कालसर्प योग क्या है और उसका समाधान

Kalsarp Yog kya hai aur uska samadhan

एक कहाव्रत प्रचलित है कि जिस प्रकार मंदिर में भोग एवं अस्पताल में रोग का बहुत बड़ा महत्व होता है, उसी प्रकार ज्योतिष में योग का अपना एक अलग ही महत्व होता है। ज्योतिष में इन्हीं योगों में से एक है कालसर्प योग आखिर क्या है कालसर्प योग? जन्म पत्रिका के जन्मांक चक्र में राहु और केतु के मध्य अर्थात् एक तरफ सूर्य आदि सातों ग्रह जब स्थित होते हैं तो कालसर्प योग ही रचना होती है। कालसर्प योग वाली कुण्डली में चन्द्रमा से केन्द्रस्थ गुरू और बुध से केन्द्रस्थ शनि हो तो वैसे जातक पर्याप्त ऐश्वर्य का भोग करते हैं। वे कामी और विलासी स्वभाव के होते हैं। थोड़ी सी मेहनत के द्वारा अधिक धन कमाते हैं एवं तंत्र मंत्र में विश्वास रखते हैं, फिर भी अपनी उपलब्धियों से कभी संतुष्ट नहीं होते। ये महत्वाकांक्षी विचारधारा के होते हैं। ये अति उन्नति करते करते अचानक अवनति को प्राप्त होते हैं। इनके जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं।
कालसर्प योग वाली कुण्डली में शनि-सूर्य-युति, शनि-मंगल-युति, राहु या केतु के साथ सूर्य-मंगल-शनि का एक या अधिक योग बनता हो तो सम्पन्न कुलीन घराने में जन्म लेने के बावजूद जातक संघर्ष करते रहते हैं। इन्हें अपने पूर्ण जीवन में अनेक लोगों का अहसानमन्द बने रहना पड़ता है। ऐसे जातकों के ऊपर हमेशा कर्ज का बोझ बना रहता है। ये कालसर्प योग 12 प्रकार के होते हैं, जो अलग अलग प्रकार से फल प्रदान करते हैं।
1. अनन्त नामक कालसर्प योग, 2. कुलिक, 3. बासुकी, 4. शंखपाल, 5. पद्य, 6. महापद्य, 7. तक्षक, 8. कर्कोटक, 9. शंखनाद या शंखचूड़, 10. पातक, 11. विषाक्त, 12. शेषनाग
लग्न एवं भावानुसार ये 12 प्रकार के कालसर्प योग मुख है। परन्तु इस ग्रह-भाव एवं राशि अनुसार गणना करने पर ही कालसर्प योग 12 ग 12 त्र अर्थात् 144 प्रकार के हो जाते हैं । उदित व अनुदित दो प्रकार के कारण व राहु केतु के भाव एवं राशि गुणक से 288 तरह के कालसर्प योग बनते हैं। इस दोष वाले की कुण्डली में पूर्व जन्म में सर्प शाप दोष, पितर दोष व प्रेतबाधा दोष के कारण कालसर्प योग बनते हैं। इसलिए इसकी शांति के निम्न उपाय करने चाहिए।
शांति के उपायः समस्त ग्रह जब राहु एवं केतु के मध्य जन्म कुण्डली में होते हैं तो, व्यक्ति कालसर्प योग नामक दोष से पीड़ित होता है। इस योग के कारण व्यक्ति कई बार भयंकर परेशानियां भोगता है। राहु, केतु, शनि की दशा, अंतरदशा में या शनि की साढ़े साती एवं राहु केतु के गोचर में अनिष्ट स्थानों पर आने से अधिक भोगता है।
इस योग से व्यक्ति दुखी ही रहता है, ऐसी बात नहीं है। इस योग वाले कई व्यक्ति बड़े राजनेता एवं उद्योगपति भी हुए हैं। इस योग के कारण धोखा, नुकसान, परेशानी, संतान चिंता एवं अन्य व्याधियों से व्यथित रहता है। पतन होता है जो अचानक होता है। ऐसे समय में कालसर्प दोष की शांति करानी चाहिए।
त्रिपिण्डी श्राद्धः पितर भी सर्प योनि ग्रहण करते हैं, अतः कालसर्प दोष निवारण करने में पितरों का त्रिपिण्डी श्राद्ध कराने से स्वगोत्र की बाधा नहीं रहती है। त्रिपिण्डी श्राद्ध नासिक के पास या अन्य किसी तीर्थ स्थल पर करायें।
नारायण बलिः अपने परिवार में कोई अधोगति में जीव हो सकता है या सर्प की मृत्यु आपके द्वारा हो गई हो तो उसके निमित्त अथवा कोई प्रेतोद्रव हो तो उसके निमित्त नारायण बलि प्रयोग करायें।
मृत्युंजय मंत्रः जप प्रयोग एवं छायापात्र, तुलादानादि कार्य करायें।
नागपूजा विधानः पुस्तकों में जो अष्टनाग पूजा विधान दिया है उस विधि से नवनाग की पूजा करायें। चाँदी के नाग नागणियों के अष्ट जोड़े बनायें। घृत या तेल पात्र में रखकर शिव के आठों दिशाओं में रखें, एक स्वर्ण का जोड़ा शिव के पास रखें।
नमोस्तु सर्पेभ्यो मंत्र के ॐ 21000 जाप, राहु केतु के जाप, रूद्राभिषेक, सर्पसुक्त का पाठ करें। नारियल पर सर्पों को मोली से लपेटकर बहते जल में बहावे, कोई आचार्य उसे ग्रहण करना चाहे तो जल में से कर सकता है।
अमावस, बुधवार, शनिवार, आष्लेशा, मघा, मूल नक्षत्र, आद्र्रा एवं शतभिशा नक्षत्र अथवा संक्रांति के समय इसका शांति प्रयोग किया जा सकता है।
कालसर्प योग की शांति व पूजा मात्र 5 स्थानों पर ही होती है:-
1. नासिक के नजदीक त्रयम्बकेश्वर, 2. इलाहाबाद, 3. त्रियुगीनारायण मंदिर (केदरनाथ), 4. कालहस्ति (दक्षिण भारत), 5. बद्रीनाथ धाम – इन स्थानों के अलावा कहीं पर की गई शांति का कोई फल नहीं मिलता, समय व धन व्यर्थ में खर्च हो जाता है।