राम नाम वाली अंगूठी एक इशारा था, टीपू सुल्तान के लिए सुधरने का

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टीपू सुलतान को लेकर काफी विवाद हो रहा हैं ,चाहे वो मंदिर तोड़ने को लेकर हो या धर्मान्तरण की बात हो या फिर वो अंगूठी जिसको लेकर के चर्चाए हो रही हैं .

कहा जाता है कि टीपू सुल्तान के पास, राम नाम वाली ,एक अंगूठी थी, जिसे वह पहने थे.

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41 ग्राम खालिस सोने से बनी ये अंगूठी उनके लिए बेहद खास थी,और वह हमेशा इसे पहने रहते थेआखिर क्या हैं राम नाम वाली अंगूठी का सच यह रिंग कहां से आई थी टीपू सुल्तान के पास, यह ‘राम’ नाम वाली अंगूठी ,पर गुलाब की सजावट के साथ बहुत ही साधारण सी अंगूठी थी.

और हिंदू देवता राम के नाम की आकृति उकेरी हुई थी।इसलिए अगर टीपू सुल्तान अपने कई सफल युद्धों मे से यह अंगूठी युद्ध मे लूटता, तो कोई कारण नहीं था ,कि वह इसे अपने व्यक्तिगत राजकोष में नहीं रखता.

पहले राजाओ द्वारा युद्ध मे विजय होने पर, युद्धों मे लूटे सभी आभूषणों को जमा कर दिया जाता था, जिसे ‘टोशखाना’ या महल का खजाना कहा जाता था .

अंगूठी के रहस्य के खुलासे के लिए बात करते हैं, मैसूर के दक्षिणी सिरे श्रृंगेरी की, श्रृंगेरी मे 1200 सालों पहले  प्रथम शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी मठ था .

प्रथम शंकराचार्य अपनी अवधारणा के प्रचार के लिए केरल से यहां आए थे,अपने भक्तों की वंशियों और राजवंशों की रेखाओं पर आध्यात्मिक रूप से शासन किया करते थे यानि वो एक ज्योतिषाचार्य थे .चूँकि टीपू का ज्योतिष पर बेहद विश्वास था.

और वो अपनी विजय और प्रजा की ख़ुशी के साथ साथ अपनी लम्बी उम्र के लिए पूजा अर्चना करवाया करते थे ,साथ ही मंदिरो के लिए दान पुण्य का कार्य भी किया करते थे .

10 साल से अधिक समय तक टीपू शंकराचार्य के साथ लगातार संपर्क में बने रहे थे , और 1798 में दिए गए आखिरी रिकॉर्ड पत्र के अनुसार,

स्वामी ने टीपू को दुश्मनों के विनाश के लिए और सरकार की समृद्धि के लिए भगवान की तीन बार पूजा के साथ साथ चांडी हवन को करने की सलाह भी दी थी.

श्रृंगेरी शंकराचार्य एकमात्र हिंदू नहीं थे, जिन्हे टीपू का संरक्षण प्राप्त था,लेकिन वह निश्चित रूप से टीपू की सबसे महत्वपूर्ण हिंदू आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे.

अंगूठी के विषय में टिपू का 15 नवंबर, 1793 के शंकराचार्य के लिए टीपू द्वारा लिखित एक पत्र का वर्णन मिलता हैं , जिसमें वह अपने गुरु को अपना सलाम प्रस्तुत करता है.

और गुरु को भेजे गए उपहार मे एक गहने, एक सिरेचा, कलगी (पगड़ी गहने दोनों) और एक शाल की जोड़ी के उपहार का ज़िक्र मिलता हैं , उपहारों का आदान-प्रदान सिर्फ टीपू सुल्तान से गुरु तक ही नहीं था बल्कि दूसरे के साथ भी था .

हालांकि श्रृंगेरी के शंकराचार्य का टीपू पर बहुत ही प्रभाव था ,वह उनकी दी हुए हर सलाह को मानता था ,इधर आये दिन टीपू का अत्याचार भी बढ़ रहा था.

यही बातो से आशंकित होकर टीपू के गुरु ने राम नाम वाली अंगूठी एक उपहार स्वरुप सुल्तान को दिया होगा, और अपने प्रिय संपत्ति के बीच से यह एक शुभ भेट के रूप में दिया होगा.

यह राम नाम वाली अंगूठी एक इशारा था टीपू सुल्तान के लिए सुधारने का,जैसे की भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम’ भी कहा जाता है

‘मर्यादा का अर्थ ‘नैतिक व्यवहार का प्रतीक’ और पुरुषोत्तम का अर्थ होता है ‘उत्तम या सर्वश्रेष्ठ ‘ राम एक भगवान थे ,और टीपू सुल्तान एक आदमी था.

श्रृंगेरी शंकराचार्य ने टीपू को यह अंगूठी भेट स्वरुप भेज दिया था, शायद वह टीपू को एक इशारा था की भगवान्  राम के आदर्शो पर चलकर वह भी एक आदर्श राजा बने यही कामना करना चाहते थे शंकराचार्य.

क्यों की उन दिनों टीपू अपने सुल्तान बनते ही मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया था, और काफी तादाद मे धर्मान्तरण करवा दिया था लोगो का.

शंकराचार्य टीपू के अंत को भाप चुके थे, वह उन्हे बचाना चाहत थे, अपने बुरे कर्मो से.

आखिर शंकराचार्य की आशंका सही साबित हुए, टीपू ने एक युद्ध लड़ते हुए अपने साहस का परिचय देते हुए अपनी जान गवा दी.

माना जाता है कि उनकी मौत के बाद एक अंग्रेज अफसर ने उनकी लाश से यह अंगूठी चोरी कर ली थी.

 

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