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जब तेरी याद के जुगनू चमके – अहमद फ़राज़ शायरी

 जब तेरी याद के जुगनू चमके

जब तेरी याद के जुगनू चमके
देर तक आँख में आँसू चमके

सख़्त तारीक है दिल की दुनिया
ऐसे आलम में अगर तू चमके

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हमने देखा सरे-बाज़ारे-वफ़ा
कभी मोती कभी आँसू चमके

शर्त है शिद्दते-अहसासे-जमाल
रंग तो रंग है ख़ुशबू चमके

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आँख मजबूर-ए-तमाशा है ‘फ़राज़’
एक सूरत है कि हरसू चमके

(सख़्त तारीक=घनी अँधेरी, आलम=
ऐसी दशा में, शिद्दते-अहसासे-जमाल=
सौंदर्य की तीव्रता, मजबूर-ए-तमाशा=
तमाशे के लिए विवश, हरसू=हर तरफ़)

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुम्किन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ न तू है न वो माज़ी है “फ़राज़”
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

(हिजाबों=पर्दों, दार=सूली, निसाबों=पाठ्यक्रमों में,
माज़ी=अतीत, सराबों=मृगतृष्णा)

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