nehru jiआजकल एक नया ट्रेंड चला है इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करने का, या यूँ कहें कि नए सिरे से लिखने का।  हर तरफ ऐसे आर्टिकल्स की बाढ़ आई हुई है जो गांधी और नेहरू के व्यक्तित्व से लेकर उनकी नीतियों, राजनीतिक जीवन और उनके द्वारा चलाये गए सामाजिक आन्दोलनों की आलोचना करने में जुटे हैं।  इनमें से कुछ के पीछे दिए गए तर्क काफी वजनदार भी नजर आते हैं!

बहरहाल इन सभी लेखों और रिपोर्टों से इतना तो हुआ है कि एक बहुत बड़े वर्ग को भारत के इतिहास को पढने समझने का एक मौका मिला है।  इन्हीं लेखों की कड़ी में आपने इंटरनेट पर शायद पढ़ा होगा कि प्रधान मंत्री रहते हुए नेहरू ने भारत को युनाइटेड नेशन्स (UN) में मिल रही स्थाई सदस्यता (permanent membership) का प्रस्ताव ठुकरा दिया था और इसके लिए उन्होंने भारत (India) के बजाए चीन (China) को स्थाई सदस्यता दिए जाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था! आइये देखते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है !

प्रचलित अख़बार ‘द हिंदू’ लिखता है – 28 सितंबर 1955 को दिए गये अपने भाषण में नेहरू ने यह स्पष्ट किया कि भारत को कभी भी औपचारिक या अनौपचारिक रूप से युनाइटेड नेशन्स की स्थाई सदस्यता देने का आमंत्रण नही मिला है।  लोकसभा में J. N Parekh द्वारा पूछे गये सवाल के जवाब में पंडित जी ने यह स्पष्ट किया था। (प्रमाण-Nehru on UN seat | The Hindu)

तब नेहरू ने कहा था- “युनाइटेड नेशन्स के सिक्युरिटी काउन्सिल की सदस्यता UN चार्टर के अनुसार तय होती है, उस चार्टर में बदलाव किए बिना किसी भी देश को स्थाई सदस्यता नही दी जा सकती है।  फिर भारत को स्थाई सदस्यता मिलने का सवाल ही पैदा नही होता!  हालाँकि हमारी नीति हर उस देश को युनाइटेड नेशन्स की स्थाई सदस्यता देने का समर्थन करती है जो इसके योग्य है!”

पर क्या नेहरू के स्पष्टीकरण पर विश्वास किया सकता है? 

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अमेरिकी अख़बार वॉशिंग्टन पोस्ट (लिंक) में एक लेख में यह कहा गया है कि अमेरिका ने भारत को 1955 में स्थाई सीट के लिए युनाइटेड नेशन्स में प्रस्ताव दिया था पर ये बात सोचने वाली है कि क्या सिर्फ़ अमेरिका के समर्थन कर देने भर से भारत को स्थाई सदस्यता मिल जाती?

गौर देने वाली बात है कि प्रचलित लेखक  S. Gopal द्वारा लिखित किताब Javaharlal Nehru  के अध्याय  2, पृष्ठ 248 पर लिखा है – “He (Jawaharlal Nehru) rejected the Soviet offer to propose India as the sixth permanent member of the Security Council and insisted that priority be given to China’s admission to the United Nations” (यहाँ नेहरू पर आरोप है कि सोवियत रूस द्वारा भारत को UNSC की छठी सीट देने की पेशकश की गयी थी जिसे नेहरू ने ठुकरा दिया था )

लेकिन IIT मुंबई के प्रोफ़ेसर मकरंद सहस्रबुद्धे के अनुसार जब तक आप नेहरू को झूठा घोषित नहीं कर देते, आपको यह मानना होगा कि भारत को स्थायी सदस्यता की पेशकश नहीं की गयी थी।  यह बस एक मिथ्या अफवाह मात्र है जो उस समय भी चर्चा में थी जब नेहरू प्रधान मंत्री थे।  तब उस समय नेहरू ने स्वयं इस बात का खंडन किया था।  

नेहरू सही थे या गलत?

चलिए थोड़ी देर के लिए यह मान भी लेते हैं कि नेहरू को स्थाई सदस्यता की पेशकश की गयी थी और उन्होंने UNSC की स्थायी सदस्यता ठुकरा दी थी तो इस पूरे घटनाक्रम के वास्तविक उदेश्य और परिणाम क्या हो सकते थे?

UNSC की स्थाई सदस्यता ठुकराने के परिणाम 

  • भारत रूस संबंधो में मजबूती
  • भारत की पंचशील समझौते में निष्ठा उजागर होती
  • अमेरिका को यह इशारा मिला कि भारत अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाले सहयोग से खुश नही है
  • उसके छठी सीट के लिए जगह
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UNSC की स्थाई सदस्यता स्वीकार करने के परिणाम 

  • रूस और चीन से संबंधों में खटास
  • भारत अमेरिका का पिछलग्गू बन जाता जो हमारी तत्कालीन तटस्थता की नीति के खिलाफ था
  • भारत को वैसे भी सदस्यता नही मिलती क्यूकि रूस इस प्रस्ताव के खिलाफ वीटो करता

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के फेर में उस समय फँसना भारत के लिए घातक हो सकता था .  और वैसे भी भारत अभी अभी आज़ाद हुआ था और इतना सशक्त भी नही था कि  UNSC का स्थाई सदस्य बन पाए।

पर चीन तो 1945 से ही UNSC का स्थाई सदस्य था..

कुछ लोगो का मानना है कि चीन तो 1945 से ही UNSC का स्थाई सदस्य था और ये घटना 1955 के आस पास की है फिर अमेरिका या अन्य देशों द्वारा चीन और भारत में से किसी एक का चुनाव करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है?

ये जानना ज़रूरी है कि जिस चीन को स्थाई सदस्यता 1945 से ही मिली हुई है उसे रिपब्लिक ऑफ चीन कहा जाता था (जो अब ताइवान है) जबकि समाजवादी क्रांति के बाद पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन हुआ जिसकी स्थाई सदस्यता देने के समय भारत का नाम भी आगे आया था।

तो आख़िर क्या है सच्चाई

तथ्यो को गौर से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका ने UNSC (United Nations Security Council) की स्थाई सदस्यता भारत को देने की पेशकश तो की थी पर यह महज एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चाल मात्र थी। हालाँकि भारत को स्थाई सदस्यता मिलने की कोई संभावना नहीं थी पर नेहरू पर ये आरोप तो लगेगा ही कि उन्होने एक अदूरदर्शी कदम उठाया और भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती देने वाला एक बहुमूल्य अवसर गँवा दिया।

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एक और बात उभर कर सामने आती है और वो ये कि भारत ने उस समय चीन और रूस से दुश्मनी ना मोल ले कर अपने बजट का बड़े हिस्से का प्रयोग युद्ध एवं हथियारों के बजाए भारतवासियों की शिक्षा, इंफ़्रास्ट्रक्चर एवं मूलभूत समस्याओं से निपटने में किया और शायद उसी सूझबूझ की वजह से आज भारत उन राष्ट्रों के मुकाबले कहीं अधिक विकसित और प्रगतिशील है जिन्हें भारत के साथ ही आजादी मिली थी।

भारत और पाकिस्तान एक ही समय पर आज़ाद हुए! भारत ने तटस्थता की नीति अपनाई पर पाकिस्तान अमेरिका का पिछलग्गू देश बन कर रह गया! आज नेहरू की उन्हीं विकासोन्मुख नीतियों की बदौलत भारत पाकिस्तान को हर मोर्चे पर मात देता नजर आता है। 

हाँ, ये बात दीगर है कि नेहरू के शांति और पंचशील के सिद्धांतों पर चल कर चीन पर भरोसा करना भारत के लिए अंतत: भारी पड़ा। 1962 के चीनी आक्रमण ने नेहरू को एक सदमा और भारत को महत्वपूर्ण सामरिक और विदेशनीति का सबक दिया। लेकिन यह उसी सदमे और 1962 की हार से मिले सबक का फल था कि 1965 में हमने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।

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Title- Is it true that Jawahar Lal Nehru Rejected United Nations security council permanent seat for India?

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