नेशनल हेराल्ड केस में अरविन्द केजरीवाल की चुप्पी से उठते सवाल

देश की राजनीति में इस समय भ्रष्टाचार के दो ही मुद्दे गरमाए हुए हैं – पहला, डीडीसीए में अरुण जेटली के अध्यक्ष काल में हुआ कथित घोटाला और दूसरा, नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर कसता कानूनी शिकंजा !

जहां अरुण जेटली ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जोरदार खंडन किया है और इस मामले को जोर-शोर से उठाने वाले अरविन्द केजरीवाल पर मानहानि का कानूनी दवा भी थोक दिया है वहीँ दूसरी और कांग्रेस पार्टी सोनिया और राहुल गांधी के ऊपर नेशनल हेराल्ड केस को राजनीति से प्रेरित बता कर आखिर तक न्याय की लड़ाई लड़ने का दम भरती आ रही है।

Arvind Kejriwal National Herald नेशनल हेराल्ड अरविन्द केजरीवाल चुप्पी सवालइस देश में घोटाले होना, घोटाले के आरोप लगना और उस पर राजनीति होना कोई नई बात नहीं है न ही इस में कोई आश्चर्य करने वाली बात है।  आश्चर्य की बात कोई अगर है तो वह है नेशनल हेराल्ड केस में अरविन्द केजरीवाल की रहस्यमय  चुप्पी !! जहां अरुण जेटली के डीडीसीए वाले कथित घोटाले पर चीख चीख कर उन्होंने अपना गला बैठा लिया है, यहां तक कि दिल्ली विधान सभा का एक विशेष सत्र बुला कर उस में अरुण जेटली और प्रधान मंत्री को जी भर कर कोसा, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग भी कर डाली, सीबीआई पर इल्जाम लगा डाले।

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वहीँ अरविन्द केजरीवाल ने नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र  की करोड़ों रुपये की सम्पत्ति को कथित रूप से अवैधानिक और पिछले दरवाजे से हड़पने के आरोप सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर लगने के बावजूद इस मामले में कुछ बोलना जरूरी नहीं समझा।

अब यह तो सभी को पता है कि बेचारे अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोध के आंदोलन का राजनीतिक फायदा तो सबसे ज्यादा अरविन्द केजरीवाल को ही मिला और अन्ना बेचारे रालेगण सिद्धि वापस जा बैठे।  लेकिन मात्र ४ साल में भ्रष्टाचार के विरोध में चलने वाले एक एनजीओ के संयोजक से दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर अरविन्द केजरीवाल ने आंधी-तूफ़ान की तेजी से आसानी से तय कर लिया।  और इस बीच देश-विदेश में उन्होंने अपनी छवि एकमात्र ऐसे नेता की बनाने का भरसक प्रयास भी किया जो भ्रष्टाचार के सफाये और स्वच्छ राजनीति के लिए अपनी जान लगाए हुए है।

जनता ने काफी हद उनकी इस छवि को स्वीकार भी किया लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी कथनी और करनी में फर्क साफ़ नजर आ रहा है।

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पहले अपनी आप आदमी पार्टी से अपने पुराने साथियों योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर का रास्ता दिखा कर पार्टी के आतंरिक लोकतंत्र का गला घोटा और अब सारा विरोध सिर्फ बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर केंद्रित होते जाने से ऐसा लग रहा है कि उनके विरोधियों के इस दावे में दम है कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी कांग्रेस की ही टीम B से ज्यादा कुछ नहीं है।