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पराधीन जो जन, नहीं स्वर्ग नरक ता हेतुपराधीन जो जन नहीं, स्वर में कौनसा अलंकार है?

पराधीन जो जन, नहीं स्वर्ग नरक ता हेतुपराधीन जो जन नहीं, स्वर में कौनसा अलंकार है?

प्रश्न – पराधीन जो जन, नहीं स्वर्ग नरक ता हेतुपराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग नरक ता हेतु में कौनसा अलंकार है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।

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उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है क्योंकि इसमें समान शब्दों की आवृत्ति हो रही है। शब्द एक ही है परंतु विराम चिन्हों के परिवर्तन से अर्थ में परिवर्तन हो जाता है और कविता सुंदर हो जाती है।

इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार का कौन सा भेद हैं?

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जब काव्य पंक्ति में कोई शब्द या वाक्य की आवृत्ति होती है तो वहाँ लाटानुप्रास होता है। यहाँ पराधीन, जन, स्वर्ग,नर्क इत्यादि कि आवृत्ति हुई है लेकिन अर्थ में परिवर्तन हो रहा है इसलिए इसमें लाटानुप्रास है

जैसा कि आपने इस उदाहरण में देखा जहां पर किसी वर्ण के विशेष प्रयोग से पंक्ति में सुंदरता, लय तथा चमत्कार उत्पन्न हो जाता है उसे हम शब्दालंकार कहते हैं।

अनुप्रास अलंकार शब्दालंकार का एक प्रकार है। काव्य में जहां समान वर्णों की एक से अधिक बार आवृत्ति होती है वहां अनुप्रास अलंकार होता है।

पराधीन जो जन, नहीं स्वर्ग नरक ता हेतुपराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग नरक ता हेतु में अलंकार से संबन्धित प्रश्न परीक्षा में कई प्रकार से पूछे जाते हैं। जैसे कि – यहाँ पर कौन सा अलंकार है? दी गई पंक्तियों में कौन सा अलंकार है? दिया गया पद्यान्श कौन से अलंकार का उदाहरण है? पद्यांश की पंक्ति में कौन-कौन सा अलंकार है, आदि।

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