Alif Laila Kahani Kissa vajeer ka अलिफ लैला की कहानी किस्सा वजीर का

अलिफ लैला की कहानी किस्सा वजीर का

प्राचीन समय में एक राजा था उसके राजकुमार को मृगया का बड़ा शौक था। राजा उसे बहुत चाहता था, राजकुमार की किसी इच्छा को अस्वीकार नहीं करता था। एक दिन राजकुमार ने शिकार पर जाना चाहा। राजा ने अपने एक वजीर को बुलाकर कहा कि राजकुमार के साथ चले जाओ; तुम्हें सब रास्ते मालूम हैं, राजकुमार को नहीं मालूम, इसलिए एक क्षण के लिए भी राजकुमार का साथ न छोड़ना।

राजकुमार वजीर और कई अन्य लोगों को लेकर आखेट के लिए वन में गया। कुछ देर में एक बारहसिंघा सामने से निकला। राजकुमार ने घोड़ा उसके पीछे डाल दिया। वजीर ने सोचा कि राजकुमार का घोड़ा तेज है और शीघ्र ही बारहसिंघे को मार लिया जाएगा। इसलिए उसने कुछ ढील डाल दी। लेकिन बारहसिंघा दौड़ता ही रहा। राजकुमार कई कोस तक उसके पीछे गया लेकिन उसे पा न सका। वह रास्ता भी भूल गया। उसने चाहा कि वापस अपने वजीर और अन्य शिकारी साथियों से जा मिले लेकिन वह बिल्कुल भटक गया।

भटकते-भटकते उसने एक स्थान पर देखा कि एक अति सुंदर स्त्री विलाप कर रही है। राजकुमार ने अपने घोड़े को रोका और स्त्री से पूछा कि तू क्यों रो रही है। स्त्री ने बताया कि मैं एक देश की राजकुमारी हूँ, मैं विशेष परिस्थिति वश अकेली अपने घोड़े पर सवार होकर इधर से जा रही थी कि मुझे नींद आ गई और मैं घोड़े से गिर पड़ी और मेरा घोड़ा भी जंगल में भाग गया, मुझे यह भी नहीं मालूम वह किधर को गया है। राजकुमार को उस पर दया आई। उसने अपने आगे अपने घोड़े पर बिठा लिया और जिस ओर स्त्री ने अपनी राजधानी बताई थी उधर चल दिया।

कुछ समय पश्चात स्त्री ने कहा मैं घोड़े पर थक गई हूँ, पैदल चलना चाहती हूँ। राजकुमार ने उसे उतार दिया और उसके साथ पैदल चलने लगा। लेकिन उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक परकोटे के पास पहुँच कर उसने पुकार कर कहा, ‘बच्चों प्रसन्न हो जाओ। मैं तुम्हारे लिए बड़ा मोटा ताजा आदमी शिकार के लिए लाई हूँ।’ जवाब में आवाज आई, अम्मा कहाँ है वह आदमी। हमें जल्दी से दे। हम बहुत भूखे हैं। राजकुमार यह सुन कर बड़ा भयभीत हुआ। वह समझ गया कि यह स्त्री नरभक्षी वनवासियों की जाति की है और मुझे मार कर खा जाने के लिए यहाँ धोखे से लाई है। वह घोड़े पर बैठ कर मुड़ने लगा। स्त्री ने देखा कि शिकार हाथ से निकला जाता है तो पलट कर कहने लगी, ‘तुम परेशान क्यों हो, यह तो तुम्हारे साथ मजाक हो रहा था। राजकुमार ने कहा, ‘खैर, तुम अपने घर आ गई हो और अब मैं जा रहा हूँ।’ स्त्री बोली तुम कौन हो, कहाँ जाओगे। राजकुमार ने अपना हाल बताया कि शिकार खेलने में राह भूल गया हूँ। स्त्री ने कहा, ‘फिर मेरे साथ क्यों नहीं आते? थोड़ी देर आराम करो।’

राजकुमार की समझ में नहीं आया कि स्त्री पर विश्वास करे या न करे। उसने अंततः दोनों हाथ उठाकर कहा, ‘हे भगवान, यदि तू सर्वशक्तिमान है तो मुझे इस विपत्ति से बचा और मुझे मेरा मार्ग दिखा।’ उसके यह कहते ही नरभक्षिणी स्त्री एक घने जंगल में गायब हो गई और कुछ देर में राजकुमार को अपना मार्ग भी मिल गया। अपने महल में पहुँच कर उसने अपने पिता से अपना संपूर्ण वृत्तांत कहा कि किस प्रकार वह वजीर से बिछुड़ गया और नरभक्षिणी के पंजे में फँसते-फँसते बचा। राजा इस बात से इतना क्रुद्ध हुआ कि उसे वजीर का वध करवा डाला।

शहरजाद इतनी कहानी कह कर फिर आगे बोली कि बादशाह सलामत, मंत्री गरीक बादशाह को यह किस्सा सुनाकर कहने लगा, ‘मैंने विश्वस्त सूत्रों से मालूम किया है कि हकीम दूबाँ आपके किसी वैरी का जासूस है और उसने इसे यहाँ पर इसलिए भेजा है कि आपको धीरे-धीरे मार दे। यह ठीक ही है कि आप का रोग अभी दूर हो गया है किंतु औषधियों का बाद में ऐसा प्रभाव होगा कि आप को अत्यंत कष्ट होगा और संभव है कि जान पर भी बन आए।

मंत्री ने बादशाह को इतना बहकाया कि वह हकीम पर संदेह करने लगा। वह बोला, ‘शायद तुम ठीक ही कहते हो। हो सकता है कि यह मेरी हत्या के उद्देश्य से आया हो और किसी समय मुझे कोई ऐसी औषधि सुँघाए जिससे मेरी जान जाती रहे। मुझे वास्तव में अपने लिए खतरा मालूम होता है।’ मंत्री ने सोचा कि अपने षड्यंत्र को शीघ्र ही पूरा करना चाहिए, ऐसा न हो कि बादशाह का विचार बाद में पलट जाय। वह बोला, ‘महाराज, फिर देर किस बात की है। उसे अभी बुलवा कर क्यों नहीं मरवा देते?’ बादशाह ने कहा, ‘अच्छा, मैं ऐसा ही करता हूँ।’

बादशाह ने एक सरदार को भेजा कि इसी समय दूबाँ को यहाँ ले आओ। दूत उसे थोड़ी ही देर में ले आया। दूबाँ के आने पर बादशाह ने पूछा, ‘तुम्हें मालूम है मैंने तुम्हें इस समय क्यों बुलाया है’ उसने निवेदन किया कि मुझे नहीं मालूम। बादशाह ने कहा, ‘मैंने तुम्हें प्राणदंड देने के लिए बुलाया है ताकि तुम्हारे षड्यंत्र से बचाव कर सकूँ।’ हकीम को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने पूछा कि मेरा अपराध क्या है कि आप मुझे मरवाए डाल रहे है। बादशाह ने कहा, ‘तुम मेरे किसी शत्रु के जासूस हो और यहाँ मुझे मारने के लिए आए हो। मेरे लिए यही उचित है कि तुम्हें प्राणदंड देने में एक क्षण का भी विलंब न करूँ। यह कह कर बादशाह ने उसी सरदार से कहा कि हकीम का वध कर दे।

हकीम समझ गया कि मेरे शत्रुओं ने ईर्ष्या के कारण बादशाह का मन मुझ से फेर दिया है। वह इस बात पर पछताने लगा कि मैंने क्यों यहाँ आकर बादशाह को रोगमुक्त किया और अपनी जान जाने का सामान किया। वह बहुत देर तक बादशाह के सामने निर्दोषिता सिद्ध करता रहा लेकिन बादशाह ने उसे मारने की जिद पकड़ ली। उसने दूसरी बार सरदार को आज्ञा दी कि हकीम को मार दो। हकीम कहने लगा आप मुझे निरपराध ही मरवाए डाल रहे हैं, भगवान मेरी हत्या का बदला आप से लेगा।

इतना कह कर मछुवारे ने गागर के दैत्य से कहा कि जो बात दूबाँ और बादशाह गरीक के बीच थी वही मेरे तुम्हारे बीच है, खैर आगे की कहानी सुनो, जब जल्लाद दूबाँ को मारने के लिए उसकी आँखों की पट्टी बाँधने लगा तो बादशाह के दरबारियों ने हकीम को निरपराध समझ कर एक बार फिर बादशाह से उसकी जान न लेने की प्रार्थना की किंतु बादशाह ने उन सब को ऐसी डाँट बताई कि उन्हें कुछ कहने की हिम्मत न रही। हकीम को निश्चय हो गया कि किसी तरह मेरी जान नहीं बच सकती। उसने बादशाह से कहा, ‘स्वामी, मुझे इतनी मुहलत तो दें कि मैं घर जाकर वसीयत लिख आऊँ। मैं अपनी पुस्तकें किसी सुपात्र को देना चाहता हूँ। लेकिन उनमें से एक पुस्तक आपके अपने पुस्तकालय में रखने योग्य है।’

बादशाह ने कहा, ‘ऐसी कौन सी पुस्तक तेरे पास है जो मेरे लायक हो? क्या है उस पुस्तक में? दूबाँ ने कहा, ‘उसमें बड़ी अद्भुत और काम की बातें हैं। उनमें से एक बात यह है कि मेरे सिर के काटे जाने के बाद आप पुस्तक के छठे पन्ने के बाएँ पृष्ठ की तीसरी पंक्ति को पढ़कर आप जो भी प्रश्न करेंगे उसका उत्तर मेरा कटा हुआ सिर देगा।’ बादशाह को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोच विचार कर आज्ञा दी कि हकीम को पहरे में उसके घर ले जाओ। बादशाह की आज्ञा के अनुसार सिपाही हकीम को उसके घर ले गए। हकीम ने एक दिन में अपना काम काज समेट लिया। दूसरे दिन जब उसे बादशाह के सामने ले जाया गया तो उसके हाथों में एक मोटी सी पुस्तक थी जो एक कपड़े मे लिपटी थी।

हकीम ने बादशाह से कहा, ‘मेरे कटे हुए सर को एक सोने के थाल में उस पुस्तक में ऊपर लिपटे कपड़े पर रखना तो खून बहना बंद हो जाएगा। इस के बाद मेरी बताई हुई पंक्ति पढ़कर जो भी आप पूछेंगे वह मेरा कटा हुआ सिर बता देगा। लेकिन मैं फिर आपसे निवेदन करता हूँ कि मैं निरपराध हूँ। आप मुझ पर दया करें और मेरे वध का आदेश वापस ले लें। बादशाह ने कहा, नहीं, अब मैं जो कुछ सुनना होगा तेरे कटे हुए सिर ही से सुनूँगा। तेरे रोने पीटने का कोई लाभ नहीं है।’

यह कहकर बादशाह ने पुस्तक अपने हाथ में ले ली और जल्लाद को हकीम के मारने की आज्ञा दी। फिर उसने सोने के थाल पर पुस्तक का आवरण वस्त्र रखवाया और जब सिर से खून बहना बंद हो गया तो उसे और दरबारियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब उस कटे सिर ने आँखें खोलकर बादशाह से कहा, ‘पुस्तक का छठा पन्ना खोल।’ बादशाह ने ऐसा करना चाहा लेकिन पुस्तक के पृष्ठ एक दूसरे से चिपके हुए थे। इसलिए उसने उँगली में थूक लगा कर पन्नों को अलग करना शुरू किया। जब छठा पन्ना खुला तो बादशाह ने बाएँ पृष्ठ की तीसरी पंक्ति पढ़नी चाही किंतु उसने देखा कि उस पृष्ठ पर कुछ नहीं लिखा है। उसने यह बात बताई तो कटे सिर ने कहा, ‘आगे के पृष्ठ देख, शायद उनमें लिखा हो।’ बादशाह उँगली में थूक लगा-लगाकर पृष्ठों को अलग करने लगा।

वास्तव में हकीम ने पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर विष लगा रखा था। थूक लगी उँगली के बार बार पृष्ठों पर रगड़े जाने और फिर मुँह में जाने पर उन पृष्ठों में लगा विष बादशाह के शरीर में प्रवेश कर गया। बादशाह की हालत खराब होने लगी किंतु उसने कटे सिर से प्रश्नों के उत्तर पाने के शौक में इस पर कुछ ध्यान न दिया। अंततः उसकी दृष्टि भी मंद पड़ गई और वह राजसिंहासन से नीचे गिर गया। हकीम के सिर ने जब देखा कि विष पूरी तरह चढ़ गया और बादशाह क्षण दो क्षण का मेहमान है तो हँस कर बोला, हे क्रूर अन्यायी तूने देखा कि निर्दोष की हत्या का क्या परिणाम होता है।’ यह सुनते ही बादशाह के प्राण निकल गए। इस प्रकार उसे अपने किए का फल मिल गया।

रानी शहरजाद ने शहरयार से कहा कि मछुवारे ने दैत्य को हकीम दूबाँ और बादशाह गरीक की जो कहानी सुनाई थी वह तो खत्म हो गई, अब मैं मछुवारे और दैत्य की कहानी आगे बढ़ाती हूँ।

मछुवारा यह कहानी सुनाकर दैत्य से कहने लगा, ‘यदि गरीक बादशाह हकीम दूबाँ की हत्या न करता तो भगवान उसे ऐसा दंड न देता। दैत्य तेरा हाल भी उस बादशाह की तरह है। तू अगर बंधन से छूटकर मेरे मारने की इच्छा न करता तो दुबारा बंधन में न पड़ता। अब मैं तुझ पर दया करके तुझे फिर से स्वतंत्र क्यों करूँ? मैं तो गागर समेत तुझे फिर नदी में डाल रहा हूँ जहाँ तू अनंतकाल तक पड़ा रहेगा।

दैत्य बोला, ‘मेरे मित्र, तू ऐसा न कर मैं अब तुझे मारने का इरादा कभी न करूँगा। बुराई के बदले में भी भलाई करनी चाहिए। तू भी मेरे साथ ऐसी ही भलाई कर जैसी इम्मा ने अतीका के साथ की थी।’ मछुवारे ने कहा, ‘मुझे वह कहानी नहीं मालूम है, तू बता तो मैं सुनूँ।’ दैत्य बोला, ‘यदि तू यह कहानी सुनना चाहे तो मुझे बंधन मुक्त कर क्योंकि मैं गागर में अच्छी तरह नहीं बोल पाऊँगा। मुझे मुक्त कर दो तो यही नहीं, और भी बहुत सी अच्छी कथाएँ सुनाऊँगा।’ मछुवारा बोला, ‘मुझे नहीं सुननी तेरी कहानी’ दैत्य ने कहा, ‘तू मुझे छोड़ दे तो मैं तुझे अति धनी होने का उपाय बताऊँगा।’ मछुवारे को कुछ लालच आ गया। वह बोला, ‘मुझे तेरी बात का विश्वास तो नहीं है, किंतु अगर तू इस्मे-आजम (महामंत्र) की सौगंध खाकर कहे कि तू मेरे साथ धोखा नहीं करेगा और अपने वचन पर दृढ़ रहेगा तो मैं तुझे छोड़ दूँ।’ दैत्य ने ऐसा ही किया।

ज्यों ही मछुवारे ने गागर का ढकना खोला उसमें से धुँआ निकला और फैल गया। कुछ देर में उसने दैत्य का रूप धारण कर लिया। दैत्य ने ठोकर मार कर गागर को नदी में डुबो दिया। मछुवारा यह देखकर बहुत डरा और बोला, ‘हे दैत्य तूने यह क्या किया। क्या तू अपने वचन पर स्थिर नहीं रहना चाहता? मैंने तो तेरे साथ वही किया है जो हकीम दूबाँ ने बादशाह गरीक के साथ किया था।’ मछुवारे के भयभीत होने पर दैत्य हँस कर बोला, ‘तू डर मत मैं अपने वचन पर दृढ़ हूँ। अब तू अपना जाल उठा और मेरे पीछे-पीछे चला आ।

नितांत वे दोनों चले और एक नगर के अंदर से निकल कर एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। फिर वहाँ से उतर कर एक लंबे चौड़े महल में गए। उस महल में एक तालाब दिखाई दिया जिसके चारों ओर चार टीले थे। तालाब के पास पहुँच कर मछुवारे से दैत्य ने कहा, ‘तू इस तालाब में जाल डाल और मछलियाँ पकड़।’ मछुवारा खुश हो गया क्योंकि तालाब में बहुत सी मछलियाँ थीं। उसने तालाब में जाल डाल कर खींचा तो उसमें चार मछलियाँ आई जो चार रंग की थीं – सफेद, लाल, पीली और काली।

दैत्य ने कहा, ‘तू इन मछलियों को लेकर यहाँ के बादशाह के पास जा। वह तुझे इतना धन देगा जो तूने कभी देखा भी नहीं होगा। किंतु एक बात का ध्यान रखना। तालाब में एक दिन में एक ही बार जाल डालना।’ यह कहकर दैत्य ने जमीन में जोर से ठोकर मारी। जमीन फट गई और दैत्य उसमें समा गया। दैत्य के उस गढ़े में समाने के बाद धरती फिर बराबर हो गई जैसे उसमें कभी गढ़ा हुआ ही न हो। मछुवारा उन चारों मछलियों को बादशाह के महल में ले गया।

शहरजाद ने शहरयार से कहा कि उस बादशाह को उन मछलियों को देखकर जितनी प्रसन्नता हुई उसे वर्णन करना मेरी शक्ति के बाहर है। उसने अपने मंत्री से कहा कि ये मछलियाँ उस बावर्चिन के पास ले जाओ जो यूनान के राजा ने मुझे भेंट स्वरूप दी है। सिर्फ वही ऐसी होशियार है जो इन सुंदर मछलियों को भली भाँति पका सकती है। मंत्री मछलियाँ बावर्चिन के पास ले गया। बादशाह ने मछुवारे को चार सौ मोहर इनाम में दे डालीं।

शहरजाद शहरयार से बोली कि अब उस बावर्चिन का हाल सुनिए कि उस पर क्या बीती। बावर्चिन ने मछलियों के टुकड़े करके उन्हें धो-धाकर गर्म तेल में भुनने के लिए डाला। जब टुकड़े एक ओर भुनकर लाल हो गए तो उसने दूसरी ओर भुनने के लिए उन्हें पलटा। उस समय उसने जो कुछ देखा उससे उसकी आँखें फट गईं। उसने देखा कि रसोई घर की दीवार फट गई। उसमें से एक अति सुंदर स्त्री बड़े ठाट-बाट से भड़कीले कपड़े पहने बाहर निकली। उसके शरीर पर भाँति-भाँति के रत्न आभूषण सज रहे थे जैसे मिश्र देश की रानियों के होते हैं। उसके कानों में मूल्यवान बाले, गले में बड़े-बड़े मोतियों की माला और बाँहों में सोने के बाजूबंद थे जिनमें लाल जड़े हुए थे। इनके अलावा भी वह बहुत से मूल्यवान गहने पहने हुए थी।

स्त्री बाहर आकर अपने हाथ में पकड़ी हुई एक मूल्यवान छड़ी उठाकर उस कड़ाही के पास आ खड़ी हुई जिसमें मछलियाँ भुन रही थीं। उसने एक मछली पर छड़ी मारी और बोली, ‘ओ मछली, ओ मछली, क्या तू अपनी प्रतिज्ञा पर कायम है।’ मछली में कोई हरकत न हुई स्त्री ने फिर छड़ी और अपना प्रश्न दोहराया। इस पर चारों मछलियाँ उठ खड़ी हो गईं और बोलीं, ‘यह सच्ची बात है कि तुम हमें मानोगी तो हम तुम्हें मानेंगे और अगर तुम हमारा ॠण वापस करोगी तो हम तुम्हारा ॠण वापस कर देंगे।’ यह सुनते ही उस स्त्री ने कड़ाही को जिसमें मछलियाँ भुन नही थीं। जमीन पर उलट दिया और स्वयं दीवार में समा गई और दीवार जुड़ कर पहले की तरह हो गई।

बावर्चिन इस कांड को देखकर सुधबुध खो बैठी। कुछ देर बाद होश में आई तो देखा मछलियाँ चूल्हे के अंदर गिर कर कोयला हो चुकी हैं। वह अत्यंत दुखी होकर रोने लगी। वह सोच रही थी कि मैंने तो यह सारा व्यापार अपनी आँखों से देखा है लेकिन इस पर बादशाह को कैसे विश्वास आएगा। वह इसी चिंता में बैठी थी कि मंत्री ने आकर पूछा कि मछलियाँ पक चुकीं या नहीं। बावर्चिन ने मंत्री को सारा हाल बताया मंत्री को इस कहानी पर विश्वास तो न हुआ लेकिन उसने बावर्चिन की शिकायत करना ठीक न समझा। उसने मछलियों के खराब होने का कोई बहाना बादशाह से बना दिया और मछुवारे को बुला कर कहा कि वैसी ही चार मछलियाँ और ले आओ। मछुवारे ने दैत्य से किया हुआ वादा तो उसे न बताया लेकिन कोई और मजबूरी बता दी कि आज मछलियाँ क्यों नहीं ला सकता।

दूसरे दिन मछुवारा फिर उस तालाब पर गया और उसी प्रकार की चार रंगों वाली मछलियाँ उसके जाल में फँसीं। मछलियाँ लेकर वह मंत्री के पास पहुँचा। मंत्री ने उसे कुछ इनाम दिया और बावर्चिन के पास मछलियाँ लाकर कहा कि इन्हें मेरे सामने पकाओ। बावर्चिन ने पहले दिन की तरह मछलियाँ काट और धो कर गर्म तेल में डालीं और जब उसने उन्हें कड़ाही में पलटा तो दीवार फट गई और वही स्त्री हाथ में छड़ी लेकर दीवार के अंदर से निकली और छड़ी से एक मछली को छूकर पहले दिन वाली बात पूछी। उन चारों मछलियों ने जुड़कर सिर उठाकर और पूँछ पर खड़े होकर वही उत्तर दिया। स्त्री ने फिर कड़ाही उलट दी और स्वयं दीवार में समा गई और दीवार फिर जुड़कर पहले जैसी हो गई।

मंत्री यह सब बातें देख कर स्तंभित हो गया। अब उसने यह बात बादशाह को बता देना ही ठीक समझा। जब उसने बादशाह को यह कांड बताया तो उसे भी घोर आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि मैं स्वयं अपनी आँखों यह सब देखना चाहता हूँ। उसने फिर मछुवारे से कहा कि ऐसी ही चार मछलियाँ और ले आओ। मछुवारा बोला अब मैं तीन दिन से पहले मछलियाँ लाने में असमर्थ हूँ। चूँकि सारा व्यापार अद्भुत था इसलिए बादशाह ने मछुवारे पर कुछ जोर नहीं डाला। तीन दिन बाद उसने फिर वैसी ही चार मछलियाँ लाकर बादशाह को दीं। बादशाह ने खुश हो कर उसे चार सौ अशर्फियाँ और दीं।

अब बादशाह ने मंत्री से कहा कि बावर्चिन को हटा दो और तुम खुद मेरे सामने इन मछलियों को पकाओ। मंत्री ने बावर्ची खाना अंदर से बंद करके मछलियाँ पकाना शुरू किया। जब एक ओर लाल होने पर मछलियों को पलटा गया तो एक बार फिर दीवार फट गई। किंतु इस बार उसमें से सुंदरी नहीं निकली बल्कि गुलामों जैसा कपड़ा पहने हाथ में एक हरी-भरी छड़ी लिए एक हब्शी निकला। हब्शी ने बड़े कठोर और भयावह स्वर में पूछा, ‘मछलियों, मछलियों क्या तुम अपने वचन पर अब भी स्थिर हो? मछलियाँ अपने सरों को उठा कर बोली, ‘हम उसी बात पर स्थिर हैं।’ हब्शी ने कड़ाही उलट दी और स्वयं दीवार के छेद में घुस गया और दीवार पहले की तरह जुड़ गई।

बादशाह ने मंत्री से कहा, ‘यह अद्भुत घटना मैंने स्वयं देखी है वरना मैं इस पर विश्वास न करता। यह मछलियाँ भी साधारण नहीं है। मैं इस रहस्य को जानने के लिए बड़ा उत्सुक हूँ।’ यह कहकर उसने मछुवारे को फिर बुलवाया और उससे पूछा कि तू यह रंगीन मछलियाँ कहाँ से लाया था। मछुवारे ने बताया कि मैंने उसे उस तालाब से पकड़ा है जिसके चारों ओर चार टीले हैं। बादशाह ने मंत्री से पूछा तुम्हें मालूम है कि वह तालाब कहाँ है? मंत्री ने कहा मैं साठ वर्ष से उस ओर शिकार खेलने जाता रहा हूँ लेकिन मैंने ऐसा तालाब न देखा न सुना। अब बादशाह ने मछुवारे से पूछा कि वह तालाब कितनी दूर है और क्या तू मुझे वहाँ ले जा सकता है? मछुवारे ने कहा वह तालाब यहाँ से तीन घड़ी के रास्ते पर है और मैं आपको जरूर वहाँ ले जाऊँगा।

उस समय दिन कम ही रह गया था किंतु बादशाह को ऐसी उत्सुकता थी कि उसने अपने दरबारियों और रक्षकों को शीघ्र तैयार होने की आज्ञा दी। फिर वह मछुवारे के पीछे-पीछे हो लिया और उसके बताए हुए पहाड़ पर चढ़ गया। जब पहाड़ के दूसरी ओर उतरा तो वहाँ बड़ा विशाल वन दिखाई दिया। यह वन पहले किसी ने नहीं देखा था। फिर बादशाह और उसके साथियों ने वह वन भी पार किया और सब लोग उस तालाब के किनारे पहुँच गए जिसके चारों ओर चार टीले थे। उस तालाब का पानी अत्यंत निर्मल था और जिन चार रंगों की मछलियाँ उसे मछुवारे से मिलती थीं वैसी अनगिनत मछलियाँ उस तालाब में तैर रही थीं। बादशाह का आश्चर्य और बढ़ा। उसने अपने दरबारियों और सरदारों से पूछा कि तुम लोगों ने पहले भी इस तालाब को देखा है या नहीं। उन सब ने निवेदन किया कि हम लोगों ने इस तालाब को देखना कैसा, इसके बारे में सुना तक नहीं।

बादशाह ने कहा कि जब तक मैं इस तालाब और इस की रंगीन मछलियों का रहस्य अच्छी तरह समझ नहीं लूँगा यहाँ से नहीं जाऊँगा, तुम सब लोग भी यहाँ डेरा डालो। उसकी आज्ञानुसार दरबारियों और रक्षकों के डेरे तालाब के चारों ओर पड़ गए।

रात होने पर उसने मंत्री को अपने डेरे में बुलाया और कहा, ‘मैं इस भेद को जानने के लिए अति उत्सुक हूँ कि उस बावर्चीखाने में हब्शी कैसे आया और उसने मछलियों से कैसे बात की, और यह भी जानना चाहता हूँ कि यह तालाब जिसे किसी ने नहीं देखा था अचानक कहाँ से आ गया। मैं अपने कौतूहल को दबा नहीं पा रहा हूँ, अतएव मैंने सोचा कि मैं अकेले ही इस रहस्य का उद्घाटन करूँ। मैं अकेला जा रहा हूँ। तुम यहीं रहो। प्रातःकाल जब दरबारी यहाँ पर दरबार के लिए आएँ तो उनसे कह दो कि बादशाह कुछ बीमार हो गए हैं और कुछ दिन यहीं पर शांतिपूर्वक रहना चाहते हैं। यह कह कर सारे दरबारियों और रक्षकों को राजधानी वापस भेज देना और तुम इस डेरे में अकेले ही उस समय तक प्रतीक्षा करना जब तक मैं लौट न आऊँ।’

मंत्री ने बादशाह को बहुत समझाया ‘महाराज आप यह न करें। इस काम में बड़ा खतरा है। यह भी संभव है कि इतना सब करने के बाद भी आपको कोई रहस्य ज्ञान न हो पाए। फिर बेकार में क्यों इतना कष्ट उठा रहे हैं और इतना खतरा मोल ले रहे हैं।’ बादशाह पर उसके समझाने-बुझाने का कोई असर नहीं हुआ। उसने बादशाही पोशाक उतारी और एक साधारण सैनिक के वस्त्र पहन लिए। जब सब लोग गहरी नींद सोए हुए थे तब वह तलवार लेकर अपने खेमे से निकला और एक ओर चलता हुआ एक पहाड़ पर चढ़ गया। कुछ ही देर में वह उसकी चोटी पर पहुँच कर दूसरी ओर उतर गया। आगे उसे एक गहन वन दिखाई दिया। वह उसी के अंदर चलने लगा। कुछ दूर जाने पर पूरा सवेरा हो गया और उसे दूर जाने पर एक सुंदर प्रासाद दिखाई दिया। वह यह भवन देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे आशा बँधी कि उसे इस जगह तालाब के रहस्य का पता चलेगा।

भवन के निकट पहुँच कर उसने देखा कि वह बड़ा विशाल है और काले पत्थरों का बना है। उसकी दीवारों पर साफ किए हुए इस्पाती पत्तर जड़े थे जो दर्पण की भाँति चमकते थे। बादशाह को विश्वास हो गया कि यहाँ उसे मनोवांछित सूचना मिलेगी। वह बहुत देर तक खड़ा हुआ भवन की शोभा निहारता रहा फिर उसके पास चला गया। वह देख रहा था कि भवन का द्वार खुला है, फिर भी शिष्टता के नाते उसने ताली बजाई कि उसकी आवाज सुनकर कोई अंदर से आ जाए। जब कोई न आया तो उसने साँकल को खड़खड़ाया, यह सोच कर कि शायद उसकी ताली की आवाज अंदर तक नहीं पहुँची होगी।

साँकल खड़खड़ाने पर भी जब कोई नहीं निकला तो बादशाह को क्रोध आया कि अजीब घर है जहाँ बुलाने पर भी कोई आकर नहीं पूछता। वह अंदर चला गया और डयोढ़ी में पहुँच कर जोर से पुकारा कि क्या इस भवन के अंदर कोई मनुष्य है जो एक अतिथि के रहने के लिए थोड़ा स्थान दे। फिर भी उसे कोई उत्तर न मिला तो उसका आश्चर्य और बढ़ा। ड्योढ़ी से आगे बढ़ कर वह घर में घुसा तो देखा कि अंदर से और भी लंबा चौड़ा मकान है किंतु उसके अंदर कोई नहीं है। अब वह एक लंबे चौड़े आँगन को पार करके एक दालान में पहुँचा। उसमें रेशमी कालीन बिछा हुआ था। अंदर का मकान और भी सजा हुआ था। दरवाजों पर जड़ाऊ मखमल के परदे पड़े थे जिनमें सुनहरे और रुपहले फूल बूटे कढ़े थे। अंदर एक बारहदरी थी जिसमें एक हौज था जिसके चारों ओर सोने से चार शेर बने हुए थे। शेरों के मुँह से पानी के फव्वारे छूटते थे और जब उनका पानी नीचे संगमरमर के फर्श पर गिरता था तो मालूम होता था लाखों हीरे-जवाहरात उछल रहे हैं। हौज के बीच में एक फव्वारा था जिस पर अरबी अक्षरों में कुछ खुदा हुआ था और उसका पानी उछल कर बारहदरी की छत को छूता था।

इसके अलावा उस विशाल भवन में तीन बाग थे जिनमें बड़े सुघड़पन के साथ भाँति-भाँति के सुगंधित फूलों और उत्तम फलों के पेड़ लगे थे। बागों में हर चीज ऐसी तरतीब से लगी थी कि उन्हें देख कर दुखी मनुष्य भी आनंद में डूब जाए। वृक्षों पर नाना प्रकार के सुंदर पक्षी कलरव कर रहे थे।

वे पक्षी उन्हीं वृक्षों पर रहते थे, उड़कर नहीं जा सकते थे क्योंकि वृक्षों के ऊपर जाल पड़े हुए थे। बादशाह एक कमरे से दूसरे कमरे और एक बाग से दूसरे बाग में घूम-घूमकर हर वस्तु से आनंदित होता रहा। घूमते-घूमते वह थक गया और एक मकान में बैठ कर आराम करने लगा और सामने वाले बाग की शोभा देखने लगा।

इतने में उसे एक कातर वाणी सुनाई दी जैसे कोई बड़े दुख में कराह रहा हो। उसने कान धर कर सुना तो मालूम हुआ कि कोई मनुष्य रो-रो कर अपनी करुण कथा कह रहा है और अपने दुर्भाग्य को कोस रहा है। बादशाह ने उस कमरे का परदा उठाया जिसमें से यह आवाज आ रही थी। उसने देखा कि एक नवयुवक सिंहासन जैसी किसी ऊँची चीज पर राजसी वस्त्र पहने बैठा है और करुण स्वर में विलाप कर रहा है। बादशाह ने उसके निकट जाकर सलाम किया तो युवक बोला, ‘मुझे क्षमा कीजिए मैं उठकर आपका स्वागत करने में असमर्थ हूँ इसीलिए मैं आपके पास न आ सका। बादशाह ने कहा, ‘मैं आपके शीलवान व्यवहार से बड़ा प्रभावित हुआ हूँ। वास्तव में कोई ऐसा अपरिहार्य कारण होगा कि आप उठ न सके। किंतु आपके दुख को देख कर मुझे अति क्लेश हुआ है।

आप मुझे बताएँ कि मैं आपका कष्ट किस प्रकार दूर कर सकता हूँ। कृपया मुझे अपनी कठिनाई बताने में तनिक भी न हिचकें। कृपया यह बताएँ कि आप यहाँ इस मजबूरी की हालत में कैसे पड़े हैं। यह भी बताएँ कि यह भव्य प्रासाद किसका है और ऐसा निर्जन क्यों है। साथ ही यह भी बताएँ – क्योंकि मैं यही जानने के लिए निकला हूँ – कि पास के तालाब का रहस्य क्या है और उसकी मछलियाँ कौन हैं।’

जवान आदमी यह सुनकर फिर रोने लगा और बोला, ‘मेरा हाल सुनने के पहले देख लीजिए। यह कह कर उसने अपना कपड़ा उठाया तो बादशाह ने देखा कि वह नाभि के ऊपर तो जीवित मनुष्य है और नीचे काले पत्थर का बना हुआ है। उसकी आँखें फटी रह गई और वह बोला, ‘मुझे तो वैसे यहाँ की प्रत्येक वस्तु देख कर आश्चर्य हो रहा था किंतु आपका यह हाल देख कर मेरा आश्चर्य और उत्सुकता बहुत बढ़ गई है। भगवान के लिए अपना ब्योरेवार हाल कहिए। मुझे विश्वास हो रहा है कि तालाब की रंग-बिरंगी मछलियों के रहस्य का भी आपसे संबंध है। आप मुझे अपनी व्यथा-कथा शीघ्र कहिए क्योंकि दूसरे को सुनाने से आदमी का कुछ दुख तो दूर होता ही है।’ जवान आदमी ने कहा कि मुझे अपनी दशा के वर्णन से भी कष्ट होता है किंतु आपका आदेश है इसलिए कहता हूँ।

अलिफ लैला की 64 कहानियों का संकलन

Alif Laila Kahani Kissa vajeer ka

prachin samay mein ek raja tha usake rajakumar ko mrigaya ka bara shauk tha. raja use bahut chahata tha, rajakumar ki kisi ichchha ko asvikar nahin karata tha. ek din rajakumar ne shikar par jana chaha. raja ne apane ek vajir ko bulakar kaha ki rajakumar ke sath chale jao; tumhem sab raste maloon hain, rajakumar ko nahin maloom, isalie ek kshan ke lie bhi rajakumar ka sath n chhorana.

rajakumar vajir aur kai any logon ko lekar akhet ke lie van mein gaya. kuchh der mein ek barahasingha samane se nikala. rajakumar ne ghora usake pichhe dal diya. vajir ne socha ki rajakumar ka ghora tej hai aur shighr hi barahasinghe ko mar liya jaega. isalie usane kuchh dhil dal di. lekin barahasingha daurata hi raha. rajakumar kai kos tak usake pichhe gaya lekin use pa n saka. vah rasta bhi bhool gaya. usane chaha ki vapas apane vajir aur any shikari sathiyon se ja mile lekin vah bilkul bhatak gaya.

bhatakate-bhatakate usane ek sthan par dekha ki ek ati sundar stri vilap kar rahi hai. rajakumar ne apane ghore ko roka aur stri se poochha ki too kyon ro rahi hai. stri ne bataya ki maim ek desh ki rajakumari hoom, maim vishesh paristhiti vash akeli apane ghore par savar hokar idhar se ja rahi thi ki mujhe nind a gai aur maim ghore se gir pari aur mera ghora bhi jangal mein bhag gaya, mujhe yah bhi nahin maloon vah kidhar ko gaya hai. rajakumar ko us par daya ai. usane apane age apane ghore par bitha liya aur jis or stri ne apani rajadhani batai thi udhar chal diya.

kuchh samay pashchat stri ne kaha maim ghore par thak gai hoom, paidal chalana chahati hoom. rajakumar ne use utar diya aur usake sath paidal chalane laga. lekin use yah dekhakar bara ashchary hua ki ek parakote ke pas pahumch kar usane pukar kar kaha, bachchon prasann ho jao. maim tumhare lie bara mota taja adami shikar ke lie lai hoom. javab mein avaj ai, amma kaham hai vah adami. hamein jaldi se de. ham bahut bhookhe hain. rajakumar yah sun kar bara bhayabhit hua. vah samajh gaya ki yah stri narabhakshi vanavasiyon ki jati ki hai aur mujhe mar kar kha jane ke lie yahan dhokhe se lai hai. vah ghore par baith kar murane laga. stri ne dekha ki shikar hath se nikala jata hai to palat kar kahane lagi, tum pareshan kyon ho, yah to tumhare sath majak ho raha tha. rajakumar ne kaha, khair, tum apane ghar a gai ho aur ab maim ja raha hoom. stri boli tum kaun ho, kaham jaoge. rajakumar ne apana hal bataya ki shikar khelane mein rah bhool gaya hoom. stri ne kaha, fir mere sath kyon nahin ate? thori der aram karo.

rajakumar ki samajh mein nahin aya ki stri par vishvas kare ya n kare. usane antatah donon hath uthakar kaha, he bhagavan, yadi too sarvashaktiman hai to mujhe is vipatti se bacha aur mujhe mera marg dikha. usake yah kahate hi narabhakshini stri ek ghane jangal mein gayab ho gai aur kuchh der mein rajakumar ko apana marg bhi mil gaya. apane mahal mein pahumch kar usane apane pita se apana sampoorn vrittant kaha ki kis prakar vah vajir se bichhur gaya aur narabhakshini ke panje mein famsate-famsate bacha. raja is bat se itana kruddh hua ki use vajir ka vadh karava dala.

shaharajad itani Kahani kah kar fir age boli ki badshah salamat, mantri garik badshah ko yah kissa sunakar kahane laga, maimne vishvast sootron se maloon kiya hai ki hakim doobam apake kisi vairi ka jasoos hai aur usane ise yahan par isalie bheja hai ki apako dhire-dhire mar de. yah thik hi hai ki ap ka rog abhi door ho gaya hai kintu aushadhiyon ka bad mein aisa prabhav hoga ki ap ko atyant kasht hoga aur sambhav hai ki jan par bhi ban ae.

mantri ne badshah ko itana bahakaya ki vah hakim par sandeh karane laga. vah bola, shayad tum thik hi kahate ho. ho sakata hai ki yah meri hatya ke uddeshy se aya ho aur kisi samay mujhe koi aisi aushadhi sumghae jisase meri jan jati rahe. mujhe vastav mein apane lie khatara maloon hota hai. mantri ne socha ki apane shadyantr ko shighr hi poora karana chahie, aisa n ho ki badshah ka vichar bad mein palat jaya. vah bola, maharaj, fir der kis bat ki hai. use abhi bulava kar kyon nahin marava dete? badshah ne kaha, achchha, maim aisa hi karata hoom.

badshah ne ek saradar ko bheja ki isi samay doobam ko yahan le ao. doot use thori hi der mein le aya. doobam ke ane par badshah ne poochha, tumhem maloon hai maimne tumhem is samay kyon bulaya hai usane nivedan kiya ki mujhe nahin malooma. badshah ne kaha, maimne tumhem pranadand dene ke lie bulaya hai taki tumhare shadyantr se bachav kar sakoom. hakim ko isase bara ashchary hua aur usane poochha ki mera aparadh kya hai ki ap mujhe maravae dal rahe hai. badshah ne kaha, tum mere kisi shatru ke jasoos ho aur yahan mujhe marane ke lie ae ho. mere lie yahi uchit hai ki tumhem pranadand dene mein ek kshan ka bhi vilamb n karoom. yah kah kar badshah ne usi saradar se kaha ki hakim ka vadh kar de.

hakim samajh gaya ki mere shatruon ne irshya ke karan badshah ka man mujh se fer diya hai. vah is bat par pachhatane laga ki maimne kyon yahan akar badshah ko rogamukt kiya aur apani jan jane ka saman kiya. vah bahut der tak badshah ke samane nirdoshita siddh karata raha lekin badshah ne use marane ki jid pakar li. usane doosari bar saradar ko ajnya di ki hakim ko mar do. hakim kahane laga ap mujhe niraparadh hi maravae dal rahe hain, bhagavan meri hatya ka badala ap se lega.

itana kah kar machhuvare ne gagar ke daity se kaha ki jo bat doobam aur badshah garik ke bich thi vahi mere tumhare bich hai, khair age ki Kahani suno, jab jallad doobam ko marane ke lie usaki amkhon ki patti bamdhane laga to badshah ke darabariyon ne hakim ko niraparadh samajh kar ek bar fir badshah se usaki jan n lene ki prarthana ki kintu badshah ne un sab ko aisi damt batai ki unhem kuchh kahane ki himmat n rahi. hakim ko nishchay ho gaya ki kisi tarah meri jan nahin bach sakati. usane badshah se kaha, svami, mujhe itani muhalat to dem ki maim ghar jakar vasiyat likh aoom. maim apani pustakem kisi supatr ko dena chahata hoom. lekin unamein se ek pustak apake apane pustakalay mein rakhane yogy hai.

badshah ne kaha, aisi kaun si pustak tere pas hai jo mere layak ho? kya hai us pustak mein? doobam ne kaha, usmein bari adbhut aur kam ki batem hain. unamein se ek bat yah hai ki mere sir ke kate jane ke bad ap pustak ke chhathe panne ke baem prishth ki tisari pankti ko parhakar ap jo bhi prashn karenge usaka uttar mera kata hua sir dega. badshah ko yah sunakar bara ashchary hua. usane soch vichar kar ajnya di ki hakim ko pahare mein usake ghar le jao. badshah ki ajnya ke anusar sipahi hakim ko usake ghar le gae. hakim ne ek din mein apana kam kaj samet liya. doosare din jab use badshah ke samane le jaya gaya to usake hathon mein ek moti si pustak thi jo ek kapare me lipati thi.

hakim ne badshah se kaha, mere kate hue sar ko ek sone ke thal mein us pustak mein oopar lipate kapare par rakhana to khoon bahana band ho jaega. is ke bad meri batai hui pankti parhakar jo bhi ap poochhenge vah mera kata hua sir bata dega. lekin maim fir apase nivedan karata hoon ki maim niraparadh hoom. ap mujh par daya karem aur mere vadh ka adesh vapas le lem. badshah ne kaha, nahin, ab maim jo kuchh sunana hoga tere kate hue sir hi se sunoomga. tere rone pitane ka koi labh nahin hai.

yah kahakar badshah ne pustak apane hath mein le li aur jallad ko hakim ke marane ki ajnya di. fir usane sone ke thal par pustak ka avaran vastr rakhavaya aur jab sir se khoon bahana band ho gaya to use aur darabariyon ko bara ashchary hua. ab us kate sir ne amkhem kholakar badshah se kaha, pustak ka chhatha panna khola. badshah ne aisa karana chaha lekin pustak ke prishth ek doosare se chipake hue the. isalie usane umgali mein thook laga kar pannon ko alag karana shuroo kiya. jab chhatha panna khula to badshah ne baem prishth ki tisari pankti parhani chahi kintu usane dekha ki us prishth par kuchh nahin likha hai. usane yah bat batai to kate sir ne kaha, age ke prishth dekh, shayad unamein likha ho. badshah umgali mein thook laga-lagakar prishthon ko alag karane laga.

vastav mein hakim ne pustak ke pratyek prishth par vish laga rakha tha. thook lagi umgali ke bar bar prishthon par ragare jane aur fir mumh mein jane par un prishthon mein laga vish badshah ke sharir mein pravesh kar gaya. badshah ki halat kharab hone lagi kintu usane kate sir se prashnon ke uttar pane ke shauk mein is par kuchh dhyan n diya. antatah usaki drishti bhi mand par gai aur vah rajasimhasan se niche gir gaya. hakim ke sir ne jab dekha ki vish poori tarah charh gaya aur badshah kshan do kshan ka mehaman hai to hams kar bola, he kroor anyayi toone dekha ki nirdosh ki hatya ka kya parinam hota hai. yah sunate hi badshah ke pran nikal gae. is prakar use apane kie ka fal mil gaya.

rani shaharajad ne shaharayar se kaha ki machhuvare ne daity ko hakim doobam aur badshah garik ki jo Kahani sunai thi vah to khatm ho gai, ab maim machhuvare aur daity ki Kahani age barhati hoom.

machhuvara yah Kahani sunakar daity se kahane laga, yadi garik badshah hakim doobam ki hatya n karata to bhagavan use aisa dand n deta. daity tera hal bhi us badshah ki tarah hai. too agar bandhan se chhootakar mere marane ki ichchha n karata to dubara bandhan mein n parata. ab maim tujh par daya karake tujhe fir se svatantr kyon karoom? maim to gagar samet tujhe fir nadi mein dal raha hoon jahan too anantakal tak para rahega.

daity bola, mere mitr, too aisa n kar maim ab tujhe marane ka irada kabhi n karoomga. burai ke badale mein bhi bhalai karani chahie. too bhi mere sath aisi hi bhalai kar jaisi imma ne atika ke sath ki thi. machhuvare ne kaha, mujhe vah Kahani nahin maloon hai, too bata to maim sunoom. daity bola, yadi too yah Kahani sunana chahe to mujhe bandhan mukt kar kyonki maim gagar mein achchhi tarah nahin bol paoomga. mujhe mukt kar do to yahi nahin, aur bhi bahut si achchhi kathaem sunaoomga. machhuvara bola, mujhe nahin sunani teri Kahani daity ne kaha, too mujhe chhor de to maim tujhe ati dhani hone ka upay bataoomga. machhuvare ko kuchh lalach a gaya. vah bola, mujhe teri bat ka vishvas to nahin hai, kintu agar too isme-ajam (mahamantra) ki saugandh khakar kahe ki too mere sath dhokha nahin karega aur apane vachan par drirh rahega to maim tujhe chhor doom. daity ne aisa hi kiya.

jyon hi machhuvare ne gagar ka dhakana khola usmein se dhuma nikala aur fail gaya. kuchh der mein usane daity ka roop dharan kar liya. daity ne thokar mar kar gagar ko nadi mein dubo diya. machhuvara yah dekhakar bahut dara aur bola, he daity toone yah kya kiya. kya too apane vachan par sthir nahin rahana chahata? maimne to tere sath vahi kiya hai jo hakim doobam ne badshah garik ke sath kiya tha. machhuvare ke bhayabhit hone par daity hams kar bola, too dar mat maim apane vachan par drirh hoom. ab too apana jal utha aur mere pichhe-pichhe chala a.

nitant ve donon chale aur ek nagar ke andar se nikal kar ek pahar ki choti par charh gae. fir vaham se utar kar ek lambe chaure mahal mein gae. us mahal mein ek talab dikhai diya jisake charon or char tile the. talab ke pas pahumch kar machhuvare se daity ne kaha, too is talab mein jal dal aur machhaliyam pakara. machhuvara khush ho gaya kyonki talab mein bahut si machhaliyam thim. usane talab mein jal dal kar khincha to usmein char machhaliyam ai jo char rang ki thim – safed, lal, pili aur kali.

daity ne kaha, too in machhaliyon ko lekar yahan ke badshah ke pas ja. vah tujhe itana dhan dega jo toone kabhi dekha bhi nahin hoga. kintu ek bat ka dhyan rakhana. talab mein ek din mein ek hi bar jal dalana. yah kahakar daity ne jamin mein jor se thokar mari. jamin fat gai aur daity usmein sama gaya. daity ke us garhe mein samane ke bad dharati fir barabar ho gai jaise usmein kabhi garha hua hi n ho. machhuvara un charon machhaliyon ko badshah ke mahal mein le gaya.

shaharajad ne shaharayar se kaha ki us badshah ko un machhaliyon ko dekhakar jitani prasannata hui use varnan karana meri shakti ke bahar hai. usane apane mantri se kaha ki ye machhaliyam us bavarchin ke pas le jao jo yoonan ke raja ne mujhe bhent svaroop di hai. sirf vahi aisi hoshiyar hai jo in sundar machhaliyon ko bhali bhanti paka sakati hai. mantri machhaliyam bavarchin ke pas le gaya. badshah ne machhuvare ko char sau mohar inam mein de dalim.

shaharajad shaharayar se boli ki ab us bavarchin ka hal sunie ki us par kya biti. bavarchin ne machhaliyon ke tukare karake unhem dho-dhakar garm tel mein bhunane ke lie dala. jab tukare ek or bhunakar lal ho gae to usane doosari or bhunane ke lie unhem palata. us samay usane jo kuchh dekha usase usaki amkhem fat gaim. usane dekha ki rasoi ghar ki divar fat gai. usmein se ek ati sundar stri bare thata-bat se bharakile kapare pahane bahar nikali. usake sharir par bhanti-bhanti ke ratn abhooshan saj rahe the jaise mishr desh ki raniyon ke hote hain. usake kanon mein moolyavan bale, gale mein bare-bare motiyon ki mala aur bamhon mein sone ke bajooband the jinamein lal jare hue the. inake alava bhi vah bahut se moolyavan gahane pahane hue thi.

stri bahar akar apane hath mein pakari hui ek moolyavan chhari uthakar us karahi ke pas a khari hui jisamein machhaliyam bhun rahi thim. usane ek machhali par chhari mari aur boli, o machhali, o machhali, kya too apani pratijnya par kayam hai. machhali mein koi harakat n hui stri ne fir chhari aur apana prashn doharaya. is par charon machhaliyam uth khari ho gaim aur bolim, yah sachchi bat hai ki tum hamein manogi to ham tumhem manenge aur agar tum hamara rin vapas karogi to ham tumhara rin vapas kar denge. yah sunate hi us stri ne karahi ko jisamein machhaliyam bhun nahi thim. jamin par ulat diya aur svayam divar mein sama gai aur divar jur kar pahale ki tarah ho gai.

bavarchin is kand ko dekhakar sudhabudh kho baithi. kuchh der bad hosh mein ai to dekha machhaliyam choolhe ke andar gir kar koyala ho chuki hain. vah atyant dukhi hokar rone lagi. vah soch rahi thi ki maimne to yah sara vyapar apani amkhon se dekha hai lekin is par badshah ko kaise vishvas aega. vah isi chinta mein baithi thi ki mantri ne akar poochha ki machhaliyam pak chukim ya nahin. bavarchin ne mantri ko sara hal bataya mantri ko is Kahani par vishvas to n hua lekin usane bavarchin ki shikayat karana thik n samajha. usane machhaliyon ke kharab hone ka koi bahana badshah se bana diya aur machhuvare ko bula kar kaha ki vaisi hi char machhaliyam aur le ao. machhuvare ne daity se kiya hua vada to use n bataya lekin koi aur majaboori bata di ki aj machhaliyam kyon nahin la sakata.

doosare din machhuvara fir us talab par gaya aur usi prakar ki char rangon vali machhaliyam usake jal mein famsim. machhaliyam lekar vah mantri ke pas pahumcha. mantri ne use kuchh inam diya aur bavarchin ke pas machhaliyam lakar kaha ki inhem mere samane pakao. bavarchin ne pahale din ki tarah machhaliyam kat aur dho kar garm tel mein dalim aur jab usane unhem karahi mein palata to divar fat gai aur vahi stri hath mein chhari lekar divar ke andar se nikali aur chhari se ek machhali ko chhookar pahale din vali bat poochhi. un charon machhaliyon ne jurakar sir uthakar aur poomchh par khare hokar vahi uttar diya. stri ne fir karahi ulat di aur svayam divar mein sama gai aur divar fir jurakar pahale jaisi ho gai.

mantri yah sab batem dekh kar stambhit ho gaya. ab usane yah bat badshah ko bata dena hi thik samajha. jab usane badshah ko yah kand bataya to use bhi ghor ashchary hua. usane kaha ki maim svayam apani amkhon yah sab dekhana chahata hoom. usane fir machhuvare se kaha ki aisi hi char machhaliyam aur le ao. machhuvara bola ab maim tin din se pahale machhaliyam lane mein asamarth hoom. choomki sara vyapar adbhut tha isalie badshah ne machhuvare par kuchh jor nahin dala. tin din bad usane fir vaisi hi char machhaliyam lakar badshah ko dim. badshah ne khush ho kar use char sau asharfiyam aur dim.

ab badshah ne mantri se kaha ki bavarchin ko hata do aur tum khud mere samane in machhaliyon ko pakao. mantri ne bavarchi khana andar se band karake machhaliyam pakana shuroo kiya. jab ek or lal hone par machhaliyon ko palata gaya to ek bar fir divar fat gai. kintu is bar usmein se sundari nahin nikali balki gulamon jaisa kapara pahane hath mein ek hari-bhari chhari lie ek habshi nikala. habshi ne bare kathor aur bhayavah svar mein poochha, machhaliyom, machhaliyon kya tum apane vachan par ab bhi sthir ho? machhaliyam apane saron ko utha kar boli, ham usi bat par sthir hain. habshi ne karahi ulat di aur svayam divar ke chhed mein ghus gaya aur divar pahale ki tarah jur gai.

badshah ne mantri se kaha, yah adbhut ghatana maimne svayam dekhi hai varana maim is par vishvas n karata. yah machhaliyam bhi sadharan nahin hai. maim is rahasy ko janane ke lie bara utsuk hoom. yah kahakar usane machhuvare ko fir bulavaya aur usase poochha ki too yah rangin machhaliyam kaham se laya tha. machhuvare ne bataya ki maimne use us talab se pakara hai jisake charon or char tile hain. badshah ne mantri se poochha tumhem maloon hai ki vah talab kaham hai? mantri ne kaha maim sath varsh se us or shikar khelane jata raha hoon lekin maimne aisa talab n dekha n suna. ab badshah ne machhuvare se poochha ki vah talab kitani door hai aur kya too mujhe vaham le ja sakata hai? machhuvare ne kaha vah talab yahan se tin ghari ke raste par hai aur maim apako jaroor vaham le jaoomga.

us samay din kam hi rah gaya tha kintu badshah ko aisi utsukata thi ki usane apane darabariyon aur rakshakon ko shighr taiyar hone ki ajnya di. fir vah machhuvare ke pichhe-pichhe ho liya aur usake batae hue pahar par charh gaya. jab pahar ke doosari or utara to vaham bara vishal van dikhai diya. yah van pahale kisi ne nahin dekha tha. fir badshah aur usake sathiyon ne vah van bhi par kiya aur sab log us talab ke kinare pahumch gae jisake charon or char tile the. us talab ka pani atyant nirmal tha aur jin char rangon ki machhaliyam use machhuvare se milati thim vaisi anaginat machhaliyam us talab mein tair rahi thim. badshah ka ashchary aur barha. usane apane darabariyon aur saradaron se poochha ki tum logon ne pahale bhi is talab ko dekha hai ya nahin. un sab ne nivedan kiya ki ham logon ne is talab ko dekhana kaisa, isake bare mein suna tak nahin.

badshah ne kaha ki jab tak maim is talab aur is ki rangin machhaliyon ka rahasy achchhi tarah samajh nahin loomga yahan se nahin jaoomga, tum sab log bhi yahan dera dalo. usaki ajnyanusar darabariyon aur rakshakon ke dere talab ke charon or par gae.

rat hone par usane mantri ko apane dere mein bulaya aur kaha, maim is bhed ko janane ke lie ati utsuk hoon ki us bavarchikhane mein habshi kaise aya aur usane machhaliyon se kaise bat ki, aur yah bhi janana chahata hoon ki yah talab jise kisi ne nahin dekha tha achanak kaham se a gaya. maim apane kautoohal ko daba nahin pa raha hoom, ataev maimne socha ki maim akele hi is rahasy ka udghatan karoom. maim akela ja raha hoom. tum yahim raho. pratahkal jab darabari yahan par darabar ke lie aem to unase kah do ki badshah kuchh bimar ho gae hain aur kuchh din yahim par shantipoorvak rahana chahate hain. yah kah kar sare darabariyon aur rakshakon ko rajadhani vapas bhej dena aur tum is dere mein akele hi us samay tak pratiksha karana jab tak maim laut n aoom.

mantri ne badshah ko bahut samajhaya maharaj ap yah n karem. is kam mein bara khatara hai. yah bhi sambhav hai ki itana sab karane ke bad bhi apako koi rahasy jnyan n ho pae. fir bekar mein kyon itana kasht utha rahe hain aur itana khatara mol le rahe hain. badshah par usake samajhane-bujhane ka koi asar nahin hua. usane badshahi poshak utari aur ek sadharan sainik ke vastr pahan lie. jab sab log gahari nind soe hue the tab vah talavar lekar apane kheme se nikala aur ek or chalata hua ek pahar par charh gaya. kuchh hi der mein vah usaki choti par pahumch kar doosari or utar gaya. age use ek gahan van dikhai diya. vah usi ke andar chalane laga. kuchh door jane par poora savera ho gaya aur use door jane par ek sundar prasad dikhai diya. vah yah bhavan dekh kar bara prasann hua aur use asha bamdhi ki use is jagah talab ke rahasy ka pata chalega.

bhavan ke nikat pahumch kar usane dekha ki vah bara vishal hai aur kale pattharon ka bana hai. usaki divaron par saf kie hue ispati pattar jare the jo darpan ki bhanti chamakate the. badshah ko vishvas ho gaya ki yahan use manovanchhit soochana milegi. vah bahut der tak khara hua bhavan ki shobha niharata raha fir usake pas chala gaya. vah dekh raha tha ki bhavan ka dvar khula hai, fir bhi shishtata ke nate usane tali bajai ki usaki avaj sunakar koi andar se a jae. jab koi n aya to usane samkal ko kharakharaya, yah soch kar ki shayad usaki tali ki avaj andar tak nahin pahumchi hogi.

samkal kharakharane par bhi jab koi nahin nikala to badshah ko krodh aya ki ajib ghar hai jahan bulane par bhi koi akar nahin poochhata. vah andar chala gaya aur dayorhi mein pahumch kar jor se pukara ki kya is bhavan ke andar koi manushy hai jo ek atithi ke rahane ke lie thora sthan de. fir bhi use koi uttar n mila to usaka ashchary aur barha. dyorhi se age barh kar vah ghar mein ghusa to dekha ki andar se aur bhi lamba chaura makan hai kintu usake andar koi nahin hai. ab vah ek lambe chaure amgan ko par karake ek dalan mein pahumcha. usmein reshami kalin bichha hua tha. andar ka makan aur bhi saja hua tha. daravajon par jaraoo makhamal ke parade pare the jinamein sunahare aur rupahale fool boote karhe the. andar ek barahadari thi jisamein ek hauj tha jisake charon or sone se char sher bane hue the. sheron ke mumh se pani ke favvare chhootate the aur jab unaka pani niche sangamaramar ke farsh par girata tha to maloon hota tha lakhon hire-javaharat uchhal rahe hain. hauj ke bich mein ek favvara tha jis par arabi aksharon mein kuchh khuda hua tha aur usaka pani uchhal kar barahadari ki chhat ko chhoota tha.

isake alava us vishal bhavan mein tin bag the jinamein bare sugharapan ke sath bhanti-bhanti ke sugandhit foolon aur uttam falon ke per lage the. bagon mein har chij aisi taratib se lagi thi ki unhem dekh kar dukhi manushy bhi anand mein doob jae. vrikshon par nana prakar ke sundar pakshi kalarav kar rahe the.

ve pakshi unhim vrikshon par rahate the, urakar nahin ja sakate the kyonki vrikshon ke oopar jal pare hue the. badshah ek kamare se doosare kamare aur ek bag se doosare bag mein ghooma-ghoomakar har vastu se anandit hota raha. ghoomate-ghoomate vah thak gaya aur ek makan mein baith kar aram karane laga aur samane vale bag ki shobha dekhane laga.

itane mein use ek katar vani sunai di jaise koi bare dukh mein karah raha ho. usane kan dhar kar suna to maloon hua ki koi manushy ro-ro kar apani karun katha kah raha hai aur apane durbhagy ko kos raha hai. badshah ne us kamare ka parada uthaya jisamein se yah avaj a rahi thi. usane dekha ki ek navayuvak simhasan jaisi kisi oomchi chij par rajasi vastr pahane baitha hai aur karun svar mein vilap kar raha hai. badshah ne usake nikat jakar salam kiya to yuvak bola, mujhe kshama kijie maim uthakar apaka svagat karane mein asamarth hoon isilie maim apake pas n a saka. badshah ne kaha, maim apake shilavan vyavahar se bara prabhavit hua hoom. vastav mein koi aisa aparihary karan hoga ki ap uth n sake. kintu apake dukh ko dekh kar mujhe ati klesh hua hai.

ap mujhe bataem ki maim apaka kasht kis prakar door kar sakata hoom. kripaya mujhe apani kathinai batane mein tanik bhi n hichakem. kripaya yah bataem ki ap yahan is majaboori ki halat mein kaise pare hain. yah bhi bataem ki yah bhavy prasad kisaka hai aur aisa nirjan kyon hai. sath hi yah bhi bataem – kyonki maim yahi janane ke lie nikala hoon – ki pas ke talab ka rahasy kya hai aur usaki machhaliyam kaun hain.

javan adami yah sunakar fir rone laga aur bola, mera hal sunane ke pahale dekh lijie. yah kah kar usane apana kapara uthaya to badshah ne dekha ki vah nabhi ke oopar to jivit manushy hai aur niche kale patthar ka bana hua hai. usaki amkhem fati rah gai aur vah bola, mujhe to vaise yahan ki pratyek vastu dekh kar ashchary ho raha tha kintu apaka yah hal dekh kar mera ashchary aur utsukata bahut barh gai hai. bhagavan ke lie apana byorevar hal kahie. mujhe vishvas ho raha hai ki talab ki ranga-birangi machhaliyon ke rahasy ka bhi apase sambandh hai. ap mujhe apani vyatha-katha shighr kahie kyonki doosare ko sunane se adami ka kuchh dukh to door hota hi hai. javan adami ne kaha ki mujhe apani dasha ke varnan se bhi kasht hota hai kintu apaka adesh hai isalie kahata hoom.