तेरी आरज़ू

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गर ना तारीफ तेरी होती, ना फिर मज़ाक मेरा होता
गर ना ज़मीं तेरी होती, ना फिर आसमाँ मेरा होता

कट जाते ज़िन्दगी के सफर यूँ ही साथ चलते चलते
गर ना आरज़ू तेरी होती, ना फिर ज़ुस्तज़ु मेरा होता

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