अपठित गद्यांश – स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है

Apathit Gadyansh with Answers in Hindi unseen passage

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है. यदि आत्मिक बल चाहते हैं तो स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना हमारा परम कर्तव्य है. स्वस्तिका हमारे चरित्र के साथ घनिष्ठ संबंध है. स्वस्थ व्यक्ति ही चरित्रवान हो सकता है. कारण स्पष्ट है कि स्वास्थ्य का आत्म संयम से संबंध है. आत्म संयम चरित्र की सीढ़ी है. यदि स्वास्थ्य नष्ट हुआ तो बहुत कुछ नष्ट हो गया. स्वस्थ व्यक्ति धन कमा सकता है परंतु धनवान व्यक्ति धन से स्वास्थ्य नहीं खरीद सकता.

व्यायाम स्वास्थ्य का सहोदर है. जिन व्यक्तियों का व्यवसाय शारीरिक श्रम से संबंधित है उन्हें मस्तिष्क संबंधित व्यायाम और जिनका व्यवसाय मस्तिष्क संबंधी है उन्हें शारीरिक व्यायाम अवश्य करना चाहिए. तन तथा मस्तिष्क जीवन रूपी तराजू के 2 पलड़े हैं जिनका संतुलन होना अनिवार्य है. यह भी जान लेना आवश्यक है कि स्वास्थ्य रक्षा किस प्रकार हो सकती है.

उपयुक्त अपठित गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

  1. अपठित गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए.
  2. मनुष्य के लिए स्वस्थ रहना क्यों आवश्यक है?
  3. स्वास्थ्य का महत्व धन से भी अधिक क्यों है?
  4. व्यायाम स्वास्थ्य का सहोदर है – कैसे?

उत्तर

  1. अपठित गद्यांश का शीर्षक – स्वास्थ्य ही धन है.
  2. मनुष्य के लिए स्वस्थ रहना इसलिए आवश्यक है क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही आत्मा का वास होता है और आत्मिक बल की प्राप्ति हुई स्वस्थ शरीर से ही हो सकती है. स्वस्थ व्यक्ति ही चरित्रवान हो सकता है.
  3. एक कहावत के अनुसार यदि धन नष्ट हुआ तो कुछ भी नष्ट नहीं हुआ और यदि स्वास्थ्य नष्ट हुआ तो बहुत कुछ नष्ट हो जाता है. गया हुआ धन फिर भी आ सकता है किंतु गया हुआ स्वास्थ्य धन खर्च करने पर भी वापस नहीं लौटता. इसीलिए कहा गया है कि स्वास्थ्य का महत्व धन से अधिक है.
  4. मन और मस्तिष्क जीवन रूपी तराजू के दो पकड़े हैं. दोनों के बीच संतुलन ना रखा जाए तो जीवन डगमगा जाएगा. श्रम करने वाले को मानसिक श्रम की और मन मानसिक कार्य करने वालों को शारीरिक श्रम की अत्यंत आवश्यकता होती है. ताकि उनका स्वास्थ्य बना रहे. इसलिए चाहे किसी भी रूप में क्यों ना हो, व्यायाम करना स्वास्थ्य का सहोदर है.

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