा क्यूँ नहीं देते
बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते

वहशत का सबब रोज़न-ए-ज़िन्दाँ तो नहीं है
मेहर-ओ-महो-ओ-अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते

इक ये भी तो अन्दाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है
ऐ चारागरो ! दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते

मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इन्साफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी
रहबर हो तो मन्ज़िल का पता क्यूँ नहीं देते

क्या बीत गई अब के “फ़राज़” अहल-ए-चमन पर
यारान-ए-क़फ़स मुझको सदा क्यूँ नहीं देते

(दाद-ए-ज़फ़ा=अन्याय की प्रशंसा, बिस्मिल=घायल,
रोज़न-ए-ज़िन्दाँ=जेल का छिद्र, मेहर-ओ-महो-ओ-अंजुम=
सूर्य, चाँद और तारे, चारागर=चिकित्सक, मुंसिफ़=
न्यायाधीश, रहज़न=लुटेरा, मता=पूँजी, क़फ़स=जेल,
सदा=आवाज़)

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