प्रेरक कथा – हिंसा भी, अहिंसा भी

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एक राजा था। बहुत ही बुद्धिमान और दूरदर्शी। एक बार उसकी राजधानी में एक साधु आया, अहिंसा का पुजारी, जनता को उसने उपदेश देना शुरू कर दिया, ”हिंसा मत करो, किसी भी जीव जंतु को सताओ मत।“ उसके चेहरे के तेज, गहन गंभीर वाणी और शब्दों में कुछ ऐसा खिंचवा था कि कुछ ही समय में सारा शहर उसका भक्त हो गया। शहर से बाहर उसने एक कुटिया बनाई और दिन रात वह श्रद्धालुओं की अपार भीड़ से घिरा रहने लगा।

राजा ने भी उसे यथेष्ट सम्मान दिया, मगर जब उसने देख कि लोगों ने साधु की संगति प्राप्त करने के लिए अपना काम काज भी छोड़ दिया है तो उसे चिंता हुई। प्रजा ही नहीं, राजा की सारी सेना भी साधु की भक्त होकर अहिंसा का गुणगान करने लगी थी। अब किसी को कुछ काम ने था। सारा शहर दिन रात साधु के उपदेश सुनता रहता। किसानों ने खेती बाड़ी छोड़ दी। व्यापारियों और कारीगरों ने भी अपना उद्योग धंधा समाप्त कर दिया। राज्य की अर्थव्यवस्था अस्त व्यस्त होने लगी।

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ऐसे समय में पड़ोसी देश की लालची निगाहें उस राज्य की ओर उठीं। वहां के लोगों ने इस स्थिति से फायदा उठाना शुरू किया, वे सीमा के अंदर घुसकर लूटपाट करने लगे। किंतु इधर किसी के कान पर जूं भी न रेंगी। सब पर अहिंसा का भूत सवार था। राजा ने जब अपने सैनिकों को घुसपैठियों को मार भगाने का आदेश दिया तो सब एक साथ बोले, ”नहीं, हिंसा करना पापा है।“

राजा का चैन उड़ चुका था। एक तरफ वह था, दूसरी ओर साधु महाराज थे। लोग उसे छोड़कर साधु महाराज की ओर जा चुके थे। एक लंबे विचार विर्मश के बाद उसे एक युक्ति सूझी, उसने अपने कुछ विश्वस्त सेवकों को बुलाया और उन्हें अपनी योजना से अवगत कराया। फिर एक रात अपने उन्हीं सेवकों के साथ मिलक उस योजना को कार्यान्वित करना शुरू कर दिया। उसके निजी चिड़ियाघर में एक शेर था। राजा ने उसे एक कटहरे में बंद करवाया और सेवकों को आदेश दिया, ”इसे साधु महाराज की कुटिया पर ले चलो।“

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कुछ ही देर में वे सब शेर सहित साधु की कुटिया पर मौजूद थे। सबकुछ इस होशियारी से किया गया था कि उन्हें और उस शेर को कोई न देख पाया। सुनसान रात का अंतिम पहर था। साधु महाराज भी कुटिया में सोए हुए थे।

राजा ने जल्द ही दो ऐसे पेड़ों को ढूंढ़ लिया, जिनके तने इतने करीब थे कि उनके बीच सिर्फ जरा सा छेद था। वे पेड़ कुटिया से बहुत दूर भी नहीं थे। राजा ने खुशी और उत्साह से भरकर अपने साथियों से धीरे से कहा, ” शेर को पेड़ों के पास ले जाकर उसकी दुम को इस छेद से गुजार दो।“

ऐसा ही हुआ। जुड़े हुए पेड़ों के उस ओर शेर था और इस ओर उसकी दुम। राजा ने तुरंत उसकी दुम पूरी ताकत से थाम ली।

राजा के अलावा और लोग खाली पिंजरे को लेकर वापस लौट गए। अब वहां सिर्फ शेर था और राजा। शेर ने क्रोध से भरकर दहाड़ लगाई और तेजी से पलटकर राजा को पंजा मारना चाहा। मगर वह ऐसा न कर सका। इसलिए कि उसके और राजा के बीच पेड़ के तनों की दीवार थी और राजा उसकी दुम को पूरी ताकत से खींचे हुए था और चिल्लाता भी जा रहा था, ”बचाओ, शेर…..शेर।“

चीख सुनकर साधु महाराज की आंख खुल गई। बाहर आए और यह दृष्य देखकर स्तब्ध रह गए। राजा ने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, ”महाराज, इस शेर को मार डालिए… जल्दी कीजिए मैंने इसकी पूंछ पकड़ रखी है।“

यह सुनकर साधु को जैसे होश आया अपने कानों पर हाथ रखकर बोला, ”राम, राम मैं तो अहिंसा का पुजारी हूं। शेर की हत्या मैं नहीं कर सकता।“

राजा ने बहुत अनुनय विनय की, साधु महाराज को राजा पर दया तो बहुत आई, किंतु उन्हें अपने सिद्धांत से हटना मंजूर नहीं था।

आखिर राजा ने उसे निवेदन किया, ”साधु महाराज, यदि आप शेर का वध नहीं कर सकते, तो आकर तनिक इसकी पूंछ ही थाम लीजिए। ताकि मैं ही इसे मार डालूं।“

काफी सोच विचार कर साधु ने शेर की दुम थामना स्वीकार कर लिया। साधु के हाथ में दुम थमाकर राजा वहां से हट गया। शेर को मारने के बजाय वह एक जगह जाकर आराम से बैठ गया।

शेर झटके पर झटका दे रहा था। उसकी दुम साधु के हाथों से फिसलती जा रही थी। अब तो वे बुरी तरह बौखलाए, वे जानते थे कि शेर यदि छूट गया तो सीधा उन्हीं पर धावा बोलेगा।

”महाराज, इसे तुरंत मारो।“ वे घबराकर चीखे।

राजा ने लापरवाही से उत्तर दिया, ”साधु महाराज, यह कैसे हो सकता है, आप ही ने तो कहा है कि किसी भी दशा में हिंसा करना पाप है।“

साधु महाराज सिटपिटा कर रह गए। थोड़ी देर बाद दूसरे भक्तगण भी वहां एकत्र होने लगे। अजीब तमाशा था। साधु महाराज की आंखों के सामने मौत नाच रही थी। जब वे शेर को मारने के लिए खूब अनुनय विनय कर चुके तो महाराज ने कहा, ”महाराज, अब तो आपको समझ में आ गया होगा कि अपनी सुरक्षा के लिए किसी जालिम की हत्या करना पाप नहीं होता?“

”हां, खूब समझ गया।“ साधु महाराज जल्दी से बोले और तब राजा ने आगे बढ़कर तलवार के एक ही वार से शेर को परलोक पहुंचा दिया। साधु महाराज को अनुभव हुआ कि उन्हें नया जीवन मिला है। उसी दिन से उन्होंने लोगों को समझाना शुरू कर दिया, ”किसी दुर्बल को मारना हिंसा है। मगर अपनी सुरक्षा के लिए किसी अत्याचारी को मारना हिंसा नहीं है।“

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