Poos Ki Raat Premchand

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पूस की रात प्रेमचंद्र

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा- सहना आया है, लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे ।
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली- तीन ही तो रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा ? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे। अभी नहीं ।

हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा । पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियाँ देगा। बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी । यह सोचता हुआ वह अपना भारी- भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता था ) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला- ला दे दे, गला तो छूटे। कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूँगा।

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मुन्नी उसके पास से दूर हट गयी और आँखें तरेरती हुई बोली- कर चुके दूसरा उपाय ! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्मल ? न जाने कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती । मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुट्टी हुई । बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है । पेट के लिए मजूरी करो । ऐसी खेती से बाज आये । मैं रुपये न दूँगी, न दूँगी ।

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हल्कू उदास होकर बोला- तो क्या गाली खाऊँ ?

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मुन्नी ने तड़पकर कहा- गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है ?

मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गयीं । हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भाँति उसे घूर रहा था ।

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उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिये। फिर बोली- तुम छोड़ दो अबकी से खेती । मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी । किसी की धौंस तो न रहेगी । अच्छी खेती है ! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस ।

हल्कू ने रुपये लिये और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो । उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपये कम्मल के लिए जमा किये थे । वह आज निकले जा रहे थे । एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था ।

पूस की अंधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था । खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था । दो में से एक को भी नींद न आती थी ।

हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा- क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहाँ क्या लेने आये थे ? अब खाओ ठंड, मैं क्या करूँ ? जानते थे, मै यहाँ हलुवा-पूरी खाने आ रहा हूँ, दौड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये । अब रोओ नानी के नाम को ।

जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया। उसकी श्वान-बुध्दि ने शायद ताड़ लिया, स्वामी को मेरी कूँ-कूँ से नींद नहीं आ रही है।
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हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा- कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे । यह राँड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही है । उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ । किसी तरह रात तो कटे ! आठ चिलम तो पी चुका । यह खेती का मजा है ! और एक-एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा जाय तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ- कम्मल । मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाय । तकदीर की खूबी ! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें !

हल्कू उठा, गड्ढ़े में से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी । जबरा भी उठ बैठा ।

हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा- पियेगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता है, जरा मन बदल जाता है।

जबरा ने उसके मुँह की ओर प्रेम से छलकती हुई आँखों से देखा ।

हल्कू- आज और जाड़ा खा ले । कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा । उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा ।

जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिये और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया । हल्कू को उसकी गर्म साँस लगी ।

चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा । कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भाँति उसकी छाती को दबाये हुए था ।

जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाये हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था । जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी । अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता । वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुँचा दिया । नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वा र खोल दिये थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था ।

सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पायी । इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नयी स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी । वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा । हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया । हार में चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता । कर्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था ।

एक घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई | ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहा है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है ! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े । ऊपर आ जायँगे तब कहीं सबेरा होगा । अभी पहर से ऊपर रात है ।

हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था । पतझड़ शुरु हो गयी थी । बाग में पत्तियों को ढेर लगा हुआ था । हल्कू ने सोचा, चलकर पत्तियाँ बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ । रात को कोई मुझे पत्तियाँ बटोरते देख तो समझे कोई भूत है । कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता ।

उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौधे उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला । जबरा ने उसे आते देखा तो पास आया और दुम हिलाने लगा ।

हल्कू ने कहा- अब तो नहीं रहा जाता जबरू । चलो बगीचे में पत्तियाँ बटोरकर तापें । टाँठे हो जायेंगे, तो फिर आकर सोयेंगें । अभी तो बहुत रात है।

जबरा ने कूँ-कूँ करके सहमति प्रकट की और आगे-आगे बगीचे की ओर चला।

बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था । वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं ।

एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया ।

हल्कू ने कहा- कैसी अच्छी महक आई जबरू ! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही है ?

जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गयी थी । उसे चिंचोड़ रहा था ।
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हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियाँ बटोरने लगा । जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया। हाथ ठिठुरे जाते थे । नंगे पाँव गले जाते थे । और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था । इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा ।

थोड़ी देर में अलाव जल उठा । उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी । उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों अंधकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था ।

हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था । एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पाँव फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में जो आये सो कर । ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था ।

उसने जबरा से कहा- क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है ?

जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा- अब क्या ठंड लगती ही रहेगी ?

‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खाते ।’

जब्बर ने पूँछ हिलायी ।

’अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें । देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बच्चा,
तो मैं दवा न करूँगा ।’

जब्बर ने उस अग्निराशि की ओर कातर नेत्रों से देखा !

मुन्नी से कल न कह देना, नहीं तो लड़ाई करेगी ।

यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ निकल गया । पैरों में जरा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी । जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ ।

हल्कू ने कहा- चलो-चलो इसकी सही नहीं ! ऊपर से कूदकर आओ । वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया ।
पत्तियाँ जल चुकी थीं । बगीचे में फिर अंधेरा छा गया था । राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर आँखें बंद कर लेती थी !

हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा । उसके बदन में गर्मी आ गयी थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाये लेता था ।

जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुंड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुंड था । उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी । फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं हैं। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी।

उसने दिल में कहा- नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहाँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!

उसने जोर से आवाज लगायी- जबरा, जबरा।

जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया।

फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दंदाया हुआ था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।

उसने जोर से आवाज लगायी- लिहो-लिहो !लिहो! !

जबरा फिर भूँक उठा । जानवर खेत चर रहे थे । फसल तैयार है । कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किये डालते हैं।

हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला, पर एकाएक हवा का ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा ।

जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था । अकर्मण्यता ने रस्सियों की भाँति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था।

उसी राख के पास गर्म जमीन पर वह चादर ओढ़ कर सो गया ।

सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैल गयी थी और मुन्नी कह रही थी- क्या आज सोते ही रहोगे ? तुम यहाँ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया ।

हल्कू ने उठकर कहा- क्या तू खेत से होकर आ रही है ?

मुन्नी बोली- हाँ, सारे खेत का सत्यानाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहाँ मड़ैया डालने से क्या हुआ ?

हल्कू ने बहाना किया- मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी है। पेट में ऐसा दरद हुआ कि मै ही जानता हूँ !

दोनों फिर खेत के डाँड़ पर आये । देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों ।

दोनों खेत की दशा देख रहे थे । मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था ।

हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा- रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।

मुन्नी ने चिंतित होकर कहा- अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।

halkoo ne aakara stree se kahaa- sahana aaya hai, laao, jo rupaye rakhe haim, use de doom’, kisee taraha gala to chhoot’e .

munnee jhaaroo laga rahee thee. peechhe phirakara bolee- teena hee to rupaye haim, de doge to kammala kahaam’ se aavega ? maagha-poosa kee raata haara mem kaise kat’egee ? usase kaha do, phasala para de denge. abhee naheem .

halkoo eka kshana anishchita dasha mem khara raha . poosa sira para a gayaa, kammala ke bina haara mem raata ko vaha kisee taraha naheem ja sakataa. magara sahana maanega naheem, ghurakiyaam’ jamaavegaa, gaaliyaam’ degaa. bala se jaarom mem marenge, bala to sira se t’ala jaaegee . yaha sochata hua vaha apana bhaaree- bharakama d’eela lie hue (jo usake naama ko jhoot’ha siddha karata tha ) stree ke sameepa a gaya aura khushaamada karake bolaa- la de de, gala to chhoot’e. kammala ke lie koee doosara upaaya sochoom’gaa.

munnee usake paasa se doora hat’a gayee aura aam’khem tareratee huee bolee- kara chuke doosara upaaya ! jara sunoom’ to kauna-sa upaaya karoge ? koee khairaata de dega kammala ? na jaane kitanee baakee hai, jom kisee taraha chukane hee naheem aatee . maim kahatee hoom’, tuma kyom naheem khetee chhora dete ? mara-mara kaama karo, upaja ho to baakee de do, chalo chhut’t’ee huee . baakee chukaane ke lie hee to hamaara janama hua hai . pet’a ke lie majooree karo . aisee khetee se baaja aaye . maim rupaye na doom’gee, na doom’gee .

halkoo udaasa hokara bolaa- to kya gaalee khaaoom’ ?

munnee ne tarapakara kahaa- gaalee kyom degaa, kya usaka raaja hai ?

magara yaha kahane ke saatha hee usakee tanee huee bhauhem d’heelee para gayeem . halkoo ke usa vaakya mem jo kat’hora satya thaa, vaha maano eka bheeshana jantu kee bhaam’ti use ghoora raha tha .

usane jaakara aale para se rupaye nikaale aura laakara halkoo ke haatha para rakha diye. phira bolee- tuma chhora do abakee se khetee . majooree mem sukha se eka rot’ee to khaane ko milegee . kisee kee dhaumsa to na rahegee . achchhee khetee hai ! majooree karake laao, vaha bhee usee mem jhonka do, usa para dhaumsa .

halkoo ne rupaye liye aura isa taraha baahara chala maano apana hri’daya nikaalakara dene ja raha ho . usane majooree se eka-eka paisa kaat’a-kapat’akara teena rupaye kammala ke lie jama kiye the . vaha aaja nikale ja rahe the . eka-eka paga ke saatha usaka mastaka apanee deenata ke bhaara se daba ja raha tha .

poosa kee andheree raata ! aakaasha para taare bhee t’hit’hurate hue maalooma hote the. halkoo apane kheta ke kinaare ookha ke patom kee eka chhataree ke neeche baam’sa ke khat’ole para apanee puraanee gaarhe kee chaadara orhe para kaam’pa raha tha . khaat’a ke neeche usaka sangee kutta jabara pet’a me mum’ha d’aale sardee se koom’-koom’ kara raha tha . do mem se eka ko bhee neenda na aatee thee .

halkoo ne ghut’aniyom kom garadana mem chipakaate hue kahaa- kyom jabaraa, jaara lagata hai? kahata to thaa, ghara mem puaala para let’a raha, to yahaam’ kya lene aaye the ? aba khaao t’hand’a, maim kya karoom’ ? jaanate the, mai yahaam’ haluvaa-pooree khaane a raha hoom’, daure-daure aage-aage chale aaye . aba roo naanee ke naama ko .

jabara ne pare-pare duma hilaayee aura apanee koom’-koom’ ko deergha banaata hua eka baara jamhaaee lekara chupa ho gayaa. usakee shvaana-budhdi ne shaayada taara liyaa, svaamee ko meree koom’-koom’ se neenda naheem a rahee hai.

maanasarovara kee sampoorna kahaaniyaam parhem:

halkoo ne haatha nikaalakara jabara kee t’hand’ee peet’ha sahalaate hue kahaa- kala se mata aana mere saatha, naheem to t’hand’e ho jaaoge . yaha raam’d’a pachhua na jaane kahaam’ se barapha lie a rahee hai . ut’hoom’, phira eka chilama bharoom’ . kisee taraha raata to kat’e ! aat’ha chilama to pee chuka . yaha khetee ka maja hai ! aura eka-eka bhagavaana aise pare haim, jinake paasa jaara jaaya to garamee se ghabaraakara bhaage. mot’e-mot’e gadde, lihaapha- kammala . majaala hai, jaare ka gujara ho jaaya . takadeera kee khoobee ! majooree hama karem, maja doosare loot’em !

halkoo ut’haa, gad’rhe mem se jaraa-see aaga nikaalakara chilama bharee . jabara bhee ut’ha bait’ha .

halkoo ne chilama peete hue kahaa- piyega chilama, jaara to kya jaata hai, jara mana badala jaata hai.

jabara ne usake mum’ha kee ora prema se chhalakatee huee aam’khom se dekha .

halkoo- aaja aura jaara kha le . kala se maim yahaam’ puaala bichha doom’ga . usee mem ghusakara bait’hanaa, taba jaara na lagega .

jabara ne apane panje usakee ghut’aniyom para rakha diye aura usake mum’ha ke paasa apana mum’ha le gaya . halkoo ko usakee garma saam’sa lagee .

chilama peekara halkoo phira let’a aura nishchaya karake let’a ki chaahe kuchha ho abakee so jaaoom’gaa, para eka hee kshana mem usake hri’daya mem kampana hone laga . kabhee isa karavat’a let’ataa, kabhee usa karavat’a, para jaara kisee pishaacha kee bhaam’ti usakee chhaatee ko dabaaye hue tha .

jaba kisee taraha na raha gaya to usane jabara ko dheere se ut’haaya aura usaka sira ko thapathapaakara use apanee goda mem sula liya . kutte kee deha se jaane kaisee durgandha a rahee thee, para vaha use apanee goda me chipat’aaye hue aise sukha ka anubhava kara raha thaa, jo idhara maheenom se use na mila tha . jabara shaayada yaha samajha raha tha ki svarga yaheem hai, aura halkoo kee pavitra aatma mem to usa kutte ke prati ghri’na kee gandha taka na thee . apane kisee abhinna mitra ya bhaaee ko bhee vaha itanee hee tatparata se gale lagaata . vaha apanee deenata se aahata na thaa, jisane aaja use isa dasha ko pahum’cha diya . naheem, isa anokhee maitree ne jaise usakee aatma ke saba dva ra khola diye the aura unaka eka-eka anu prakaasha se chamaka raha tha .

sahasa jabara ne kisee jaanavara kee aahat’a paayee . isa vishesha aatmeeyata ne usame eka nayee sphoorti paida kara dee thee, jo hava ke t’hand’em jhokom ko tuchchha samajhatee thee . vaha jhapat’akara ut’ha aura chhaparee se baahara aakara bhoom’kane laga . halkoo ne use kaee baara chumakaarakara bulaayaa, para vaha usake paasa na aaya . haara mem chaarom tarapha daura-daurakara bhoom’kata rahaa. eka kshana ke lie a bhee jaataa, to turanta hee phira daurata . kartavya usake hri’daya mem aramaana kee bhaam’ti hee uchhala raha tha .

eka ghant’a aura gujara gayaa. raata ne sheeta ko hava se dhadhakaana shuru kiyaa. halkoo ut’ha bait’ha aura donom ghut’anom ko chhaatee se milaakara sira ko usamem chhipa liyaa, phira bhee t’hand’a kama na huee | aisa jaana parata thaa, saara rakta jama gaya hai, dhamaniyom me rakta kee jagaha hima baha raha hai. usane jhukakara aakaasha kee ora dekhaa, abhee kitanee raata baakee hai ! saptarshi abhee aakaasha mem aadhe bhee naheem charhe . oopara a jaayam’ge taba kaheem sabera hoga . abhee pahara se oopara raata hai .

halkoo ke kheta se koee eka golee ke t’appe para aamom ka eka baaga tha . patajhara shuru ho gayee thee . baaga mem pattiyom ko d’hera laga hua tha . halkoo ne sochaa, chalakara pattiyaam’ bat’oroom’ aura unhem jalaakara khooba taapoom’ . raata ko koee mujhe pattiyaam’ bat’orate dekha to samajhe koee bhoota hai . kauna jaane, koee jaanavara hee chhipa bait’ha ho, magara aba to bait’he naheem raha jaata .

usane paasa ke arahara ke kheta mem jaakara kaee paudhe ukhaara lie aura unaka eka jhaaroo banaakara haatha mem sulagata hua upala liye bageeche kee tarapha chala . jabara ne use aate dekha to paasa aaya aura duma hilaane laga .

halkoo ne kahaa- aba to naheem raha jaata jabaroo . chalo bageeche mem pattiyaam’ bat’orakara taapem . t’aam’t’he ho jaayenge, to phira aakara soyengem . abhee to bahuta raata hai.

jabara ne koom’-koom’ karake sahamati prakat’a kee aura aage-aage bageeche kee ora chalaa.

bageeche mem khooba am’dhera chhaaya hua tha aura andhakaara mem nirdaya pavana pattiyom ko kuchalata hua chala jaata tha . vri’kshom se osa kee boom’de t’apa-t’apa neeche t’apaka rahee theem .

ekaaeka eka jhonka meham’dee ke phoolom kee khooshaboo lie hue aaya .

halkoo ne kahaa- kaisee achchhee mahaka aaee jabaroo ! tumhaaree naaka mem bhee to sugandha a rahee hai ?

jabara ko kaheem jameena para eka had’ad’ee paree mila gayee thee . use chinchora raha tha .

hindee preraka kahaaniyom ka vishaala sangraha bhee parhem!

halkoo ne aaga jameena para rakha dee aura pattiyaam’ bat’orane laga . jara dera mem pattiyom ka d’hera laga gayaa. haatha t’hit’hure jaate the . nange paam’va gale jaate the . aura vaha pattiyom ka pahaara khara kara raha tha . isee alaava mem vaha t’hand’a ko jalaakara bhasma kara dega .

thoree dera mem alaava jala ut’ha . usakee lau oopara vaale vri’ksha kee pattiyom ko chhoo-chhookara bhaagane lagee . usa asthira prakaasha mem bageeche ke vishaala vri’ksha aise maalooma hote the, maano usa athaaha andhakaara ko apane sirom para sam’bhaale hue hom andhakaara ke usa ananta saagara me yaha prakaasha eka nauka ke samaana hilataa, machalata hua jaana parata tha .

halkoo alaava ke saamane bait’ha aaga taapa raha tha . eka kshana mem usane dohara utaakara bagala mem daba lee, donom paam’va phaila die, maanom t’hand’a ko lalakaara raha ho, tere jee mem jo aaye so kara . t’hand’a kee aseema shakti para vijaya paakara vaha vijaya-garva ko hri’daya mem chhipa na sakata tha .

usane jabara se kahaa- kyom jabbara, aba t’hand’a naheem laga rahee hai ?

jabbara ne koom’-koom’ karake maano kahaa- aba kya t’hand’a lagatee hee rahegee ?

‘pahale se yaha upaaya na soojhaa, naheem itanee t’hand’a kyom khaate .’

jabbara ne poom’chha hilaayee .

’achchha aao, isa alaava ko koodakara paara karem . dekhem, kauna nikala jaata hai. agara jala gae bachchaa,

to maim dava na karoom’ga .’

jabbara ne usa agniraashi kee ora kaatara netrom se dekha !

munnee se kala na kaha denaa, naheem to laraaee karegee .

yaha kahata hua vaha uchhala aura usa alaava ke oopara se saapha nikala gaya . pairom mem jara lapat’a lagee, para vaha koee baata na thee . jabara aaga ke girda ghoomakara usake paasa a khara hua .

halkoo ne kahaa- chalo-chalo isakee sahee naheem ! oopara se koodakara aao . vaha phira kooda aura alaava ke isa paara a gaya .

pattiyaam’ jala chukee theem . bageeche mem phira andhera chha gaya tha . raakha ke neeche kuchha-kuchha aaga baakee thee, jo hava ka jhonka a jaane para jara jaaga ut’hatee thee, para eka kshana mem phira aam’khem banda kara letee thee !

halkoo ne phira chaadara orha lee aura garma raakha ke paasa bait’ha hua eka geeta gunagunaane laga . usake badana mem garmee a gayee thee, para jyom-jyom sheeta barhatee jaatee thee, use aalasya dabaaye leta tha .

jabara jora se bhoom’kakara kheta kee ora bhaaga . halkoo ko aisa maalooma hua ki jaanavarom ka eka jhund’a kheta mem aaya hai. shaayada neelagaayom ka jhund’a tha . unake koodane-daurane kee aavaajem saapha kaana mem a rahee thee . phira aisa maalooma hua ki kheta mem chara raheem haim. unake chabaane kee aavaaja chara-chara sunaaee dene lagee.

usane dila mem kahaa- naheem, jabara ke hote koee jaanavara kheta mem naheem a sakataa. nocha hee d’aale. mujhe bhrama ho raha hai. kahaam’! aba to kuchha naheem sunaaee detaa. mujhe bhee kaisa dhokha huaa!

usane jora se aavaaja lagaayee- jabaraa, jabaraa.

jabara bhoom’kata rahaa. usake paasa na aayaa.

phira kheta ke chare jaane kee aahat’a milee. aba vaha apane ko dhokha na de sakaa. use apanee jagaha se hilana jahara laga raha thaa. kaisa dandaaya hua thaa. isa jaare-paale mem kheta mem jaanaa, jaanavarom ke peechhe daurana asahya jaana paraa. vaha apanee jagaha se na hilaa.

usane jora se aavaaja lagaayee- liho-liho !liho! !

jabara phira bhoom’ka ut’ha . jaanavara kheta chara rahe the . phasala taiyaara hai . kaisee achchhee khetee thee, para ye dusht’a jaanavara usaka sarvanaasha kiye d’aalate haim.

halkoo pakka iraada karake ut’ha aura do-teena kadama chalaa, para ekaaeka hava ka aisa t’hand’aa, chubhane vaalaa, bichchhoo ke d’anka kaa-sa jhonka laga ki vaha phira bujhate hue alaava ke paasa a bait’ha aura raakha ko kuredakara apanee t’hand’ee deha ko garmaane laga .

jabara apana gala phaara d’aalata thaa, neelagaayem kheta ka saphaaya kie d’aalatee theem aura halkoo garma raakha ke paasa shaanta bait’ha hua tha . akarmanyata ne rassiyom kee bhaam’ti use chaarom tarapha se jakara rakha thaa.

usee raakha ke paasa garma jameena para vaha chaadara orha kara so gaya .

sabere jaba usakee neenda khulee, taba chaarom tarapha dhoopa phaila gayee thee aura munnee kaha rahee thee- kya aaja sote hee rahoge ? tuma yahaam’ aakara rama gae aura udhara saara kheta chaupat’a ho gaya .

halkoo ne ut’hakara kahaa- kya too kheta se hokara a rahee hai ?

munnee bolee- haam’, saare kheta ka satyaanaasha ho gaya . bhalaa, aisa bhee koee sota hai. tumhaare yahaam’ maraiya d’aalane se kya hua ?

halkoo ne bahaana kiyaa- maim marate-marate bachaa, tujhe apane kheta kee paree hai. pet’a mem aisa darada hua ki mai hee jaanata hoom’ !

donom phira kheta ke d’aam’ra para aaye . dekhaa, saara kheta raunda para hua hai aura jabara maraiya ke neeche chita let’a hai, maano praana hee na hom .

donom kheta kee dasha dekha rahe the . munnee ke mukha para udaasee chhaayee thee, para halkoo prasanna tha .

munnee ne chintita hokara kahaa- aba majooree karake maalagujaaree bharanee paregee.

halkoo ne prasanna mukha se kahaa- raata ko t’hand’a mem yahaam’ sona to na paregaa.

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