कैफी आज़मी Shayari in Hindi नेहरू (मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं )

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Kaifi Azmi shayari – Nehru (main ne tanha kabhi us ko dekha nahin)

मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं
फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला
जैसे सहरा में चश्मा कहीं
या समुन्दर में मीनार-ए-नूर
या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में
फ़िक्र सदियों अकेली अकेली रही
ज़ेहन सदियों अकेला अकेला मिला

और अकेला अकेला भटकता रहा
हर नए हर पुराने ज़माने में वो
बे-ज़बाँ तीरगी में कभी
और कभी चीख़ती धूप में
चाँदनी में कभी ख़्वाब की
उस की तक़दीर थी इक मुसलसल तलाश
ख़ुद को ढूँडा किया हर फ़साने में वो

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बोझ से अपने उस की कमर झुक गई
क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा
ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो
ज़िंदगी का हो कोई जिहाद
वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद
सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

जिन तक़ाज़ों ने उस को दिया था जनम
उन की आग़ोश में फिर समाया न वो
ख़ून में वेद गूँजे हुए
और जबीं पर फ़रोज़ाँ अज़ाँ
और सीने पे रक़्साँ सलीब
बे-झिझक सब के क़ाबू में आया न वो

हाथ में उस के क्या था जो देता हमें
सिर्फ़ इक कील उस कील का इक निशाँ
नश्शा-ए-मय कोई चीज़ है
इक घड़ी दो घड़ी एक रात
और हासिल वही दर्द-ए-सर
उस ने ज़िन्दाँ में लेकिन पिया था जो ज़हर
उठ के सीने से बैठा न इस का धुआँ

कैफी आज़मी के ये बेहतरीन 25 शेर आपके दिल को गहराइयों तक छू लेंगे

Kaifi Azmi Poetry – Nehru (main ne tanha kabhi us ko dekha nahin)

main ne tanha kabhi us ko dekha nahin
fir bhi jab us ko dekha vo tanha milaa
jaise sahara men chashma kahin
ya samundar men minaar-e-noor
ya koi fikr-e-auhaam men
fikr sadiyon akeli akeli rahi
jehan sadiyon akela akela milaa

aur akela akela bhatakata rahaa
har nae har puraane jmaane men vo
be-jbaan tiragi men kabhi
aur kabhi chikhti dhoop men
chaandani men kabhi khvaab ki
us ki takdir thi ik musalasal talaash
khud ko dhoonda kiya har fsaane men vo

bojh se apane us ki kamar jhuk gai
kd magar aur kuchh aur badhta rahaa
khair-o-shar ki koi jang ho
jindagi ka ho koi jihaad
vo hamesha hua sab se pahale shahid
sab se pahale vo sooli pe chadhta rahaa

jin takaajon ne us ko diya tha janam
un ki aagosh men fir samaaya n vo
khoon men ved goonje hue
aur jabin par frojaan ajaan
aur sine pe raksaan salib
be-jhijhak sab ke kaaboo men aaya n vo

haath men us ke kya tha jo deta hamen
sirf ik kil us kil ka ik nishaan
nashshaa-e-may koi chij hai
ik ghadi do ghadi ek raat
aur haasil vahi dard-e-sar
us ne jindaan men lekin piya tha jo jhar
uth ke sine se baitha n is ka dhuaan

Kaifi Azmi – Nehru (in Urdu)(main ne tanha kabhi us ko dekha nahin)

مَیں نے تَنْہا کَبھِی اُسَ کو دیکھا نَہِیں
پھِرَ بھِی جَبَ اُسَ کو دیکھا وو تَنْہا مِلا
جَیسے سَہَرا میں چَشْما کَہِیں
یا سَمُنْدَرَ میں مِینارَ-اے-نُورَ
یا کوئی فِکْرَ-اے-اَوہامَ میں
فِکْرَ سَدِیوں اَکیلِی اَکیلِی رَہِی
زیہَنَ سَدِیوں اَکیلا اَکیلا مِلا

اَورَ اَکیلا اَکیلا بھَٹَکَتا رَہا
ہَرَ ناے ہَرَ پُرانے زَمانے میں وو
بے-زَباں تِیرَگِی میں کَبھِی
اَورَ کَبھِی چِیخَتِی دھُوپَ میں
چاںدَنِی میں کَبھِی خْوابَ کِی
اُسَ کِی تَقَدِیرَ تھِی اِکَ مُسَلَسَلَ تَلاشَ
خُدَ کو ڈھُوںڈا کِیا ہَرَ فَسانے میں وو

بوجھَ سے اَپَنے اُسَ کِی کَمَرَ جھُکَ گاِی
قَدَ مَگَرَ اَورَ کُچھَ اَورَ بَڑھَتا رَہا
خَیرَ-او-شَرَ کِی کوئی جَںگَ ہو
زِںدَگِی کا ہو کوئی جِہادَ
وو ہَمیشا ہُءآ سَبَ سے پَہَلے شَہِیدَ
سَبَ سے پَہَلے وو سُولِی پے چَڑھَتا رَہا

جِنَ تَقازوں نے اُسَ کو دِیا تھا جَنَمَ
اُنَ کِی آغوشَ میں پھِرَ سَمایا نَ وو
خُونَ میں ویدَ گُوںجے ہُئے
اَورَ جَبِیں پَرَ فَروزاں اَزاں
اَورَ سِینے پے رَقْساں سَلِیبَ
بے-جھِجھَکَ سَبَ کے قابُو میں آیا نَ وو

ہاتھَ میں اُسَ کے کْیا تھا جو دیتا ہَمیں
سِرْفَ اِکَ کِیلَ اُسَ کِیلَ کا اِکَ نِشاں
نَشّا-اے-مَیَ کوئی چِیزَ ہَے
اِکَ گھَڑِی دو گھَڑِی ایکَ راتَ
اَورَ ہاسِلَ وَہِی دَرْدَ-اے-سَرَ
اُسَ نے زِنْداں میں لیکِنَ پِیا تھا جو زَہَرَ
اُٹھَ کے سِینے سے بَیٹھا نَ اِسَ کا دھُءآں

Kaifi Azmi – Nehru (in Punjabi) (main ne tanha kabhi us ko dekha nahin)

ਮੈੰ ਨੇ ਤਨ੍ਹਾ ਕਭੀ ਉਸ ਕੋ ਦੇਖਾ ਨਹੀੰ
ਫਿਰ ਭੀ ਜਬ ਉਸ ਕੋ ਦੇਖਾ ਵੋ ਤਨ੍ਹਾ ਮਿਲਾ
ਜੈਸੇ ਸਹਰਾ ਮੇੰ ਚਸ਼੍ਮਾ ਕਹੀੰ
ਯਾ ਸਮੁਨ੍ਦਰ ਮੇੰ ਮੀਨਾਰ-ਏ-ਨੂਰ
ਯਾ ਕੋਈ ਫਿਕ੍ਰ-ਏ-ਔਹਾਮ ਮੇੰ
ਫਿਕ੍ਰ ਸਦਿਯੋੰ ਅਕੇਲੀ ਅਕੇਲੀ ਰਹੀ
ਜੇਹਨ ਸਦਿਯੋੰ ਅਕੇਲਾ ਅਕੇਲਾ ਮਿਲਾ

ਔਰ ਅਕੇਲਾ ਅਕੇਲਾ ਭਟਕਤਾ ਰਹਾ
ਹਰ ਨਏ ਹਰ ਪੁਰਾਨੇ ਜਮਾਨੇ ਮੇੰ ਵੋ
ਬੇ-ਜਬਾ ਤੀਰਗੀ ਮੇੰ ਕਭੀ
ਔਰ ਕਭੀ ਚੀਖਤੀ ਧੂਪ ਮੇੰ
ਚਾਦਨੀ ਮੇੰ ਕਭੀ ਖ੍ਵਾਬ ਕੀ
ਉਸ ਕੀ ਤਕਦੀਰ ਥੀ ਇਕ ਮੁਸਲਸਲ ਤਲਾਸ਼
ਖੁਦ ਕੋ ਢੂਡਾ ਕਿਯਾ ਹਰ ਫਸਾਨੇ ਮੇੰ ਵੋ

ਬੋਝ ਸੇ ਅਪਨੇ ਉਸ ਕੀ ਕਮਰ ਝੁਕ ਗਈ
ਕਦ ਮਗਰ ਔਰ ਕੁਛ ਔਰ ਬਢਤਾ ਰਹਾ
ਖੈਰ-ਓ-ਸ਼ਰ ਕੀ ਕੋਈ ਜੰਗ ਹੋ
ਜਿੰਦਗੀ ਕਾ ਹੋ ਕੋਈ ਜਿਹਾਦ
ਵੋ ਹਮੇਸ਼ਾ ਹੁਆ ਸਬ ਸੇ ਪਹਲੇ ਸ਼ਹੀਦ
ਸਬ ਸੇ ਪਹਲੇ ਵੋ ਸੂਲੀ ਪੇ ਚਢਤਾ ਰਹਾ

ਜਿਨ ਤਕਾਜੋੰ ਨੇ ਉਸ ਕੋ ਦਿਯਾ ਥਾ ਜਨਮ
ਉਨ ਕੀ ਆਗੋਸ਼ ਮੇੰ ਫਿਰ ਸਮਾਯਾ ਨ ਵੋ
ਖੂਨ ਮੇੰ ਵੇਦ ਗੂਜੇ ਹੁਏ
ਔਰ ਜਬੀੰ ਪਰ ਫਰੋਜਾ ਅਜਾ
ਔਰ ਸੀਨੇ ਪੇ ਰਕ੍ਸਾ ਸਲੀਬ
ਬੇ-ਝਿਝਕ ਸਬ ਕੇ ਕਾਬੂ ਮੇੰ ਆਯਾ ਨ ਵੋ

ਹਾਥ ਮੇੰ ਉਸ ਕੇ ਕ੍ਯਾ ਥਾ ਜੋ ਦੇਤਾ ਹਮੇੰ
ਸਿਰ੍ਫ ਇਕ ਕੀਲ ਉਸ ਕੀਲ ਕਾ ਇਕ ਨਿਸ਼ਾ
ਨਸ਼੍ਸ਼ਾ-ਏ-ਮਯ ਕੋਈ ਚੀਜ ਹੈ
ਇਕ ਘਡੀ ਦੋ ਘਡੀ ਏਕ ਰਾਤ
ਔਰ ਹਾਸਿਲ ਵਹੀ ਦਰ੍ਦ-ਏ-ਸਰ
ਉਸ ਨੇ ਜਿਨ੍ਦਾ ਮੇੰ ਲੇਕਿਨ ਪਿਯਾ ਥਾ ਜੋ ਜਹਰ
ਉਠ ਕੇ ਸੀਨੇ ਸੇ ਬੈਠਾ ਨ ਇਸ ਕਾ ਧੁਆ

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