मालचा महल – दिल्ली का एक गुमनाम महल,जहाँ कुछ दिन पहले अवध के वंशज प्रिंस अली रज़ा ने ली अंतिम सांस

अगर बात करे इतिहास की तो अवध के नवाब वाजिद अली शाह का नाम बहुत मशहूर है.वाजिद अली शाह के एक वंशज की मौत… खंडहर जैसे दिखने वाले 600 साल पुराने मालचा महल में हुई.

कुछ ही हफ्ते पहले तक दिल्ली में एक नवाब रह रहा था.जिनका नाम था प्रिंस अली रज़ा. वो खुद को अवध का आखिरी राजकुमार बताते थे. किसी ज़माने में उनकी रियासत हुआ करती थी.. और वो शाही जिंदगी जिया करते थे.

लेकिन उनकी मौत 2 सितंबर 2017 को मालचा महल में एकदम तन्हाई में हुई. लेकिन उनकी मौत का पता नहीं चला और कहीं कोई खबर नहीं बनी. वाजिद अली शाह के वंशज की ऐसी गुमनाम मौत होगी.. ये किसी ने सोचा नहीं था.

मालचा महल देश की राजधानी दिल्ली में मौजूद है. पिछले करीब 30 वर्षों से प्रिंस अली रज़ा इसी मालचा महल में रहते थे . नवाब का खौफ इतना था कि 30 वर्षों से इस महल में वही आदमी जा पाया जिसे आने की इजाज़त अली रज़ा ने दी.

कौन थे प्रिंस अली रज़ा….
दिल्ली का एक ऐसे गुमनाम महल जिसके बारे में अधिकतर दिल्ली वासी भी नहीं जानते है.यह है दिल्ली के दक्षिण रिज़ के बीहड़ों में छुपा ‘मालचा महल’ जिसमे पिछले 28 सालो से अवध राजघराने के वंशज राजकुमार ‘रज़ा’ और राजकुमारी ‘सकीना महल’ रह रहे है.

पहले इनके साथ इनकी माँ ‘विलायत महल’ भी रहा करती थी जिन्होंने 10 सितम्बर 1993 को विलायत महल ने अपनी अंगूठी के हीरे को तोड़कर खा लिया था.और आत्महत्या कर ली थी. इस महल तक जाने का रास्ता सरदार पटेल मार्ग से जाता है.

लेकिन इस महल में अंदर जाने की इज़ाज़त किसी को नहीं है। इस महल तक पहुंचने के एक मात्र रास्ते पर लगा है लोहे का ग्रिल, जिस पर हल्की-सी आहट होते ही कुत्ते भौंकना शुरु कर देते हैं .

चारों ओर कंटीली तार के बाड़े से घिरे इस महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, रूलर्स ऑफ अवध ‘प्रिंसेस विलायत महल’ इस इमारत में न बिजली है, न पानी, पर एक टेलिफोन जरूर लगा हुआ है.

इस महल मे ट्रांसपोर्ट के नाम पर सिर्फ एक साइकल मौजूद है। जब 1985 में विलायत महल यहाँ रहने आई थी तो उनके साथ उनके बच्चो के अलावा 12 कुत्ते और पाँच नेपाली नौकर साथ थे. लेकिन बाद मे इस महल में राजकुमार, राजकुमारी और कुछ कुत्ते बचे थे.

फ़िरोज़ शाह तुगलक ने लोहे की रेलिंग का निर्माण कराया था. जिस पर कुत्तो से सावधान का बोर्ड लगा था.अब लगभग खंडहर हो चुके इस महल का निर्माण आज से 700 साल पूर्व फ़िरोज़ शाह तुगलक ने कराया था. यह महल उसकी शिकारगाह था.

पहाड़ी पर बने इस महल में करीब 10 खिड़की और दरवाज़े है पर इनमे से एक किवाड़ नहीं है.इस चौकोर रूप के महल के हर ओर 6 यानी कुल 24 मेहराब (आर्च) हैं। मरम्मत न होने के चलते इनमें से अब 3 आर्च ही सलामत हैं, जिनमें राजकुमार और राजकुमारी रह रहे हैं.

अब सवाल यह है कि आखिर कैसे विलायत महल लखनऊ छोड़कर वीरान और खंडहर हो चुके मालचा महल पहुँची.इस कहानी की शुरुआत होती है जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो महाराजाओं को सरकार की तरफ से पेंशन मिला करती थी उन्होंने पेंशन बंद कर दी थी.

इनमे से ही एक थी विलायत महल, जिनके पति कि मृत्यु हो चुकी थी और कमाई का कोई स्रोत नहीं था.कोई उपाय न देखकर विलायत महल ने सन 1975 में अपने दोनों बच्चेl रज़ा व सकीना सहित , 12 कुत्तों और और पांच नौकरों के साथ लखनऊ से दिल्ली की ओर रुख किया और यहां के नई दिल्ली. रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफॉर्म पर डेरा डाल दिया.

विलायत महल अपने कुनबे के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब नौ वर्ष तक रहीं.

इंदिरा गांधी ने उन्हें कहीं और रहने के लिए ठिकाना उपलब्ध कराने का वचन दिया और विलायत महल की मांग के अनुसार उन्हें रहने के लिए ऐसी जगह मुहैया कराई .

जहां आम आदमी उनकी जिंदगी में ताक-झांक न कर सके.और जगह की तलाश खत्म हुई सरदार पटेल मार्ग स्थित सेंट्रल रिज एरिया में स्थित मालचा महल पर.

मालचा महल ऊंची पहाड़ी पर तो स्थित है ही, जंगल से भी घिरा है. यह एक अनजान स्मारक है, जहां के बारे में आज भी दिल्ली के अधिकांश निवासी नहीं जानते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विलायत महल को मालचा महल में रहने के लिए स्वींकृति पत्र प्रदान की थी, जिसमें उन्हें नवाब वाजिद अली शाह का वंशज बताया गया था.

लेकिन 1994 में खजाने के लिए उनकी कब्र को खोदने की घटना के बाद उनके बेटे ने उन्हें निकालकर जला दिया.उनकी राख महल में ही एक जार में रखी है.राजकुमार रज़ा कभी कभी दिखाई दे जाते थे जब वो खुद के लिए राशन लाने और कुत्तो के लिए मीट लाने बाहर निकलते थे .

लेकिन वो लोगों की बातो का कम ही जवाब देते है और यदि कोई भी उनसे ज्यादा पूछ – ताछ करता है तो वो उस पर रिवाल्वर तान देते थे.

राजकुमार और राजकुमारी दोनों ही विलायत में पढ़े हुए है और उनकी अंग्रेजी बहुतअच्छी है. राजकुमारी सकीना महल ने अपनी मां बेगम विलायत महल पर एक किताब लिखी है, जिसका नाम है ‘प्रिंसेस विलायत महल, अनसीन प्रेजंस’ है.

यह बुक आज भी नीदरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन की लाइब्रेरी में तो मौजूद है, लेकिन भारत में नहीं हैं ये किताब.

राजकुमार रज़ा अपना खर्च पुश्तैनी ज्वैलरी बेच कर चलाते है. उनके पास एक तोप भी थी जिसकी की बहुत ऊंची बोली लग चुकी है लेकिन वो इसे बेचते नहीं थे क्योकि वो अवध खानदान की शान समझते थे.इनके अधिकतर रिश्तेदार ब्रिटेन में रहते है.

लोगो का मानना है की बेगम विलायत महल की आत्मा आज भी इसी महल में भटकती है और इसलिए इस जगह को दिल्ली के टॉप हॉन्टेड प्लेस में शामिल किया जाता है.अब ये हॉन्टेड है या नहीं, पता नहीं, लेकिन इतना जरूर यह जगह रात को डरावनी और दिन में रहस्यमयी नज़र आती है.