प्रेरक कथा -हीरे की कीमत, Prerak katha – Heere ki keemat

मणिपुर में इंद्रसेन जौहरी का बड़ा नाम था। उसकी एक सुंदर कन्या थी। नाम था नीलम। कई युवक नीलम से विवाह करना चाहते थे, किंतु इंद्रसेन का एक ही जवाब होता, नीलम एक जौहरी की बेटी है, किसी कबाड़ी की नहीं, मैं उसकी शादी उसी से करूंगा, जो मुझसे भी अधिक योग्य और बुद्धिमान हो।’

Prerak Katha - Heere ki keematचित्रसेन नाम का युवक मन ही मन नीलम से प्रेम करता था, किंतु वह एक गरीब युवक था। एक बार हिम्मत करके चित्रसेन से इंद्रसेन के सम्मुख नीलम से विवाह का प्रस्ताव रखा। बस फिर क्या था, इंद्रसेन ने बेइज्जत करके उसे दुकान से बाहर निकाल दिया और हमेशा की तरह कहा, ‘ नीलम एक जौहरी की बेटी है, किसी कबाड़ी की नहीं। उसका विवाह किसी बुद्धिमान से होगा। तुम जैसे किसी मूर्ख से नहीं, जिसे इतनी भी अक्ल नहीं कि झोपड़ी में रहकर महलों के सपने नहीं देखने चाहिए।’ चित्रसेन चुपचाप सिर झुकाए चला गया।

कुछ दिनों पश्चात इंद्रसेन की दुकान पर दो व्यक्ति आए। उनमें से एक के सिर पर शानदार पगड़ी थी, गले में मोतियों की माला व चेहरे पर रोबदार दाढ़ी। उसने अपने आपको रोशनपुर का राजकुमार बताया। उसके साथ उसका सचिव था। उसने कई हीरे देखे, अचानक उसने एक हीरे की ओर देखते हुए उसकी कीमत पूछी।

‘एक लाख रूपये।’ इंद्रसेन ने जवाब दिया। राजकुमार के इशारे पर उसके सचिव ने तुरंत एक लाख रूपये गिन दिए। हीरे को देखते ही राजकुमार ने कहा, ‘अरे, याद आया, बड़ी रानी के लिए भी तो ले जाना है। एक हीरा ऐसा ही और दे दीजिए।’ इंद्रसेन के पास वैसा हीरा नहीं था। राजकुमार ने कहा, ‘यह हीरा हमें बहुत पसंद आया, हमें ऐसा ही एक हीरा और मंगवा दें। मैं ऐसे हीरे के लिए पांच लाख रूपये तक देने को तैयार हूं। सेक्रेटरी, इन्हें पेशगी स्वरूप एक लाख और दे दो।’  यह कहकर राजकुमार चला गया। उसके पीछे एक लाख रूपये देकर सेक्रेटरी भी चला गया।

हीरा तो एक लाख का है, ये राजा लोग बड़े सनकी होते हैं, राजकुमार के जाते ही इंद्रसेन सोचने लगा। यदि ऐसा ही हीरा और कहां से मिल जाए तो उसे पूरे चार लाख का फायदा होगा। उसने अपने आदमियों को हीरे का वजन, रंग, चमक आदि के बारे में बताते हुए कहा, ‘हर बड़े जौहरी की दुकान तलाश कर ऐसा ही हीरा खरीद लो, एक माह के भीतर।’

इंद्रसेन के आदमी निराश होकर लौट आए। उन्होंने कहा, ‘वैसा हीरा कहीं नहीं हैं, सिर्फ कंचनपुर के कृपालसेन के पास है, किंतु वह उसे चार लाख से कम पर बेचने को तैयार नहीं।’

एक लाख के हीरे की कीमत चार लाख रूपये। आश्चर्य से इंद्रसेन सोचने लगा। अगले महीने राजकुमार आएगा और हीरा न पाकर अपने एक लाख रूपये वापस ले जाएगा। और मुमकिन है, पता चलने पर वह कृपालसेन से खरीद ले। यदि वह स्वयं चार लाख रूपये में खरीदता है तो भी उसे एक लाख रूपये का फायदा होगा। यह सोचकर उसने चार लाख रूपये में वह हीरा खरीद लिया।

धीरे-धीरे महीना गुजर गया, किंतु राजकुमार नहीं आया। इंद्रसेन के मन में भय हो गया, यदि राजकुमार नहीं आया तो उसे बड़ा घाटा होगा। दूसरा तीसरा और चौथा महीना भी बीत गया, राजकुमार नहीं आया। इंद्रसेन समझ गया कि अब राजकुमार नहीं आएगा।

कुछ दिनों बाद चित्रसेन इंद्रसेन के पास आया और नीलम से विवाह का प्रस्ताव रखा, इंद्रसेन ने कहा, ‘तुम फिर आ गए, मैं तुम्हारे जैसे मूर्ख के साथ अपनी लड़की का विवाह नहीं कर सकता। वह जौहरी की बेटी है किसी कबाड़ी की नहीं। तुझसे भी चतुर व्यक्ति से उसका विवाह होगा।’

तब चित्रसेन ने कहा, ‘मै आपसे अधिक बुद्धिमान हूं।’ उसने बताया कि उसने ही राजकुमार का वेश धारण कर एक लाख रूपये में हीरा खरीदा था। और वैसे ही दूसरे हीरे के लिए एक लाख पेशगी दिए थे। मैंने पहले ही सारे जौहरियों के यहां इस बात का पता कर लिया था कि जो हीरा आपके पास है, वैसा और कहीं नहीं है। अतः उस हीरे को एक लाख रूपये में खरीद कर वैसा ही हीरा पांच लाख रूपये तक खरीदने को कहा। यही हीरा कृपाल सेन को दिया और कहा कि इसे चार लाख से कम पर मत बेचना, क्योंकि मैं जानता था कि आप एक लाख के लालच में यह हीरा चार लाख में जरूर खरीदेंगे। मैं यह हीरा पांच लाख में निश्चत खरीदूंगा इसका विश्वास दिलाने के लिए एक लाख रूपये आपको पेशगी दिए, ताकि आपको शक न हो। इस प्रकार जिस व्यापार में आप एक लाख का लाभ सोच रहे थे, उसी व्यापार में मुझे दो लाख का लाभ हुआ। इस काम में मेरे मित्र कृपालसेन ने मेरी मदद की।’

इंद्रसेन ने चित्रसेन की इस बुद्धिमत्ता पर मुग्ध होकर नीलम का विवाह बड़ी धूमधाम से उसी से कर दिया। इंद्रसेन ने एक लाख रूपये और वह हीरा भी चित्रसेन को भेंट कर दिया।