कृष्ण जन्माष्टमी पर लघु निबंध Short Essay on Krishan Janmashtmi in Hindi

Krishan Janamashtmi par laghu nibandh

प्रस्तावना- जब संसार में पाप, अत्याचार, द्वेष और घृणा बढ़ जाते हैं, धर्म का नाश होने लगता है, सज्जन और दीन दुखियों को सताया जाने लगता है, तब इस संसार की महान शक्ति अवतार लेती है और धर्म की स्थापना करती है। कृष्ण ने भी इस धरती पर तभी अवतार लिया था जब कंस के अत्याचार बहुत बढ़ गए थे और दीन दुखियों को सताया जाने लगा था।Short Essay on Krishan Janamashtmi

श्रीकृष्ण का जन्म- श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद में कृष्ण अष्टमी को रात के बारह बजे हुआ था। इनके पिता का नाम वासुदेव और माता का नाम देवकी था।

पौराणिक कथा- देवकी कंस की बहन थी। कंस मथुरा का राजा था। वह बहुत अत्याचारी था। जब वह अपनी बहन देवकी को विवाह के बाद उसकी ससुराल रथ पर लेकर जा रहा था तब आकाशवाणी हुई। जिस बहन को तुम इतने प्यार से विदा कर रहे थे, उसकी आठवीं संतान तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगी। यह भविष्यवाणी सुनकर कंस घबरा गया। उसने अपनी बहन को कारावास में बन्द कर दिया। देवकी के सात पुत्र हुए, किन्तु कंस ने उनके पुत्रों को पटक पटक कर मार डाला। आठवें पुत्र का जब जन्म हुआ तब जेल के पहरेदार सब सोए हुए थे। वसुदेव अपने बच्चे को लेकर गोकुल में नंद के घर छोड़ आए और उसकी लड़की को लेकर लौट आए। प्रातः काल होने पर वसुदेव ने इस कन्या को कंस को सौंप दिया। कंस ने जैसे ही उसे पत्थर पर पटका, वह उड़कर आकाश में चली गई। उड़ते उड़ते उसने कहा कि तेरा मारने वाला अभी जीवित है। वह गोकुल पहुँच गया है।

कंस की घबराहट- यह आकाशवाणी सनुकर कंस घबरा गया। उसने कृष्ण को मारने के लिए कई षड्यन्त्र रचे। पूतना, वकासुर आदि अनेक राक्षसों को कृष्ण को मारने के लिए भेजा पर कोई भी श्रीकृष्ण को मार नहीं पाया। श्रीकृष्ण ने सभी की हत्या कर दी।

श्रीकृष्ण की बाल लीला- श्रीकृष्ण ने गोकुल में रहकर अनेक बाल लीलाएँ कीं। वे मित्रों के साथ गोएँ चराने जाते थे। गोकुल के सभी नर नारी उससे प्यार करते थे। वह भी सब की सहायता करने को तैयार रहते थे। गेंद का खेल उन्हें बहुत प्रिय था। उन्होंने कालिम नामक राक्षस को मारकर लोगों को भय मुक्त किया। इन्दु के घमंड को चूर किया। बड़ी बड़ी विपत्तियों से ब्रज को बचाया।

जन्माष्टमी मनाने का ढंग- जन्माष्टमी के त्योहार को मनाने का ढंग सरल और रोचक है। इस त्योहार को मनाने के लिए सभी श्रद्धालु भक्त सवेरे सवेरे अपने घरों की सफाई करके उसे सजाते हैं। कई लोग इस दिन वत भी रखते हैं। वे श्रीकृष्ण की लीला का गान करते हैं और श्रीकृष्ण कीर्तन करते हैं। रात्रि के बारह बजे श्रीकृष्ण का जन्म मनाया जाता है। तभी पूजा तथा आरती कर भक्त जन अपना व्रत तोड़ते हैं।

मन्दिरों के दृश्य- सभी मन्दिरों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी बड़े धूम धाम से मनाई जाती है। श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ कैसे गौएँ चराने जाते थे। गोपियाँ उन्हें कितना प्यार करती थीं। उनकी बाँसुरी की धुन को सुनने के लिए वे सारा काम काज छोड़कर भाग खड़ी होती थीं। इस प्रकार की क्रियाओं की झाँकियाँ इस दिन प्राय सभी मन्दिरों में दिखाई जाती हैं। मथुरा वृन्दावन तथा ब्रज के अन्य नगरों और गाँवों में यह त्योहार बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

लोक रक्षक श्रीकृष्ण- श्रीकृष्ण ने लोक रक्षा के बहुत कार्य किए। इससे वे जनता में बहुत लोकप्रिय हो गए। उन्होंने समाज में छोटे समझे जाने वाले ग्वालों को अपना मित्र बनाया। उन्हीं के साथ ही उन्होंने अपना जीवन बिताया। उन्होंने लोगों को गोओं का महत्व बताया। उनकी रक्षा और पालन के लिए उन्होंने जनता को उत्साहित किया। इससे खेती की उन्नति हुई। गोपालन से लोगों के स्वास्थ्य में भी काफी सुधार हुआ।

उपसंहार- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व से हमें यह संदेह मिलता है कि पाप का नाश अवश्यमेव होता है। जब जब संसार में कष्ट बढ़ते हैं, पाप, अनाचार और भ्रष्टाचार बढ़ता है उसे समाप्त करने के लिए कोई न कोई महान शक्ति भी अवश्य जन्म लेती है। इसलिए मनुष्य को सदा सत्कर्म में लगे रहना चाहिए।