स्त्री की सीमा रेखायें – कनक सिंह (कनु)

स्त्री की सीमा रेखायें

kanak singhनदी के तट पर जमी रेत मिट्टी की तरह
कितना कुछ दे जाती हो
उपजाऊ सा
स्री
और बढ़ जाती हो
अपनी रौ में आने वाली पीढ़ियों को
आशायें देने
कितना कुछ सहती हो इस सफ़र में
नदी की धाराओं की तरह
अपने शरीर से अलग करती हो
एक और शरीर
और भर देती हो उसकी जड़ों में उपजाऊ मिट्टी
स्री
आहत होती हो तो करती हो क्रन्दन
उफ़न जाती हो नदी की तरह
कर जाती हो अनाथ , निराश्रित , विपन्न
पीढ़ियों को
दे जाती हो सबक

शान्त अविरल बहने वाली स्त्री
की सीमा रेखायें तय होती हैं———

~ कनक सिंह (कनु)

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