भारत भूमि के महान शासक: राजा विक्रमादित्य

सम्राट विक्रमादित्य एक प्रसिद्ध राजा थे| जिन्होंने भारत पर लम्बे समय तक शासन किया था| उन्होंने अपने ज्ञान, मूर्ति प्रेम और बड़प्पन के लिए नाम कमाया था| उज्जैन के राजा गंधर्वसेन के दूसरे पुत्र, विक्रमादित्य 102 ईसा पूर्व में पैदा हुए थे| 15 AD में उनकी मृत्यु हो गई थी। उन्होंने 100 से अधिक वर्षों तक उज्जैन पर शासन किया।

विक्रमादित्य युग को विक्रम संवत के रूप में किया जाता है याद

उनके युग को विक्रम संवत के रूप में जाना जाता है और अभी भी भारत में इसका पालन किया जाता है। विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के भक्त थे। उनकी आइडल हरसिद्धि के मंदिर के पास मौजूद है| राजा के साथ जुडी कई लोक कथाएं हैं| उन्होंने अपना सिर हरसिद्धि को बलिदान के रूप में दिया। उन्होंने सिद्ध वैट में भ्ठला साधना का अभ्यास करके सुपर प्राकृतिक शक्तियां प्राप्त कीं। उस कहानी को उजागर करने वाली ‘विक्रम-बैताल’ शीर्षक के साथ कहानियां हैं।

भारत भूमि के महान शासक: राजा विक्रमादित्य

विक्रमादित्य का सिंहासन

उनको भगवान इंद्र ने सिंहासन दिया था और जिसमे रहस्यवादी शक्तियां थीं। सम्राट की अवधि के बाद यह सिंहासन गायब हो गया। उसके बाद इसे राजा भोज की अवधि में दिखाई दिया| तो उसने इसपर चढ़ने की कोशिश की। सलभनिक्स (मिस्टिक शक्तियां) ने उसका परीक्षण किया और अंत में राजा भोज को सिंहासन पर बैठने के लिए स्वीकार कर लिया। ‘सिंहसान बत्तीसी’ इन कहानी से संबंधित कहानियों में शामिल हैं।

भरतहिरी और भट्टी विक्रमादित्य के बड़े और छोटे भाई थे। भरतहिरी ने राज्य छोड़ दिया और योगी बन गए| वही भट्टी भी हरसिद्धि के भक्त थे| ऐसा कहा जाता है कि भट्टी और विक्रमादित्य ने उज्जैनी पर एक बार के लिए दो हिस्सों में बांटते हुए लंबे समय तक शासन किया।

राजा विक्रमादित्य की सभा में थे नवरतन

1. धन्वंतरी
2. क्षपणका
3. अमारा सिमा
4. शंकु भट्टा
5. वेला भट्टा
6. घाटखड़पाड़ा
7. वाराहमहिरा
8. वरूरुची
9. कालिदास (संस्कृत भाषा के सबसे प्रसिद्ध कवि)

रूद्र सागर में कुछ पत्थर मौजूद हैं| जिन्हें राजा विक्रमादित्य के सिंहासन के अवशेष कहा जाता है। आज भी भारत में हिन्दू नववर्ष इन्ही राजा के नाम से मनाया जाता है|