हम नमस्ते क्यों करते हैं? – Namaste karne ke fayde

Namaste karne ke fayde

Namaste karne ke faydeशास्त्रों में पाँच प्रकार के अभिवादन बतलाये गये हैं, जिनमें से एक है ‘नमस्कारम’। नमस्कार को कई प्रकार से देखा और समझा जा सकता है। संस्कृत में इसे विच्छेद करे तो हम पाएंगे कि नमस्ते दो शब्दों से बना है नमः स्ते। नमः का मतलब होता है मैं (मेरा अहंकार) झुक गया।

नम का एक और अर्थ हो सकता है जो है न में यानी कि मेरा नहीं। अध्यात्म की दृष्टि से इसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य के सामने अपने अहंकार को कम कर रहा है।

नमस्ते करते समय दोनों हाथों को जोड़कर एक कर दिया जाता है, जिसका अर्थ है कि इस अभिवादन के बाद दोनों व्यक्ति के दिमाग मिल गए या एक दिशा में हो गये।

नमस्ते (नमस्कार) के अर्थ में आध्यात्मिक शोध करने पर हमने यह पाया कि यह दूसरे व्यक्तको नमस्कार करने की आध्यात्मिक रूप से एक बहुत ही लाभप्रद और सात्विक पद्धति है। इसके कारण हैं :

नमस्कार करने के पीछे का प्रयोजन : नमस्कार अर्थात दूसरों में दैवी रूप को देखना, यह आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है और दैवी चेतना (चैतन्य) को आकर्षित करता है । यदि नमस्कार ऐसी आध्यात्मिक भाव से किया जाये कि हम सामने वाले व्यक्ति की आत्मा को नमस्कार कर रहे हैं, यह हममें कृतज्ञता और समर्पण की भावना जागृत करता है। यह आध्यात्मिक विकासमें सहायता करता है।

नमस्कार करते समय यदि हम ऐसा विचार रखते हैं कि “आप हमसे श्रेष्ठ हैं, मैं आपका अधीनस्त हूँ, मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं और आप सर्वज्ञ हैं”, यह अहंकारको कम करने और विनम्रताको बढ़ाने में सहायक होता है।

नमस्कार के समय हाथ की मुद्रा : नमस्कार मुद्रा करने से, दैवी चैतन्य बडी मात्रामें देह में अवशोषित होता है। ’नमस्ते’ अथवा ‘नमस्कार’ शब्द कहने पर आकाशतत्व का आवाहन हो जाता है। इन शब्दों को हाथ की मुद्रा के साथ कहने पर पृथ्वीतत्व का भी आवाहन होता है। मुद्रा स्वयं पृथ्वीतत्व से सम्बंधित है, इस कारण यह संभव हो पता है I इस प्रकार पांच संपूर्ण सृष्टिके सिद्धांतों को अधिकाधिक मात्रा में जागृत करने पर अत्याधिक आध्यात्मिक सकारात्मकता आकृष्ट होती है। इसप्रकार, एक से अधिक पंचमहाभूतों का आवाहन होने पर आध्यात्मिक सकारात्मकता अधिक मात्रा में आकृष्ट होती है।

शारीरिक संपर्क का न होना : शारीरिक सम्पर्क दो व्यक्तियों के बीच सूक्ष्म-ऊर्जाके प्रवाहको और सुगम बनाता  है। अभिवादन की इस पद्धति में शारीरिक सम्पर्क न होने के कारण अन्य व्यक्ति के नकारात्मक रूप से प्रभावित करने की क्षमता न्यूनतम हो जाती हैI

इसके आध्यात्मिक लाभों के कारण, नमस्कार करने वाले दोनों व्यक्तियों के बीच की नकारात्मक स्पंदन कम हो जाते हैं और सात्विक स्पंदन का लाभ प्राप्त होता है I

अभिवादन की इस पद्धति के आध्यात्मिक होने के कारण सत्व गुण बढता है और इससे नमस्कार करने वाले दोनों व्यक्तियों के एक दूसरे को नकारात्मक स्पंदनों से संक्रमित करने की संभावना और भी न्यून हो जाती हैं । परंतु यदि किसी व्यक्ति को अनिष्ट शक्ति का कष्ट है तो उसके नमस्कार करने पर भी नकारात्मक स्पंदनों का ही प्रवाह होगा। अनिष्ट शक्ति उस व्यक्ति की उँगलियों के माध्यम से अभिवादन किए जानेवाले व्यक्ति तथा वातावरण में नकारात्मक स्पंदन का वमन कर सकती है। तथापि हाथ मिलाने, जिसमें कि शारीरिक संपर्क होता है, की तुलना में, अनिष्ट शक्ति से पीडित व्यक्ति के नमस्कार करने पर भी नकारात्मक स्पंदन का प्रभाव बहुत ही सीमित होता है। नमस्कार भावपूर्ण होने पर नकारात्मक स्पंदन पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं ।

योग के अनुसार नमस्ते करने के लिए, दोनो हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है, आँखें बंद की जाती हैं, और सिर को झुकाया जाता है। इस विधि का विस्तार करते हुए हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जा सकता है।

यह विधि गहरे आदर का सूचक है। जरूरी नहीं कि नमस्ते, नमस्कार या प्रणाम करते हुए ये शब्द बोले भी जाएं। नमस्कार या प्रणाम की भावमुद्रा का अर्थ ही उस भाव की अभिव्यक्ति है।