Adam Gondavi – Main Chamaron ki Gali tak le chalunga aapko

Advertisement

अदम गोंडवी मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

main chamaron ki gali tak

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

Advertisement

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने –
“जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने”

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर “माल वो चोरी का तूने क्या किया”

“कैसी चोरी, माल कैसा” उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर –

“मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो”

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

“कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं”

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, “इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, “साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें”

बोला थानेदार, “मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है”

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
“कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल”

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!

Adam Gondavi – Main Chamaron ki Gali tak le chalunga aapko

aaiye mahasoos karie zindagi ke tap ko
main chamaron ki gali tak le chalunga aapko

jis gali mein bhukhamari ki yatana se oob kar
mar gai phuliya bichari ek kuem mein doob kar

hai sadhi sir par binauli kandiyon ki tokari
a rahi hai samane se harakhua ki chhokari

chal rahi hai chhand ke ayam ko deti disha
main ise kahata hoon sarajoopar ki monalisa

kaisi yah bhayabhit hai hirani-si ghabarai hui
lag rahi jaise kali bela ki kumhalai hui

kal ko yah vachal thi par aj kaisi maun hai
janate ho isaki khamoshi ka karan kaun hai

the yahi savan ke din harakhoo gaya tha hat ko
so rahi boorhi osare mein bichhae khat ko

doobati sooraj ki kirane khelati thin ret se
ghas ka gatthar lie vah a rahi thi khet se

a rahi thi vah chali khoi hui jajbat mein
kya pata usako ki koi bheriya hai ghat mein

honi se bekhabar krishna bekhabar rahon mein thi
mor par ghoomi to dekha ajanabi bahon mein thi

chikh nikali bhi to hothon mein hi ghut kar rah gai
chhatapatai pahale phir dhili pari phir dhah gai

din to sarajoo ke kachharon mein tha kab ka dhal gaya
vasana ki ag mein kaumary usaka jal gaya

aur us din ye haveli hams rahi thi mauj mein
hosh mein ai to krishna thi pita ki god mein

jur gai thi bhir jisamein jor tha sailab tha
jo bhi tha apani sunane ke lie betab tha

barh ke mangal ne kaha kaka too kaise maun hai
poochh to beti se akhir vo darinda kaun hai

koi ho sangharsh se ham pamv morenge nahim
kachcha kha jaemge zinda unako chhodenge nahim

kaise ho sakata hai honi kah ke ham tala karem
aur ye dushman bahoo-beti se mumh kala karem

bola krishna se bahan so ja mere anurodh se
bach nahin sakata hai vo papi mere pratishodh se

par gai isaki bhanak thi thakuron ke kan mein
ve ikatthe ho gae the sarachamp ke dalan mein

drishti jisaki hai jami bhale ki lambi nok para
dekhie sukharaj sing bole hain khaini thonk kara

kya kahem sarapanch bhai kya zamana a gaya
kal talak jo pamv ke niche tha rutaba pa gaya

kahati hai sarakar ki apas milajul kar raho
suar ke bachchon ko ab kori nahin harijan kaho

dekhie na yah jo krishna hai chamaro ke yaham
par gaya hai sip ka moti gamvaron ke yaham

jaise barasati nadi alhar nashe mein choor hai
hath n putthe pe rakhane deti hai magaroor hai

bhejata bhi hai nahin sasural isako harakhua
phir koi bamhon mein isako bhinch le to kya hua

aj sarajoo par apane shyam se takara gai
jane-anajane vo lajjat zindagi ki pa gai

vo to mangal dekhata tha bat age barh gai
varana vah maradood in baton ko kahane se rahi

janate hain ap mangal ek hi maqqar hai
harakhoo usaki shah pe thane jane ko taiyar hai

kal subah garadan agar napati hai bete-bap ki
gamv ki galiyon mein kya izzat rahegi apaki

bat ka lahaja tha aisa tav sabako a gaya
hath moomchhon par gae mahaul bhi sanna gaya tha

kshanik avesh jisamein har yuva taimoor tha
ham, magar honi ko to kuchh aur hi manjoor tha

rat jo aya n ab toofan vah pur zor tha
bhor hote hi vaham ka drishy bilakul aur tha

sir pe topi bent ki lathi sambhale hath mein
ek darjan the sipahi thakuron ke sath mein

gherakar basti kaha halake ke thanedar ne –
“jisaka mangal nam ho vah vyakti ae samane”

nikala mangal jhopari ka palla thora kholakara
ek sipahi ne tabhi lathi chalai daur kara

gir para mangal to matha boot se takara gaya
sun para phir “mal vo chori ka toone kya kiya”

“kaisi chori, mal kaisa” usane jaise hi kaha
ek lathi phir pari bas hosh phir jata raha

hosh khokar vah para tha jhopari ke dvar para
thakuron se phir daroga ne kaha lalakar kar –

“mera mumh kya dekhate ho ! isake mumh mein thook do
ag lao aur isaki jhopari bhi phoomk do”

aur phir pratishodh ki andhi vaham chalane lagi
besahara nirbalon ki jhopari jalane lagi

dudhamumha bachcha v buddha jo vaham khere mein tha
vah abhaga din himsak bhir ke ghere mein tha

ghar ko jalate dekhakar ve hosh ko khone lage
kuchh to man hi man magar kuchh jor se rone lage

“kah do in kutton ke pillon se ki itaraem nahim
hukm jab tak main n doon koi kahin jae nahim”

yah daroga ji the mumh se shabd jharate phool se
a rahe the thelate logon ko apane rool se

phir dahare, “inako dandon se sudhara jaega
thakuron se jo bhi takaraya vo mara jaega

ik sipahi ne kaha, “saikil kidhar ko mor dem
hosh mein aya nahin mangal kaho to chhor dem”

bola thanedara, “murge ki tarah mat bang do
hosh mein aya nahin to lathiyon par tang lo

ye samajhate hain ki thakur se ulajhana khel hai
aise paji ka thikana ghar nahin hai, jel hai”

poochhate rahate hain mujhase log akasar yah savala
“kaisa hai kahie n sarajoo par ki krishna ka hala”

unaki utsukata ko shahari nagnata ke jvar ko
sar rahe janatantr ke makkar pairokar ko

dharm samskriti aur naitikata ke thekedar ko
prant ke mantriganon ko kendr ki sarakar ko

main nimantran de raha hoom- aem mere gamv mein
tat pe nadiyon ke ghani amaraiyon ki chhamv mein

gamv jisamein aj panchali ughari ja rahi
ya ahimsa ki jaham par nath utari ja rahi

hain tarasate kitane hi mangal langoti ke lie
bechati hai jism kitani krishna roti ke lie!

ਅਦਮ ਗੋਂਡਵੀ ਮੈਂ ਚਮਾਰੋਂ ਕੀ ਗਲੀ ਤਕ ਲੇ ਚਲੂਁਗਾ ਆਪਕੋ (In punjabi)

ਆਇਏ ਮਹਸੂਸ ਕਰਿਏ ਜ਼ਿਨ੍ਦਗੀ ਕੇ ਤਾਪ ਕੋ
ਮੈਂ ਚਮਾਰੋਂ ਕੀ ਗਲੀ ਤਕ ਲੇ ਚਲੂਁਗਾ ਆਪਕੋ

ਜਿਸ ਗਲੀ ਮੇਂ ਭੁਖਮਰੀ ਕੀ ਯਾਤਨਾ ਸੇ ਊਬ ਕਰ
ਮਰ ਗਈ ਫੁਲਿਯਾ ਬਿਚਾਰੀ ਏਕ ਕੁਏਁ ਮੇਂ ਡੂਬ ਕਰ

ਹੈ ਸਧੀ ਸਿਰ ਪਰ ਬਿਨੌਲੀ ਕੰਡਿਯੋਂ ਕੀ ਟੋਕਰੀ
ਆ ਰਹੀ ਹੈ ਸਾਮਨੇ ਸੇ ਹਰਖੁਆ ਕੀ ਛੋਕਰੀ

ਚਲ ਰਹੀ ਹੈ ਛੰਦ ਕੇ ਆਯਾਮ ਕੋ ਦੇਤੀ ਦਿਸ਼ਾ
ਮੈਂ ਇਸੇ ਕਹਤਾ ਹੂੰ ਸਰਜੂਪਾਰ ਕੀ ਮੋਨਾਲਿਸਾ

ਕੈਸੀ ਯਹ ਭਯਭੀਤ ਹੈ ਹਿਰਨੀ-ਸੀ ਘਬਰਾਈ ਹੁਈ
ਲਗ ਰਹੀ ਜੈਸੇ ਕਲੀ ਬੇਲਾ ਕੀ ਕੁਮ੍ਹਲਾਈ ਹੁਈ

ਕਲ ਕੋ ਯਹ ਵਾਚਾਲ ਥੀ ਪਰ ਆਜ ਕੈਸੀ ਮੌਨ ਹੈ
ਜਾਨਤੇ ਹੋ ਇਸਕੀ ਖ਼ਾਮੋਸ਼ੀ ਕਾ ਕਾਰਣ ਕੌਨ ਹੈ

ਥੇ ਯਹੀ ਸਾਵਨ ਕੇ ਦਿਨ ਹਰਖੂ ਗਯਾ ਥਾ ਹਾਟ ਕੋ
ਸੋ ਰਹੀ ਬੂਢ਼ੀ ਓਸਾਰੇ ਮੇਂ ਬਿਛਾਏ ਖਾਟ ਕੋ

ਡੂਬਤੀ ਸੂਰਜ ਕੀ ਕਿਰਨੇਂ ਖੇਲਤੀ ਥੀਂ ਰੇਤ ਸੇ
ਘਾਸ ਕਾ ਗੱਠਰ ਲਿਏ ਵਹ ਆ ਰਹੀ ਥੀ ਖੇਤ ਸੇ

ਆ ਰਹੀ ਥੀ ਵਹ ਚਲੀ ਖੋਈ ਹੁਈ ਜਜ੍ਬਾਤ ਮੇਂ
ਕ੍ਯਾ ਪਤਾ ਉਸਕੋ ਕਿ ਕੋਈ ਭੇੜਿਯਾ ਹੈ ਘਾਤ ਮੇਂ

ਹੋਨੀ ਸੇ ਬੇਖਬਰ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣਾ ਬੇਖ਼ਬਰ ਰਾਹੋਂ ਮੇਂ ਥੀ
ਮੋੜ ਪਰ ਘੂਮੀ ਤੋ ਦੇਖਾ ਅਜਨਬੀ ਬਾਹੋਂ ਮੇਂ ਥੀ

ਚੀਖ਼ ਨਿਕਲੀ ਭੀ ਤੋ ਹੋਠੋਂ ਮੇਂ ਹੀ ਘੁਟ ਕਰ ਰਹ ਗਈ
ਛਟਪਟਾਈ ਪਹਲੇ ਫਿਰ ਢੀਲੀ ਪੜੀ ਫਿਰ ਢਹ ਗਈ

ਦਿਨ ਤੋ ਸਰਜੂ ਕੇ ਕਛਾਰੋਂ ਮੇਂ ਥਾ ਕਬ ਕਾ ਢਲ ਗਯਾ
ਵਾਸਨਾ ਕੀ ਆਗ ਮੇਂ ਕੌਮਾਰ੍ਯ ਉਸਕਾ ਜਲ ਗਯਾ

ਔਰ ਉਸ ਦਿਨ ਯੇ ਹਵੇਲੀ ਹਁਸ ਰਹੀ ਥੀ ਮੌਜ ਮੇਂ
ਹੋਸ਼ ਮੇਂ ਆਈ ਤੋ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣਾ ਥੀ ਪਿਤਾ ਕੀ ਗੋਦ ਮੇਂ

ਜੁੜ ਗਈ ਥੀ ਭੀੜ ਜਿਸਮੇਂ ਜੋਰ ਥਾ ਸੈਲਾਬ ਥਾ
ਜੋ ਭੀ ਥਾ ਅਪਨੀ ਸੁਨਾਨੇ ਕੇ ਲਿਏ ਬੇਤਾਬ ਥਾ

ਬਢ਼ ਕੇ ਮੰਗਲ ਨੇ ਕਹਾ ਕਾਕਾ ਤੂ ਕੈਸੇ ਮੌਨ ਹੈ
ਪੂਛ ਤੋ ਬੇਟੀ ਸੇ ਆਖ਼ਿਰ ਵੋ ਦਰਿੰਦਾ ਕੌਨ ਹੈ

ਕੋਈ ਹੋ ਸੰਘਰ੍ਸ਼਼ ਸੇ ਹਮ ਪਾਁਵ ਮੋੜੇਂਗੇ ਨਹੀਂ
ਕੱਚਾ ਖਾ ਜਾਏਁਗੇ ਜ਼ਿਨ੍ਦਾ ਉਨਕੋ ਛੋਡੇਂਗੇ ਨਹੀਂ

ਕੈਸੇ ਹੋ ਸਕਤਾ ਹੈ ਹੋਨੀ ਕਹ ਕੇ ਹਮ ਟਾਲਾ ਕਰੇਂ
ਔਰ ਯੇ ਦੁਸ਼੍ਮਨ ਬਹੂ-ਬੇਟੀ ਸੇ ਮੁਁਹ ਕਾਲਾ ਕਰੇਂ

ਬੋਲਾ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣਾ ਸੇ ਬਹਨ ਸੋ ਜਾ ਮੇਰੇ ਅਨੁਰੋਧ ਸੇ
ਬਚ ਨਹੀਂ ਸਕਤਾ ਹੈ ਵੋ ਪਾਪੀ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ੋਧ ਸੇ

ਪੜ ਗਈ ਇਸਕੀ ਭਨਕ ਥੀ ਠਾਕੁਰੋਂ ਕੇ ਕਾਨ ਮੇਂ
ਵੇ ਇਕੱਠੇ ਹੋ ਗਏ ਥੇ ਸਰਚੰਪ ਕੇ ਦਾਲਾਨ ਮੇਂ

ਦ੍ਰੁਸ਼਼੍ਟਿ ਜਿਸਕੀ ਹੈ ਜਮੀ ਭਾਲੇ ਕੀ ਲਮ੍ਬੀ ਨੋਕ ਪਰ
ਦੇਖਿਏ ਸੁਖਰਾਜ ਸਿੰਗ ਬੋਲੇ ਹੈਂ ਖੈਨੀ ਠੋਂਕ ਕਰ

ਕ੍ਯਾ ਕਹੇਂ ਸਰਪੰਚ ਭਾਈ ਕ੍ਯਾ ਜ਼ਮਾਨਾ ਆ ਗਯਾ
ਕਲ ਤਲਕ ਜੋ ਪਾਁਵ ਕੇ ਨੀਚੇ ਥਾ ਰੁਤਬਾ ਪਾ ਗਯਾ

ਕਹਤੀ ਹੈ ਸਰਕਾਰ ਕਿ ਆਪਸ ਮਿਲਜੁਲ ਕਰ ਰਹੋ
ਸੁਅਰ ਕੇ ਬੱਚੋਂ ਕੋ ਅਬ ਕੋਰੀ ਨਹੀਂ ਹਰਿਜਨ ਕਹੋ

ਦੇਖਿਏ ਨਾ ਯਹ ਜੋ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣਾ ਹੈ ਚਮਾਰੋ ਕੇ ਯਹਾਁ
ਪੜ ਗਯਾ ਹੈ ਸੀਪ ਕਾ ਮੋਤੀ ਗਁਵਾਰੋਂ ਕੇ ਯਹਾਁ

ਜੈਸੇ ਬਰਸਾਤੀ ਨਦੀ ਅਲ੍ਹੜ ਨਸ਼ੇ ਮੇਂ ਚੂਰ ਹੈ
ਹਾਥ ਨ ਪੁੱਠੇ ਪੇ ਰਖਨੇ ਦੇਤੀ ਹੈ ਮਗਰੂਰ ਹੈ

ਭੇਜਤਾ ਭੀ ਹੈ ਨਹੀਂ ਸਸੁਰਾਲ ਇਸਕੋ ਹਰਖੁਆ
ਫਿਰ ਕੋਈ ਬਾਁਹੋਂ ਮੇਂ ਇਸਕੋ ਭੀਂਚ ਲੇ ਤੋ ਕ੍ਯਾ ਹੁਆ

ਆਜ ਸਰਜੂ ਪਾਰ ਅਪਨੇ ਸ਼੍ਯਾਮ ਸੇ ਟਕਰਾ ਗਈ
ਜਾਨੇ-ਅਨਜਾਨੇ ਵੋ ਲੱਜਤ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਕੀ ਪਾ ਗਈ

ਵੋ ਤੋ ਮੰਗਲ ਦੇਖਤਾ ਥਾ ਬਾਤ ਆਗੇ ਬਢ਼ ਗਈ
ਵਰਨਾ ਵਹ ਮਰਦੂਦ ਇਨ ਬਾਤੋਂ ਕੋ ਕਹਨੇ ਸੇ ਰਹੀ

ਜਾਨਤੇ ਹੈਂ ਆਪ ਮੰਗਲ ਏਕ ਹੀ ਮੱਕ਼ਾਰ ਹੈ
ਹਰਖੂ ਉਸਕੀ ਸ਼ਹ ਪੇ ਥਾਨੇ ਜਾਨੇ ਕੋ ਤੈਯਾਰ ਹੈ

ਕਲ ਸੁਬਹ ਗਰਦਨ ਅਗਰ ਨਪਤੀ ਹੈ ਬੇਟੇ-ਬਾਪ ਕੀ
ਗਾਁਵ ਕੀ ਗਲਿਯੋਂ ਮੇਂ ਕ੍ਯਾ ਇੱਜ਼ਤ ਰਹੇ੍ਗੀ ਆਪਕੀ

ਬਾਤ ਕਾ ਲਹਜਾ ਥਾ ਐਸਾ ਤਾਵ ਸਬਕੋ ਆ ਗਯਾ
ਹਾਥ ਮੂਁਛੋਂ ਪਰ ਗਏ ਮਾਹੌਲ ਭੀ ਸੰਨਾ ਗਯਾ ਥਾ

ਕ੍ਸ਼਼ਣਿਕ ਆਵੇਸ਼ ਜਿਸਮੇਂ ਹਰ ਯੁਵਾ ਤੈਮੂਰ ਥਾ
ਹਾਁ, ਮਗਰ ਹੋਨੀ ਕੋ ਤੋ ਕੁਛ ਔਰ ਹੀ ਮੰਜੂਰ ਥਾ

ਰਾਤ ਜੋ ਆਯਾ ਨ ਅਬ ਤੂਫ਼ਾਨ ਵਹ ਪੁਰ ਜ਼ੋਰ ਥਾ
ਭੋਰ ਹੋਤੇ ਹੀ ਵਹਾਁ ਕਾ ਦ੍ਰੁਸ਼੍ਯ ਬਿਲਕੁਲ ਔਰ ਥਾ

ਸਿਰ ਪੇ ਟੋਪੀ ਬੇਂਤ ਕੀ ਲਾਠੀ ਸੰਭਾਲੇ ਹਾਥ ਮੇਂ
ਏਕ ਦਰ੍ਜਨ ਥੇ ਸਿਪਾਹੀ ਠਾਕੁਰੋਂ ਕੇ ਸਾਥ ਮੇਂ

ਘੇਰਕਰ ਬਸ੍ਤੀ ਕਹਾ ਹਲਕੇ ਕੇ ਥਾਨੇਦਾਰ ਨੇ –
“ਜਿਸਕਾ ਮੰਗਲ ਨਾਮ ਹੋ ਵਹ ਵ੍ਯਕ੍ਤਿ ਆਏ ਸਾਮਨੇ”

ਨਿਕਲਾ ਮੰਗਲ ਝੋਪੜੀ ਕਾ ਪੱਲਾ ਥੋੜਾ ਖੋਲਕਰ
ਏਕ ਸਿਪਾਹੀ ਨੇ ਤਭੀ ਲਾਠੀ ਚਲਾਈ ਦੌੜ ਕਰ

ਗਿਰ ਪੜਾ ਮੰਗਲ ਤੋ ਮਾਥਾ ਬੂਟ ਸੇ ਟਕਰਾ ਗਯਾ
ਸੁਨ ਪੜਾ ਫਿਰ “ਮਾਲ ਵੋ ਚੋਰੀ ਕਾ ਤੂਨੇ ਕ੍ਯਾ ਕਿਯਾ”

“ਕੈਸੀ ਚੋਰੀ, ਮਾਲ ਕੈਸਾ” ਉਸਨੇ ਜੈਸੇ ਹੀ ਕਹਾ
ਏਕ ਲਾਠੀ ਫਿਰ ਪੜੀ ਬਸ ਹੋਸ਼ ਫਿਰ ਜਾਤਾ ਰਹਾ

ਹੋਸ਼ ਖੋਕਰ ਵਹ ਪੜਾ ਥਾ ਝੋਪੜੀ ਕੇ ਦ੍ਵਾਰ ਪਰ
ਠਾਕੁਰੋਂ ਸੇ ਫਿਰ ਦਰੋਗਾ ਨੇ ਕਹਾ ਲਲਕਾਰ ਕਰ –

“ਮੇਰਾ ਮੁਁਹ ਕ੍ਯਾ ਦੇਖਤੇ ਹੋ ! ਇਸਕੇ ਮੁਁਹ ਮੇਂ ਥੂਕ ਦੋ
ਆਗ ਲਾਓ ਔਰ ਇਸਕੀ ਝੋਪੜੀ ਭੀ ਫੂਁਕ ਦੋ”

ਔਰ ਫਿਰ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ੋਧ ਕੀ ਆਂਧੀ ਵਹਾਁ ਚਲਨੇ ਲਗੀ
ਬੇਸਹਾਰਾ ਨਿਰ੍ਬਲੋਂ ਕੀ ਝੋਪੜੀ ਜਲਨੇ ਲਗੀ

ਦੁਧਮੁਁਹਾ ਬੱਚਾ ਵ ਬੁੱਢਾ ਜੋ ਵਹਾਁ ਖੇੜੇ ਮੇਂ ਥਾ
ਵਹ ਅਭਾਗਾ ਦੀਨ ਹਿੰਸਕ ਭੀੜ ਕੇ ਘੇਰੇ ਮੇਂ ਥਾ

ਘਰ ਕੋ ਜਲਤੇ ਦੇਖਕਰ ਵੇ ਹੋਸ਼ ਕੋ ਖੋਨੇ ਲਗੇ
ਕੁਛ ਤੋ ਮਨ ਹੀ ਮਨ ਮਗਰ ਕੁਛ ਜੋਰ ਸੇ ਰੋਨੇ ਲਗੇ

“ਕਹ ਦੋ ਇਨ ਕੁੱਤੋਂ ਕੇ ਪਿੱਲੋਂ ਸੇ ਕਿ ਇਤਰਾਏਁ ਨਹੀਂ
ਹੁਕ੍ਮ ਜਬ ਤਕ ਮੈਂ ਨ ਦੂਁ ਕੋਈ ਕਹੀਂ ਜਾਏ ਨਹੀਂ”

ਯਹ ਦਰੋਗਾ ਜੀ ਥੇ ਮੁਁਹ ਸੇ ਸ਼ਬ੍ਦ ਝਰਤੇ ਫੂਲ ਸੇ
ਆ ਰਹੇ ਥੇ ਠੇਲਤੇ ਲੋਗੋਂ ਕੋ ਅਪਨੇ ਰੂਲ ਸੇ

ਫਿਰ ਦਹਾੜੇ, “ਇਨਕੋ ਡੰਡੋਂ ਸੇ ਸੁਧਾਰਾ ਜਾਏਗਾ
ਠਾਕੁਰੋਂ ਸੇ ਜੋ ਭੀ ਟਕਰਾਯਾ ਵੋ ਮਾਰਾ ਜਾਏਗਾ

ਇਕ ਸਿਪਾਹੀ ਨੇ ਕਹਾ, “ਸਾਇਕਿਲ ਕਿਧਰ ਕੋ ਮੋੜ ਦੇਂ
ਹੋਸ਼ ਮੇਂ ਆਯਾ ਨਹੀਂ ਮੰਗਲ ਕਹੋ ਤੋ ਛੋੜ ਦੇਂ”

ਬੋਲਾ ਥਾਨੇਦਾਰ, “ਮੁਰ੍ਗੇ ਕੀ ਤਰਹ ਮਤ ਬਾਂਗ ਦੋ
ਹੋਸ਼ ਮੇਂ ਆਯਾ ਨਹੀਂ ਤੋ ਲਾਠਿਯੋਂ ਪਰ ਟਾਂਗ ਲੋ

ਯੇ ਸਮਝਤੇ ਹੈਂ ਕਿ ਠਾਕੁਰ ਸੇ ਉਲਝਨਾ ਖੇਲ ਹੈ
ਐਸੇ ਪਾਜੀ ਕਾ ਠਿਕਾਨਾ ਘਰ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਜੇਲ ਹੈ”

ਪੂਛਤੇ ਰਹਤੇ ਹੈਂ ਮੁਝਸੇ ਲੋਗ ਅਕਸਰ ਯਹ ਸਵਾਲ
“ਕੈਸਾ ਹੈ ਕਹਿਏ ਨ ਸਰਜੂ ਪਾਰ ਕੀ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣਾ ਕਾ ਹਾਲ”

ਉਨਕੀ ਉਤ੍ਸੁਕਤਾ ਕੋ ਸ਼ਹਰੀ ਨਗ੍ਨਤਾ ਕੇ ਜ੍ਵਾਰ ਕੋ
ਸੜ ਰਹੇ ਜਨਤੰਤ੍ਰ ਕੇ ਮੱਕਾਰ ਪੈਰੋਕਾਰ ਕੋ

ਧਰ੍ਮ ਸੰਸ੍ਕ੍ਰੁਤਿ ਔਰ ਨੈਤਿਕਤਾ ਕੇ ਠੇਕੇਦਾਰ ਕੋ
ਪ੍ਰਾਂਤ ਕੇ ਮੰਤ੍ਰੀਗਣੋਂ ਕੋ ਕੇਂਦ੍ਰ ਕੀ ਸਰਕਾਰ ਕੋ

ਮੈਂ ਨਿਮੰਤ੍ਰਣ ਦੇ ਰਹਾ ਹੂਁ- ਆਏਁ ਮੇਰੇ ਗਾਁਵ ਮੇਂ
ਤਟ ਪੇ ਨਦਿਯੋਂ ਕੇ ਘਨੀ ਅਮਰਾਇਯੋਂ ਕੀ ਛਾਁਵ ਮੇਂ

ਗਾਁਵ ਜਿਸਮੇਂ ਆਜ ਪਾਂਚਾਲੀ ਉਘਾੜੀ ਜਾ ਰਹੀ
ਯਾ ਅਹਿੰਸਾ ਕੀ ਜਹਾਁ ਪਰ ਨਥ ਉਤਾਰੀ ਜਾ ਰਹੀ

ਹੈਂ ਤਰਸਤੇ ਕਿਤਨੇ ਹੀ ਮੰਗਲ ਲੰਗੋਟੀ ਕੇ ਲਿਏ
ਬੇਚਤੀ ਹੈ ਜਿਸ੍ਮ ਕਿਤਨੀ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਨਾ ਰੋਟੀ ਕੇ ਲਿਏ!

অদম গোংডবী মৈং চমারোং কী গলী তক লে চলূঁগা আপকো (in bengali)

আইএ মহসূস করিএ জ়িন্দগী কে তাপ কো
মৈং চমারোং কী গলী তক লে চলূঁগা আপকো

জিস গলী মেং ভুখমরী কী যাতনা সে ঊব কর
মর গঈ ফুলিয়া বিচারী এক কুএঁ মেং ডূব কর

হৈ সধী সির পর বিনৌলী কংডিয়োং কী টোকরী
আ রহী হৈ সামনে সে হরখুআ কী ছোকরী

চল রহী হৈ ছংদ কে আয়াম কো দেতী দিশা
মৈং ইসে কহতা হূং সরজূপার কী মোনালিসা

কৈসী যহ ভয়ভীত হৈ হিরনী-সী ঘবরাঈ হুঈ
লগ রহী জৈসে কলী বেলা কী কুম্হলাঈ হুঈ

কল কো যহ বাচাল থী পর আজ কৈসী মৌন হৈ
জানতে হো ইসকী খ়ামোশী কা কারণ কৌন হৈ

থে যহী সাবন কে দিন হরখূ গয়া থা হাট কো
সো রহী বূঢ়ী ওসারে মেং বিছাএ খাট কো

ডূবতী সূরজ কী কিরনেং খেলতী থীং রেত সে
ঘাস কা গট্ঠর লিএ বহ আ রহী থী খেত সে

আ রহী থী বহ চলী খোঈ হুঈ জজ্বাত মেং
ক্যা পতা উসকো কি কোঈ ভেড়িয়া হৈ ঘাত মেং

হোনী সে বেখবর কৃষ্ণা বেখ়বর রাহোং মেং থী
মোড় পর ঘূমী তো দেখা অজনবী বাহোং মেং থী

চীখ় নিকলী ভী তো হোঠোং মেং হী ঘুট কর রহ গঈ
ছটপটাঈ পহলে ফির ঢীলী পড়ী ফির ঢহ গঈ

দিন তো সরজূ কে কছারোং মেং থা কব কা ঢল গয়া
বাসনা কী আগ মেং কৌমার্য উসকা জল গয়া

ঔর উস দিন যে হবেলী হঁস রহী থী মৌজ মেং
হোশ মেং আঈ তো কৃষ্ণা থী পিতা কী গোদ মেং

জুড় গঈ থী ভীড় জিসমেং জোর থা সৈলাব থা
জো ভী থা অপনী সুনানে কে লিএ বেতাব থা

বঢ় কে মংগল নে কহা কাকা তূ কৈসে মৌন হৈ
পূছ তো বেটী সে আখ়ির বো দরিংদা কৌন হৈ

কোঈ হো সংঘর্ষ সে হম পাঁব মোড়েংগে নহীং
কচ্চা খা জাএঁগে জ়িন্দা উনকো ছোডেংগে নহীং

কৈসে হো সকতা হৈ হোনী কহ কে হম টালা করেং
ঔর যে দুশ্মন বহূ-বেটী সে মুঁহ কালা করেং

বোলা কৃষ্ণা সে বহন সো জা মেরে অনুরোধ সে
বচ নহীং সকতা হৈ বো পাপী মেরে প্রতিশোধ সে

পড় গঈ ইসকী ভনক থী ঠাকুরোং কে কান মেং
বে ইকট্ঠে হো গএ থে সরচংপ কে দালান মেং

দৃষ্টি জিসকী হৈ জমী ভালে কী লম্বী নোক পর
দেখিএ সুখরাজ সিংগ বোলে হৈং খৈনী ঠোংক কর

ক্যা কহেং সরপংচ ভাঈ ক্যা জ়মানা আ গয়া
কল তলক জো পাঁব কে নীচে থা রুতবা পা গয়া

কহতী হৈ সরকার কি আপস মিলজুল কর রহো
সুঅর কে বচ্চোং কো অব কোরী নহীং হরিজন কহো

দেখিএ না যহ জো কৃষ্ণা হৈ চমারো কে যহাঁ
পড় গয়া হৈ সীপ কা মোতী গঁবারোং কে যহাঁ

জৈসে বরসাতী নদী অল্হড় নশে মেং চূর হৈ
হাথ ন পুট্ঠে পে রখনে দেতী হৈ মগরূর হৈ

ভেজতা ভী হৈ নহীং সসুরাল ইসকো হরখুআ
ফির কোঈ বাঁহোং মেং ইসকো ভীংচ লে তো ক্যা হুআ

আজ সরজূ পার অপনে শ্যাম সে টকরা গঈ
জানে-অনজানে বো লজ্জত জ়িংদগী কী পা গঈ

বো তো মংগল দেখতা থা বাত আগে বঢ় গঈ
বরনা বহ মরদূদ ইন বাতোং কো কহনে সে রহী

জানতে হৈং আপ মংগল এক হী মক়্ক়ার হৈ
হরখূ উসকী শহ পে থানে জানে কো তৈয়ার হৈ

কল সুবহ গরদন অগর নপতী হৈ বেটে-বাপ কী
গাঁব কী গলিয়োং মেং ক্যা ইজ়্জ়ত রহে্গী আপকী

বাত কা লহজা থা ঐসা তাব সবকো আ গয়া
হাথ মূঁছোং পর গএ মাহৌল ভী সন্না গয়া থা

ক্ষণিক আবেশ জিসমেং হর যুবা তৈমূর থা
হাঁ, মগর হোনী কো তো কুছ ঔর হী মংজূর থা

রাত জো আয়া ন অব তূফ়ান বহ পুর জ়োর থা
ভোর হোতে হী বহাঁ কা দৃশ্য বিলকুল ঔর থা

সির পে টোপী বেংত কী লাঠী সংভালে হাথ মেং
এক দর্জন থে সিপাহী ঠাকুরোং কে সাথ মেং

ঘেরকর বস্তী কহা হলকে কে থানেদার নে –
“জিসকা মংগল নাম হো বহ ব্যক্তি আএ সামনে”

নিকলা মংগল ঝোপড়ী কা পল্লা থোড়া খোলকর
এক সিপাহী নে তভী লাঠী চলাঈ দৌড় কর

গির পড়া মংগল তো মাথা বূট সে টকরা গয়া
সুন পড়া ফির “মাল বো চোরী কা তূনে ক্যা কিয়া”

“কৈসী চোরী, মাল কৈসা” উসনে জৈসে হী কহা
এক লাঠী ফির পড়ী বস হোশ ফির জাতা রহা

হোশ খোকর বহ পড়া থা ঝোপড়ী কে দ্বার পর
ঠাকুরোং সে ফির দরোগা নে কহা ললকার কর –

“মেরা মুঁহ ক্যা দেখতে হো ! ইসকে মুঁহ মেং থূক দো
আগ লাও ঔর ইসকী ঝোপড়ী ভী ফূঁক দো”

ঔর ফির প্রতিশোধ কী আংধী বহাঁ চলনে লগী
বেসহারা নির্বলোং কী ঝোপড়ী জলনে লগী

দুধমুঁহা বচ্চা ব বুড্ঢা জো বহাঁ খেড়ে মেং থা
বহ অভাগা দীন হিংসক ভীড় কে ঘেরে মেং থা

ঘর কো জলতে দেখকর বে হোশ কো খোনে লগে
কুছ তো মন হী মন মগর কুছ জোর সে রোনে লগে

“কহ দো ইন কুত্তোং কে পিল্লোং সে কি ইতরাএঁ নহীং
হুক্ম জব তক মৈং ন দূঁ কোঈ কহীং জাএ নহীং”

যহ দরোগা জী থে মুঁহ সে শব্দ ঝরতে ফূল সে
আ রহে থে ঠেলতে লোগোং কো অপনে রূল সে

ফির দহাড়ে, “ইনকো ডংডোং সে সুধারা জাএগা
ঠাকুরোং সে জো ভী টকরায়া বো মারা জাএগা

ইক সিপাহী নে কহা, “সাইকিল কিধর কো মোড় দেং
হোশ মেং আয়া নহীং মংগল কহো তো ছোড় দেং”

বোলা থানেদার, “মুর্গে কী তরহ মত বাংগ দো
হোশ মেং আয়া নহীং তো লাঠিয়োং পর টাংগ লো

যে সমঝতে হৈং কি ঠাকুর সে উলঝনা খেল হৈ
ঐসে পাজী কা ঠিকানা ঘর নহীং হৈ, জেল হৈ”

পূছতে রহতে হৈং মুঝসে লোগ অকসর যহ সবাল
“কৈসা হৈ কহিএ ন সরজূ পার কী কৃষ্ণা কা হাল”

উনকী উৎসুকতা কো শহরী নগ্নতা কে জ্বার কো
সড় রহে জনতংত্র কে মক্কার পৈরোকার কো

ধর্ম সংস্কৃতি ঔর নৈতিকতা কে ঠেকেদার কো
প্রাংত কে মংত্রীগণোং কো কেংদ্র কী সরকার কো

মৈং নিমংত্রণ দে রহা হূঁ- আএঁ মেরে গাঁব মেং
তট পে নদিয়োং কে ঘনী অমরাইয়োং কী ছাঁব মেং

গাঁব জিসমেং আজ পাংচালী উঘাড়ী জা রহী
যা অহিংসা কী জহাঁ পর নথ উতারী জা রহী

হৈং তরসতে কিতনে হী মংগল লংগোটী কে লিএ
বেচতী হৈ জিস্ম কিতনী কৃষ্না রোটী কে লিএ!

અદમ ગોંડવી મૈં ચમારોં કી ગલી તક લે ચલૂઁગા આપકો (In Gujarati)

આઇએ મહસૂસ કરિએ જ઼િન્દગી કે તાપ કો

મૈં ચમારોં કી ગલી તક લે ચલૂઁગા આપકો

જિસ ગલી મેં ભુખમરી કી યાતના સે ઊબ કર
મર ગઈ ફુલિયા બિચારી એક કુએઁ મેં ડૂબ કર

હૈ સધી સિર પર બિનૌલી કંડિયોં કી ટોકરી
આ રહી હૈ સામને સે હરખુઆ કી છોકરી

ચલ રહી હૈ છંદ કે આયામ કો દેતી દિશા
મૈં ઇસે કહતા હૂં સરજૂપાર કી મોનાલિસા

કૈસી યહ ભયભીત હૈ હિરની-સી ઘબરાઈ હુઈ
લગ રહી જૈસે કલી બેલા કી કુમ્હલાઈ હુઈ

કલ કો યહ વાચાલ થી પર આજ કૈસી મૌન હૈ
જાનતે હો ઇસકી ખ઼ામોશી કા કારણ કૌન હૈ

થે યહી સાવન કે દિન હરખૂ ગયા થા હાટ કો
સો રહી બૂઢ઼ી ઓસારે મેં બિછાએ ખાટ કો

ડૂબતી સૂરજ કી કિરનેં ખેલતી થીં રેત સે
ઘાસ કા ગટ્ઠર લિએ વહ આ રહી થી ખેત સે

આ રહી થી વહ ચલી ખોઈ હુઈ જજ્બાત મેં
ક્યા પતા ઉસકો કિ કોઈ ભેડ઼િયા હૈ ઘાત મેં

હોની સે બેખબર કૃષ્ણા બેખ઼બર રાહોં મેં થી
મોડ઼ પર ઘૂમી તો દેખા અજનબી બાહોં મેં થી

ચીખ઼ નિકલી ભી તો હોઠોં મેં હી ઘુટ કર રહ ગઈ
છટપટાઈ પહલે ફિર ઢીલી પડ઼ી ફિર ઢહ ગઈ

દિન તો સરજૂ કે કછારોં મેં થા કબ કા ઢલ ગયા
વાસના કી આગ મેં કૌમાર્ય ઉસકા જલ ગયા

ઔર ઉસ દિન યે હવેલી હઁસ રહી થી મૌજ મેં
હોશ મેં આઈ તો કૃષ્ણા થી પિતા કી ગોદ મેં

જુડ઼ ગઈ થી ભીડ઼ જિસમેં જોર થા સૈલાબ થા
જો ભી થા અપની સુનાને કે લિએ બેતાબ થા

બઢ઼ કે મંગલ ને કહા કાકા તૂ કૈસે મૌન હૈ
પૂછ તો બેટી સે આખ઼િર વો દરિંદા કૌન હૈ

કોઈ હો સંઘર્ષ સે હમ પાઁવ મોડ઼ેંગે નહીં
કચ્ચા ખા જાએઁગે જ઼િન્દા ઉનકો છોડેંગે નહીં

કૈસે હો સકતા હૈ હોની કહ કે હમ ટાલા કરેં
ઔર યે દુશ્મન બહૂ-બેટી સે મુઁહ કાલા કરેં

બોલા કૃષ્ણા સે બહન સો જા મેરે અનુરોધ સે
બચ નહીં સકતા હૈ વો પાપી મેરે પ્રતિશોધ સે

પડ઼ ગઈ ઇસકી ભનક થી ઠાકુરોં કે કાન મેં
વે ઇકટ્ઠે હો ગએ થે સરચંપ કે દાલાન મેં

દૃષ્ટિ જિસકી હૈ જમી ભાલે કી લમ્બી નોક પર
દેખિએ સુખરાજ સિંગ બોલે હૈં ખૈની ઠોંક કર

ક્યા કહેં સરપંચ ભાઈ ક્યા જ઼માના આ ગયા
કલ તલક જો પાઁવ કે નીચે થા રુતબા પા ગયા

કહતી હૈ સરકાર કિ આપસ મિલજુલ કર રહો
સુઅર કે બચ્ચોં કો અબ કોરી નહીં હરિજન કહો

દેખિએ ના યહ જો કૃષ્ણા હૈ ચમારો કે યહાઁ
પડ઼ ગયા હૈ સીપ કા મોતી ગઁવારોં કે યહાઁ

જૈસે બરસાતી નદી અલ્હડ઼ નશે મેં ચૂર હૈ
હાથ ન પુટ્ઠે પે રખને દેતી હૈ મગરૂર હૈ

ભેજતા ભી હૈ નહીં સસુરાલ ઇસકો હરખુઆ
ફિર કોઈ બાઁહોં મેં ઇસકો ભીંચ લે તો ક્યા હુઆ

આજ સરજૂ પાર અપને શ્યામ સે ટકરા ગઈ
જાને-અનજાને વો લજ્જત જ઼િંદગી કી પા ગઈ

વો તો મંગલ દેખતા થા બાત આગે બઢ઼ ગઈ
વરના વહ મરદૂદ ઇન બાતોં કો કહને સે રહી

જાનતે હૈં આપ મંગલ એક હી મક઼્ક઼ાર હૈ
હરખૂ ઉસકી શહ પે થાને જાને કો તૈયાર હૈ

કલ સુબહ ગરદન અગર નપતી હૈ બેટે-બાપ કી
ગાઁવ કી ગલિયોં મેં ક્યા ઇજ઼્જ઼ત રહે્ગી આપકી

બાત કા લહજા થા ઐસા તાવ સબકો આ ગયા
હાથ મૂઁછોં પર ગએ માહૌલ ભી સન્ના ગયા થા

ક્ષણિક આવેશ જિસમેં હર યુવા તૈમૂર થા
હાઁ, મગર હોની કો તો કુછ ઔર હી મંજૂર થા

રાત જો આયા ન અબ તૂફ઼ાન વહ પુર જ઼ોર થા
ભોર હોતે હી વહાઁ કા દૃશ્ય બિલકુલ ઔર થા

સિર પે ટોપી બેંત કી લાઠી સંભાલે હાથ મેં
એક દર્જન થે સિપાહી ઠાકુરોં કે સાથ મેં

ઘેરકર બસ્તી કહા હલકે કે થાનેદાર ને –
“જિસકા મંગલ નામ હો વહ વ્યક્તિ આએ સામને”

નિકલા મંગલ ઝોપડ઼ી કા પલ્લા થોડ઼ા ખોલકર
એક સિપાહી ને તભી લાઠી ચલાઈ દૌડ઼ કર

ગિર પડ઼ા મંગલ તો માથા બૂટ સે ટકરા ગયા
સુન પડ઼ા ફિર “માલ વો ચોરી કા તૂને ક્યા કિયા”

“કૈસી ચોરી, માલ કૈસા” ઉસને જૈસે હી કહા
એક લાઠી ફિર પડ઼ી બસ હોશ ફિર જાતા રહા

હોશ ખોકર વહ પડ઼ા થા ઝોપડ઼ી કે દ્વાર પર
ઠાકુરોં સે ફિર દરોગા ને કહા લલકાર કર –

“મેરા મુઁહ ક્યા દેખતે હો ! ઇસકે મુઁહ મેં થૂક દો
આગ લાઓ ઔર ઇસકી ઝોપડ઼ી ભી ફૂઁક દો”

ઔર ફિર પ્રતિશોધ કી આંધી વહાઁ ચલને લગી
બેસહારા નિર્બલોં કી ઝોપડ઼ી જલને લગી

દુધમુઁહા બચ્ચા વ બુડ્ઢા જો વહાઁ ખેડ઼ે મેં થા
વહ અભાગા દીન હિંસક ભીડ઼ કે ઘેરે મેં થા

ઘર કો જલતે દેખકર વે હોશ કો ખોને લગે
કુછ તો મન હી મન મગર કુછ જોર સે રોને લગે

“કહ દો ઇન કુત્તોં કે પિલ્લોં સે કિ ઇતરાએઁ નહીં
હુક્મ જબ તક મૈં ન દૂઁ કોઈ કહીં જાએ નહીં”

યહ દરોગા જી થે મુઁહ સે શબ્દ ઝરતે ફૂલ સે
આ રહે થે ઠેલતે લોગોં કો અપને રૂલ સે

ફિર દહાડ઼ે, “ઇનકો ડંડોં સે સુધારા જાએગા
ઠાકુરોં સે જો ભી ટકરાયા વો મારા જાએગા

ઇક સિપાહી ને કહા, “સાઇકિલ કિધર કો મોડ઼ દેં
હોશ મેં આયા નહીં મંગલ કહો તો છોડ઼ દેં”

બોલા થાનેદાર, “મુર્ગે કી તરહ મત બાંગ દો
હોશ મેં આયા નહીં તો લાઠિયોં પર ટાંગ લો

યે સમઝતે હૈં કિ ઠાકુર સે ઉલઝના ખેલ હૈ
ઐસે પાજી કા ઠિકાના ઘર નહીં હૈ, જેલ હૈ”

પૂછતે રહતે હૈં મુઝસે લોગ અકસર યહ સવાલ
“કૈસા હૈ કહિએ ન સરજૂ પાર કી કૃષ્ણા કા હાલ”

ઉનકી ઉત્સુકતા કો શહરી નગ્નતા કે જ્વાર કો
સડ઼ રહે જનતંત્ર કે મક્કાર પૈરોકાર કો

ધર્મ સંસ્કૃતિ ઔર નૈતિકતા કે ઠેકેદાર કો
પ્રાંત કે મંત્રીગણોં કો કેંદ્ર કી સરકાર કો

મૈં નિમંત્રણ દે રહા હૂઁ- આએઁ મેરે ગાઁવ મેં
તટ પે નદિયોં કે ઘની અમરાઇયોં કી છાઁવ મેં

ગાઁવ જિસમેં આજ પાંચાલી ઉઘાડ઼ી જા રહી
યા અહિંસા કી જહાઁ પર નથ ઉતારી જા રહી

હૈં તરસતે કિતને હી મંગલ લંગોટી કે લિએ
બેચતી હૈ જિસ્મ કિતની કૃષ્ના રોટી કે લિએ!

Advertisement