शादी में क्यों होती है सप्तपदी की रस्म?

Shadi (Vivah) mein saptpadi ki rasm kyun hoti hai?

फेरों के बाद सप्तपदी की विधि की जाती है। फेरों की तरह ही हिन्दू धर्म में यह भी एक ऐसी प्रथा है, जिसके बिना विवाह अधूरा माना जाता है। यज्ञकुंड के उत्तर की ओर खड़े होकर वर अपना दाहिना हाथ वधू के कंधे पर रखता है, दोनों का मुंह उत्तर की तरफ होता है। तब कुछ मंत्र बोलकर दूल्हा-दुल्हन सात कदम साथ साथ चलते हैं।
पहले कदम में वर-वधू एक साथ कदम रखते हैं। वर कहता है – अन्न के लिए यह पहला कदम हम एक साथ रखते हैं, तेरा मन मेरे मन के अनुकूल हो। परात्मा तुझे मेरे अनुकूल बनाये, हम दोनों मिलकर संतान की प्राप्ति करें, वे वृद्धावस्था तक जीने वाली हों। दूसरा कदम वर-वधू एक साथ चलते हैं तो वर कहता है, शारीरिक बल के लिए यह दूसरा कदम हम साथ साथ रखते हैं। तेरा मन मेरे मन के अनुकूल हो, परात्मा तुझे मेंरे अनुकूल बनाएं। हम दोनों मिलकर हम दोनों मिलकर संतान की प्राप्ति करें, वे वृद्धावस्था तक जीने वाली हों। तीसरा कदम वर-वधू एक साथ रखते हैं तो वर कहता है, धन के लिए यह तीसरा कदम हम साथ साथ रखते हैं। तेरा मन मेरे मन के अनुकूल हो।
चौथा कदम वर-वधू सुख के लिए एक साथ आगे रखते हैं। ऐसी ही पांचवा कदम प्रजा के लिए, छठा कदम सारी ऋतुएं साथ बिताने के लिए और सांतवा कदम इस भाव के साथ आगे रखते हैं कि हम दोनों अच्छे मित्र रहेंगे। हम दोनों मिलकर संतान को प्राप्त करें, जो वृद्धावस्था तक जीने वाली हों। इस तरह से सात वचन लेकर दूल्हा-दूल्हन सात जन्मों के साथी बन जाते हैं।