मोहम्मद अल्लामा इकबाल 9 नवंबर,1877 को तत्कालीन भारत के सियालकोट में पैदा हुए थे. इक़बाल की मौत के नौ साल बाद बंटवारा हुआ, तब सियालकोट पाकिस्तान का हिस्सा बना.उनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे, लेकिन करीब तीन सौ साल पहले इस्लाम कुबूल कर लिया था और कश्मीर से पंजाब जाकर बस गये थे.

उनके पिता शे़ख नूर मुहम्मद कारोबारी थे. इकबाल की शुरुआती तालीम मदरसे में हुई। बाद में उन्होंने मिशनरी स्कूल से प्राइमरी स्तर की शिक्षा शुरू की. मिर्जा असदुल्लाह खां गालिब के चले जाने के बाद इकबाल की शायरी ने ही लोगों के जहनों पर राज किया है.

उनकी शायरी ऐसी शायरी है, जिसमें हर उम्र को ढूंढा जा सकता है, मस्जिद और शिवालों को ढूंढ़ा देखा जा सकता है. उन्होंने  कुदरत की खूबसूरती को भी अपनी नज्मों में जगह दी.

पहाड़ों, झरनों, नदियों, लहलहाते हुए फूलों की डालियों और जिंदगी के हर उस रंग को अपने कलाम में शामिल किया, जिस से इंसानी जिंदगी का ताल्लुक़ है. इक़बाल की मशहूर  ‘लब पर आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’ का आज भी आकाशवाणी से प्रसारण होता है.

लाला हरदयाल के एक आयोजन मे अल्लामा इक़बाल ने सबसे पहले ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ गीत सुनाया था. उस ज़माने में इसे कई अखबारों और पत्रिकाओं ने ‘हमारा देश’ और ‘हिंदुस्तान हमारा’ शीर्षक से प्रकाशित किया था.

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो मध्यरात्रि के ठीक 12 बजे संसद भवन समारोह में इकबाल का यह तराना सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा भी समूह में गाया गया था.

आजादी की 25 वीं वर्षगांठ पर सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने इसकी धुन (टोन) तैयार की 1950 के दशक में सितारवादक पंडित रविशंकर ने इसे सुर-बद्ध किया.

जब इंदिरा गांधी ने भारत के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, तो शर्मा ने इस गीत की पहली पंक्ति कही थी.