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Pinjre mein band do pakshiyon ke beech baatchit par samvad- Samvad Lekhan

चीं-चीं : चूं-चूं क्या तुम पिंजरे में बंद रह कर परेशान नहीं हो गए ?

चूं-चूं : क्यों नहीं चीं-चीं ? पिंजरे में बंद रह कर जैसे तुम उदास रहती हो वैसे ही मैं भी । पर किया क्या जा सकता है ? हमारा मालिक कभी पिंजरा भी तो नहीं खोलता जो हम झट से उड़ जाएँ ।

चीं-चीं : सच में मुझे मौका मिले तो मैं तो पलक झपकते ही उड़ जाऊँ।

चूं-चूं : पिंजरे से बाहर अपने साथियों को खुले आकाश में
उड़ते देखता हूँ तो बहुत दुखी हो जाता हूँ । वे कैसे कभी इस डाली तो कभी उस डाली उड़-उड़ कर जाते हैं ।

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चीं-चीं : सच में । उनकी जो फल खाने की इच्छा होती है उसी बाग़ में पहुँच जाते हैं । अपने पंखों को हवा में लहराते हुए इधर – उधर घुमते हैं और एक हम हैं कि बंद पिंजरे से खुले आकाश का नज़ारा लेते रहते हैं । अब तो घुटन सी होने लगी है ।

चूं-चूं : तुमे देखा था पिछली बार जब बारिश हुई थी तो कैसे हमारे साथी गड्ढे में भरे पानी से खेल रहे थे । हमारे लिए तो अब यह सपना ही हो गया ।

चीं-चीं : अबकी बार जब पिंजरा साफ़ करने के लिए जैसे ही मालिक दरवाज़ा खोलेगा मैं अपनी चोंच से उसकी ऊँगली दबा दूँगी और जैसे ही वो हाथ हटाएगा हम फुर्र से उड़ जायेंगे ।

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