Raksha Bandhan par laghu nibandh

रक्षा बंधन का त्योहार भारतीय त्योहारों में बहुत प्राचीन है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई उसे हर हालत में रक्षा करने का वचन देता है। रक्षा बंधन भाई बहन के पावन प्रेम का पवित्र पर्व है।Short Essay on Raksha Bandhan
विष्णु पुराण में कथा- विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन का अवतार लिया था। उन्होंने एक प्रसिद्ध अभिमानी राजा बलि से केवल तीन पग धरती दान में माँगी थी। राजा बलि ने तीन पग धरती देना स्वीकार कर लिया। भगवान विष्णु ने तीन पगों में सारी पृथ्वी को नाप लिया और राजा बलि को पाताल में भेज दिया इस कथा की स्मृति में आज भी ब्राहमण यजमानों से दान लेते हैं औ उनको रक्षा सूत्र बांधते हैं।
रक्षाबंधन और इतिहास- रक्षाबंधन पर्व का ऐतिहासिक महत्व भी है। मध्य काल में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया था। चित्तौड़ की महारानी कर्मवती उस समय असहाय सी पड़ गई। उसे अपनी और अपने राज्य की सुरक्षा का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। तब उसने इस आपत्ति से अपनी रक्षा करने के लिए हुमायूँ के पास रक्षाबंधन का सूत्र भेजा और उससे अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की। हुमायूँ इससे बहुत प्रभावित हुआ। उसने राखी के सूत्र का सम्मान किया और वह कर्मवती की रक्षा के लिए बहुत बड़ी सेना लेकर चित्तौड़ पहुँच गया।
श्रवण कुमार से सम्बन्ध- श्रवण कुमार से भी इस त्योहार का सम्बन्ध जोड़ा जाता है। श्रवण अपने माता पिता को तीर्थयात्रा कराता हुआ इसी दिन अयोध्या पहुँचा था। जब वह सरयू नदी में पानी का घड़ा भर रहा था तब राजा दशरथ ने उस पर जंगली हाथी समझ कर बाण चला दिया था। इससे श्रवण की मृत्यु हो गई थी। जब राजा दशरथ को यह पता चला कि उसके माता पित अन्धे हैं और वह अपने माता पिता की प्यास को बुझाने के लिए नदी में पानी लेने आया था तो इससे राजा दशरथ को अपनी भूल पर बहुत दुख हुआ था।
राजा दशरथ पानी लेकर श्रवण के माता पिता के पास गए और उन्होंने उन्हें सारा प्रसंग कह सुनाया। इस पर उसके माता पिता ने दशरथ को शाप दिया जिस प्रकार हम अपने पुत्र के शोक में मर रहे हैं, उसी तरह तुम भी अपने पुत्र के शोक में मरोगे। यह कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
उपसंहार- इस प्रकार यह त्योहार प्राचीन काल से समस्त भारत में बहुत खुशी और स्नेहपूर्वक प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह पर्व केवल हिन्दुओं तक ही सीमित नहीं है। इसे अन्य जातियों के लोग भी श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मनाते हैं। हमें भी इस पर्व के भलीभांति और पर्व की पवित्र भावना को ध्यान में रखते हुए मनाना चाहिए। यह पर्व भाई बहन के पावन प्रेम का अमर स्रोत है। इस भावना का सदा सम्मान करना चाहिए।

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