उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास की बात की जाये तो यूपी के जातिगत समीकरणों की बात सबसे पहले होती है. विधान सभा में किस जाति के कितने विधायक हैं, इस आधार पर ही राजनीतिक पार्टियों की सामाजिक-राजनीतिक आधार को मापा जाता रहा है. विशेषकर क्षेत्रीय पार्टियों – समाजवादी पार्टी, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल – ने तो अपनी जाति विशेष के राजनीतिक उत्थान पर ही अपनी राजनीतिक पटकथाएं लिखीं हैं. लेकिन समय के साथ इन क्षेत्रीय दलों की इस जातिगत पहचान में बदलाव आया है और उन्होंने अपने भीतर अन्य वर्गों को भी प्रतिनिधित्व दिया है. जैसे बसपा आज दलितों की ही नहीं , ब्राह्मणों की भी प्रमुख पार्टी है, समाजवादी पार्टी में यादवों के आलावा अन्य पिछड़े वर्ग और विशेषकर मुसलमानों का जोर बढ़ा है. राष्ट्रीय लोकदल तो खैर, पहले से ही जाट-अहीर-गुज्जर-राजपूत गठजोड़ के लिए जाना जाता रहा है.

uttar pradesh vidhansabha mla farmer becoming businessmanलेकिन हाल के वर्षों में बहुत कुछ बदला है. अगर राजनीतिक दलों के विधायकों की हालिया आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो नयी तस्वीर उभर कर आती है. पिछले बीस सालों में बड़ी तेजी से विधानसभा में ऐसे विधायकों का प्रतिशत बढ़ा है जिन्होंने खुद को बिजनेसमैन घोषित किया है और यह स्थिति कमोबेश सभी राजनीतिक दलों की है.

यह एक बड़ा बदलाव है क्योंकि अतीत में अधिकाँश विधायक अपने आप को या तो किसान या फिर वकील घोषित किया करते थे. सन 1960 तक खुद को किसान बताने वाले विधायकों की संख्या 40% से अधिक थी जो अस्सी के दशक में 60% तक पहुँच गयी. वह उत्तरप्रदेश में किसान राजनीति का दौर था जब महेंद्र सिंह टिकैत आदि किसानों को एकजुट कर रहे थे. उसके बाद से बड़ी तेजी से विधान सभा में किसान विधायकों की संख्या का ग्राफ गिरा और सन 2012 तक यह आधा होकर सिर्फ 28% रह गया.

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आज विधानसभा में ऐसे विधायकों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है जो खुद को बिजनेसमैन बताते हैं.

सन 1980 में मात्र 7-8 % विधायक बिजिनेस पृष्ठभूमि से थे जो अगले दशक में दुगना और सन 2012 आते आते 33% हो गया. यदि इस कटेगरी में बिल्डर्स, प्रोपर्टी डीलर्स और ठेकेदारों आदि को भी शामिल किया जाये तो विधानसभा में बिजनेसमैन विधायकों का प्रतिशत लगभग 47% हो जाता है यानी आज आधे के करीब विधायक किसी न किसी रूप में व्यापारी हैं.

अलग अलग पार्टियों में बिजनेसमैन और किसान विधायकों की संख्या अलग अलग है. लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाले आंकड़े बसपा के हैं जिसमें 66% यानी दो-तिहाई विधायक बिजनेसमैन वर्ग से हैं. वहीँ बसपा में सबसे कम % किसानों का है जो सिर्फ 15% हैं. राष्ट्रीय दलों, भाजपा और कांग्रेस में सबसे ज्यादा प्रतिशत स्वघोषित सामाजिक कार्यकर्त्ता और वकीलों आदि का है.

एक और आश्चर्यजनक आंकड़ा जो सामने आता है वह है विभिन्न जातियों में बिजनेसमैन विधायकों का. सबसे अधिक बिजनेसमैन विधायकों के संख्या जाट विधायकों की है (60%), ओबीसी (यादव आदि) में 53% मुस्लिम्स 51%, अगड़ी जातियों में 48% और पिछड़ी जाति (एससी) में 36%.

विधायकों में बिजनेसमैन की बढ़ती संख्या का स्पष्ट कारण राजनीति में चुनाव लड़ने की बढ़ती लागत है. चुनावी प्रत्याशियों को अपने कैंपेन, पार्टी फंडिंग और रैली आदि पर तगड़ा खर्च करना पड़ता है. कुछ पार्टियों पर तो अपने टिकट नीलाम करने का भी आरोप लगता रहा है. जाहिर है बिजनेसमैन ऐसे में सभी पार्टियों की प्रत्याशियों के तौर पर पहली पसंद बनते जा रहे हैं.

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इतना ही नहीं, राजनीति में पैसे की बढ़ती अहमियत भी चुने गए विधायकों को विभिन्न बिजनेस एक्टिविटीज में शामिल होने के लिए प्रेरित करती है. नतीजतन विधायकों की प्रोफाइल किसान आदि से बिजनेसमैन में बदलती जा रही हैं. सन 2007 से 2012 के बीच ऐसे 95 विधायक जो दुबारा चुन कर आये उनमें से 41 विधायकों ने अपना अपना व्यवसाय खेती, शिक्षण आदि से बदल कर बिजनेसमैन कर लिया. 2007 में जिन 36 विधायकों ने अपना व्यवसाय खेती दिखाया था, उन्होंने सन 2012 में इस बदल कर बिजनेस कर लिया.

यानी चुनाव जीतने के बाद अधिकाँश विधायकों ने अपने कार्यकाल के दौरान ही बिजनेस शुरू कर लिया और बिजनेसमैन बन गए. इस नजरिये से देखें तो पैसे कमाना राजनीति में बने रहने की बड़ी आवश्यकता बन गयी है.

इनमें से अधिकाँश बिजनेसमैन विधायक ठेकेदारी, प्रापर्टी डीलर, ट्रांसपोर्ट, ईंट भट्टा, शराब और रेत खनन के व्यवसाय में संलिप्त हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि इन सभी कामों में सत्ता में होना बहुत ही लाभ का सौदा है. इतना ही नहीं, बहुत हद तक इन बिजनेस एक्टिविटीज में अपराध का साया भी होता है जिसमें खुद विधायक होना एक बड़ी सहूलियत है. सत्ता में होने से ना केवल प्रोटेक्शन मिलता है वहीं कंपीटिशन पर काबू पाने में भी मदद मिलती है, समाज में रुतबा बढ़ता है सो अलग.

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इस रिपोर्ट से मुख्य बात जो खुल कर सामने आ रही है वह है राजनीति में पैसे का बढ़ता प्रभाव और इस कारण काले धन को खपाने की बढ़ती जरुरत और गुंजाइश. ऐसे हालात में चुनावों में पैसे के खर्च को लेकर तुरंत कुछ वैधानिक सुधारों की आवश्यकता है.

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