जग घूमया सुलतान जैसा न कोई
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पचास का होने के बावजूद सलमान का आभामंडल जरा भी कम नहीं हुआ है. रेसलर सुलतान में जितना दम ख़म है, अभिनेता सलमान दम ख़म में उससे जरा भी कम नहीं.

उनके चाहने वाले फुल एंटरटेन्मेंट की उम्मीद में जाते हैं और खूब खुश होकर लौटते हैं. इस बार तो इत्तेफाक से कहानी भी अच्छी है.

यह एक रेसलर की ज़िन्दगी से लव स्टोरी है. सुलतान एक बहुत उत्साही युवक है, उसका दिल आरिफा पर आ जाता है, बाद में पता लगता है आरिफा स्टेट लेवल रेसलिंग चैम्पियन है. आरिफा सुल्तान का प्रेम यह कहकर नहीं स्वीकार करती कि आखिर उसके सामने सुलतान है ही क्या ! तब सुलतान खुद भी रेसलर बनना तय करता है. और दोनों कामनवेल्थ जीतते हैं , शादी करते हैं. फिर आरिफा प्रेग्नेंट, उनका ओलम्पिक का सपना धराशाई, सुलतान आगे बढ़ते हैं, वर्ल्ड चैम्पियन बनते हैं, लेकिन अब आरिफा का साथ छूट जाता है. पूरी कहानी बताकर मैं फिल्म का चार्म कम नहीं करना चाहती. लेकिन यह ज़रूर कहूँगी कि यह फिल्म देखेंगे तो अफ़सोस नहीं होगा.

आरिफा यानी अनुष्का भी दमदार रोल में हैं. एक बात जिसे कुछ समीक्षकों ने नोटिस किया कि सुलतान रेसलिंग जारी रखता है पर आरिफा को रेसलिंग छोडनी पड़ती है. आखिर हर बार प्रेम में स्त्री को ही क्यों पीछे छूटना पड़ता है. इस एंगल से मैं सहमत नहीं. बल्कि मुझे तो यह पसंद आया कि आरिफा को कोई मजबूर नहीं करता कि वह रेसलिंग छोड़े, लेकिन उसमे फैसले को लेकर सुलतान जैसे जूनून की कमी दीखती है.

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कैसे कोई व्यक्ति अपनी स्वाभाविक मानवीय कमजोरियों से उबरता है, कैसे फीनिक्स की तरह बार बार खड़ा होता है, जिजीविषा क्या होती है, जूनून क्या होता है यह सब इस फिल्म में खूब मिलेगा. हो सकता है फिल्म को देखते हुए आप सुलतान की ताकत को अपने भीतर महसूस करें, हो सकता है आप के भीतर भी हार कर जीतने का जज्बा पैदा हो जाए.

सलमान को भारी एक्सरसाइज़ करते देखना बड़ा भला लगता है, फाइटिंग के दृश्य बहुत रोमांचक हैं, और सलमान पर बहुत सहज लगते हैं. सलमान ने पूरी फिल्म में बहुत ज़बरदस्त मेहनत की है. आप कुछ न करें केवल इस फिल्म में सलमान के सीन्स को कॉपी ही कर लें तो आप सुलतान हो जायेंगे.

रणदीप हुड्डा का होना भी बहुत दिलचस्प है, फिल्म जैसे दोगुनी स्पीड से चल पड़ती है. फिल्म में चिली के मार्शल आर्ट प्रोफेशनल Marko Zaror हैं. फाइटिंग उस्ताद Ron Smoorenburg हैं. ऐसे कलाकारों के कारण फिल्म बहुत विश्वसनीय बन पड़ी है. थोड़ी बहुत कमियाँ भी हैं, पर कमर्शियल फिल्म में उनको नजरंदाज करना ही बेहतर है.

आदमी तब हारता है जब वह खुद गिव अप कर देता है. जो हार कर जीतता है वही सुलतान है. फिल्म में सलमान को एक्टिंग करते देखना सुखद लगता है. फिल्म का दूसरा हिस्सा पहले से बहुत ज्यादा प्रभावी है. शोर है, लाउडनेस है, पर यही सलमान की पहचान है. दबंग टाइप. गाने भी खूब मगन करने वाले हैं.

कुल मिलाकर हलके मूड में जाइये और खूब खुश होकर लौटिये.

(सुलतान फिल्म समीक्षा – संध्या नवोदिता )

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संध्या जी हिन्दी की ख्याति प्राप्त कवियित्री एवं लेखिका हैं और समसामयिक विषयों पर अपनी राय बेबाकी से व्यक्त करने के लिए जानी जाती हैं।  उनके फेसबुक पेज के लिए यहाँ से जाएँ – https://www.facebook.com/sandhya.navodita

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