मनोरंजक बाल कथा – सोने का पिंजरा

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एक शहर में कपड़े का एक बहुत बड़ा व्यापारी था। आसपास के गांवों के लोग उसकी दुकान पर कपड़ा खरीदने आते थे। सेठ कभी कभी अपने ग्राहकों को उधार कपड़ा भी देता था। इसलिए आसपास के गांवों में सेठ को उगाही करने जाना पड़ता था।

एक बार सेठ गांव में उगाही करने गया था। वहां से लौटते समय एक पेड़ के नीचे वह आराम करने बैठ गया और थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गई। जब वह नींद से जागा तो उसने अपने आसपास तोतों का समूह देखा। हरे रंग, लाल चोंच और गले पर काली पटृी वाले तोतों को देखकर सेठ ने सोचा, कितने सुंदर हैं ये तोते। एक दो तोतों को साथ ले जाऊं तो परिवार के लोग बहुत खुश होंगे।Manoranjak baal katha - sone ka pinjra

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यह सोचकर सेठ ने अपना गमछा तोतों के झुण्ड पर फेंका और एक तोता पकड़ लिया। इस तोते को सेठ अपने घर ले गया।

सेठ ने घर पहुंचकर तोते के लिए सोने का पिंजरा बनवाया। उसमें तोते के लिए बैठक और एक झूला रखवाया। पानी पीने के लिए कटोरी और खाने के लिए एक छोटी सी तश्तरी भी रखवाई। तोता सोने के पिंजरे में रहने लगा। उसे अमरूद, मिर्च आदि मनपसंद वस्तुएं खाने को दी जाने लगीं। घर के बच्चे तथा सेठ तोते से बातें भी करते। तोता थोड़ा थोड़ा बोलना भी सीख गया। तोते के साथ बातें करने में सबको बहुत आनंद आने लगा।

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दूसरी बार जब सेठ उगाही करने निकला तो उसने तोते से कहा, ”तोते राम, मैं उगाही करने जा रहा हूं। लौटते समय मैं तेरे माता पिता व सगे संबंधियों से मिलूंगा। तुझे उनके लिए कोई संदेश भेजना हो तो बता?“

तोते ने कहा, ”सेठ जी, उन सबसे कहना, तोता भूखा नहीं है, तोता प्यासा भी नहीं है। तोता सोने के पिंजरे के अंदर आनंद से रह रहा है।“

सेठ उगाही कर लौटते समय उसी पेड़ के नीचे आराम करने के लिए रूका। तभी तोतों का एक समूह उस पर टूट पड़ा। वे उसे चोंच से मारने लगे। उनमें से एक तोते ने सेठ से पूछा, ”सेठ जी, हमारा तोता क्या कर रहा है?“

सेठ ने उन्हें शांत करते हुए कहा, ”तोता भूखा नहीं है, तोता प्यासा नहीं है। तोता सोने के पिंजरे के अंदर आनंद कर रहा है।“

यह सुनकर सभी तोते बिना कुछ बोले जमीन पर मुर्दों की तरह लुढ़क गए। सेठ उनके पास गया उसने तोतों को हिला डुलाकर देखा, पर ऐसा लगा जैसे सारे तोते आघात से मर गए हों।

सेठ जी घर पर आए। सेठ को देखते ही तोते ने अपने माता पिता एवं सगे संबंधियों के समाचार पूछे।

सेठ ने कहा, ”तेरे माता पिता और सगे संबंधियों को जब मैंने तेरा संदेश सुनाया तो सभी लुढ़क गए। क्या उन्हें आघाल लगा होगा?“

पिंजरे के तोते ने कोई जवाब नहीं दिया। सेठ की बात सुनकर वह स्वयं भी पिंजरे में झूले से नीचे गिर पड़ा। सेठ ने यह देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उसने पिंजरे का दरवाजा खोला और तोते को हिला डुलाकर देखा। सेठ जी को लगा वह तोता भी आघात से मर गया है। सेठ जी ने तोते को पिंजरे से बाहर निकालकर थोड़ी दूर पर रख दिया। मौका देखकर तोता पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ गया।

जाते जाते उसने कहा, ”सेठ जी, मैं आपका आभारी हूं। मुझे अपने माता पिता का संदेश मिल गया है। मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। आपका पिंजरा सोने का था, लेकिन वह पिंजरा था। मेरे लिए वह जेल थी।“ तोता उड़ता हुआ जंगल में अपने माता पिता और सगे संबंधियों के पास पहुंच गया। उसे लौटकर आया हुआ देख सब खुश हो गए।

अब मुक्त वातावरण में तोता सबके साथ आनंद से रहने लगा।

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